मीडिया के मोदी

मारिया पूजो के प्रसिद्ध उपन्यास ‘गाड फादर’ का प्रमुख पात्र डॉन कारलोन कहता है कि हरेक व्यक्ति का एक प्रारब्ध होता है, वह कब आएगा, उसे स्वयं ही पता नहीं होता. जब आता है तब उसके लिए दुनिया बदल देता है.
ठीक वैसे ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रारब्ध अब जागा है. गुजरात दंगों को भुला कर मीडिया अब मोदी को विकास पुरुष के रूप में प्रस्तुत कर रहा है.

रविवार की सुबह मोदी ने गुजरात के गाँधीनगर से कनाडा तथा अमरीका के भारतीयों को संबोधित किया. नरेंद्र मोदी ने दावा किया कि उनके इस भाषण को बीस टेलीविजनों ने लाइव दिखाया है. ऐसा लग रहा था, मोदी इस बहाने भारतीयों को संबोधित कर रहे हैं. मोदी ने अपने भाषण में कहा कि भारत सभी धर्मों और विचारधाराओं से ऊपर है. हमारा लक्ष्य भारत की तरक्की होनी चाहिए और धर्मनिरपेक्षता अपने-आप ही हमसे जुड़ जाएगा. उन्होंने कहा कि गुजरात के लोग यह समझते हैं कि सभी समस्याओं का समाधान विकास के ज़रिये ही हो सकता है. हमारे पास बड़ी युवा शक्ति है और इसका इस्तेमाल कर विकास की राह पर आगे बढ़ना चाहिए.


इंडिया फर्स्ट का जुमला भी उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के लिए भारत को दिया. भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, इसमें कोई संदेह नहीं. इस मंदी के दौर में सारी दुनिया भारत की ओर देख रही है यह भी सच है. लेकिन इसका सच क्या है, वह उन्होने नहीं बताया .

जिस मोदी को गुजरात दंगो के पश्चात् जिन देशों ने वीज़ा देने से भी इंकार कर दिया था, वे भी अब यह सोच रहे हैं कि कहीं मोदी अगले चुनाव में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में उभर आये तो ? अब उन्होंने भी वीज़ा देने पर मन बनाना शुरु कर दिया है. भाजपा के पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण अडवाणी भी अब इस सत्य को स्वीकार कर चुके हैं कि मोदी पीएम की दौड़ में सबसे आगे हैं. अब मीडिया का ध्यान मोदी पर फोकस हो रहा है वर्ना बीस-बीस टेलीविज़न एक साथ मोदी के भाषण को लाइव भारत में दिखा रहे हैं, जबकि संबोधित समुद्रपारीय भारतियों को किया जा रहा था. तकनीक के माध्यम से इससे पहले भी कई लोगों द्वारा दूरस्थ जनता को संबोधित किया जा चुका है, फिर इस बार इतना महत्व देने का कारण क्या है ?

देश का एक बड़ा तबका मानने लगा है कि मोदी उदारवादी हो रहे हैं और यह भी कि अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो वे इतने कट्टर नहीं रह पाएंगे और भारत की विविधता व विशालता के कारण एक प्रधानमंत्री के रुप में उन्हें उदार होना ही पड़ेगा. लेकिन यह सब भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है कि ऐसा होगा तो क्या होगा…! लेकिन अभी जो तूमार ताना जा रहा है, उसमें मीडिया का एक बड़ा तबका ‘नमो-नमो’ कर रहा है.

अब मीडिया मोदी पर मेहरबान है. उनकी हर छोटी बड़ी बात को राष्ट्रीय स्तर पर परोसने का जिम्मा मीडिया ने उठा लिया है. कहा जाता है कि धरती पर ईश्वर के बाद सबसे ताकतवर अमरीका ही है और अमरीकी सरपरस्ती में मोदी का मीडिया मैनेजमेंट देखा जाता है, यह बात अब सार्वजनिक है.

गुजरात के कथित विकास का फायदा सबसे नीचे बैठे आदमी तक पहुंच भी पा रहा है या नहीं, यह कथित मुख्यधारा की मीडिया देखने नहीं गयी है. विकास के नाम पर गुजरात में जो हो रहा है, वही उदारवाद तो कार्पोरेट घराने पूरे भारत में चाहते हैं. ममता बनर्जी ने अपने आन्दोलन से टाटा को सिंगुर से नैनो का कारखाना हठाने के लिए बाध्य कर दिया और नरेंद्र मोदी पलक पांवड़े बिछा कर नैनो को अपने घर ले आये. इसमें कोई बहुत गूढ़ अर्थ तलाशने की जरुरत नहीं है कि मुकेश अंबानी से लेकर रतन टाटा तक मोदी के प्रधानमंत्री बनने के लिये खून-पसीना बहाने के लिये तैयार हैं. आखिर अंबानी और टाटा के सपनों का भारत तो मोदी ही बना सकते हैं. ऐसे में कारपोरेट के पैसे पर पलने और चलने वाली मीडिया को तो मोदी सुहाएंगे ही.

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