नरेन्द्र मोदी का ‘अति पिछड़ा’ ब्रह्मास्त्र

अनिल चमड़िया
बिहार के अनुभवों से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अति पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की पैरवी को समझने की कोशिश करते हैं. बिहार में 1990 के बाद से सामाजिक न्याय के साथ विकास के नाम पर चलने वाली सरकारों ने बिना आरक्षण कोटा बढ़ाए अतिपिछड़ा वर्ग की सूची 79 से बढ़ाकर 112 कर दी और पिछड़ा वर्ग की सूची में तो गिनी चुनी जातियां ही रह गई हैं. बिहार में जिन जातियों को पिछड़े से अति पिछड़ों की सूची में डाला गया, उनमें बिहार में तेली, दांगी, तमोली, हलुवाई आदि भी आते हैं जोकि पिछड़ों के बीच अपेक्षाकृत सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से बेहतर स्थिति में हैं. बिहार में सामाजिक न्याय की अवधारणा को वोट बैंक की तरफ का ले जाने का आधार पिछड़े और अति पिछड़े की सूची को छोटा व लंबा करके ही पूरा किया गया है. दलित और महादलित का भी विभाजन वहां सामने आया.

अंग्रेजों के शासन काल में भारतीय नागरिकों के लिए आरक्षण की मांग का एक इतिहास रहा है. अंग्रेजों के शासनकाल में ही दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के लिए सत्ता तंत्र में हिस्सेदारी की मांग की गई. पिछड़ों को सत्ता तंत्र में प्रतिधिनित्व देने के लिए काका कालेलकर आयोग बना लेकिन वह हिस्सेदारी 1991 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के कार्यकाल में पूरी हुई. उससे पहले राज्यों में 1978 में जनता पार्टी की सरकार के बनने के बाद बिहार और उत्तर प्रदेश में पिछड़ों के लिए आरक्षण का फैसला किया गया और जनसंघ (अब की भाजपा) व दूसरी राजनीतिक पार्टियों ने इसके विरोध में कर्पूरी ठाकुर और रामनरेश यादव की सरकार गिरा दी, जिस तरह वीपी सिंह की सरकार भी गिरा दी गई थी.


प्रधानमंत्री जो अति पिछड़ों के लिए आरक्षण की वकालत कर रहे हैं, वह आरक्षण विरोध की राजनीतिक धारा से निकली हुई अति पिछड़ों के लिए चिंता और सहानुभूति है. अति पिछड़ों के लिए वकालत करने का अर्थ पिछड़ों की सूची में विभाजन करना है. नौकरियां पैदा कर आरक्षण का प्रतिशत बढाना नहीं है. तमिलनाडु और बिहार में पहले से ही पिछड़ों की एक से ज्यादा सूची हैं. 2002 तक के अपने शासनकाल में भाजपा की सरकार के बतौर मुखिया राजनाथ सिंह ने भी उत्तर प्रदेश में यह कोशिश की थी.

बिहार में मुंगेरी लाल कमीशन ने फरवरी 1976 में पिछड़ा वर्ग अनुसूची को दो भागों में वर्गीकृत किया था और 2 अक्टूबर 1978 को कर्पूरी ठाकुर ने बतौर मुख्यमंत्री सरकारी नौकरियों के साथ-साथ शिक्षण संस्थानों एवं अन्य क्षेत्रों में दोनों वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया. कर्पूरी ठाकुर को सामाजिक न्याय की राजनीति का पुरोधा माना जाता है और उन्होंने न्याय के भीतर न्याय की संवेदना के साथ यह व्यवस्था की थी.

देश स्तर पर 1978 में गठित मंडल आयोग के प्रमुख सदस्य श्री एल. आर. नायक ने भी पिछड़ी जातियों के बीच वर्चस्ववादी प्रवृति का उल्लेख करते हुए पिछड़े वर्गों की सूची को खंड ‘क’ और ‘ख’ में वर्गीकृत करते हुए 27 प्रतिशत आरक्षण में से अतिपिछड़ों के लिए 15 प्रतिशत और पिछड़ों के लिए 12 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करने की सिफारिश की. उन्होंने अतिपिछड़ों की जन संख्या 25.56 प्रतिशत तथा पिछड़ों की जनसंख्या 26.44 प्रतिशत बताया. लेकिन नायक की इस सिफारिश को असमहमति के रुप ही दर्ज किया गया.

जब तक पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू नहीं था, तब तक लोकतंत्र की उन संस्थाओं ने पिछड़ों के आरक्षण के लिए कोई आवाज नहीं लगाई जो कि राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर वर्चस्व रखने वाली शक्तियों के अधीन रहा है. लेकिन इसके लागू होने के बाद से इस बात पर चिंता जाहिर की जाने लगी कि गरीब पिछड़ों व अतिपिछड़ों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा है. अगस्त 1990 में केन्द्र सरकार के असैन्य पदों के लिए आरक्षण के फैसले के बाद आरक्षण की विरोधी विचारों ने जो स्थितियां उत्पन्न की हैं, उनपर एक नजर डालनी चाहिए-
क) आरक्षण की सीमा पचास प्रतिशत निर्धारित की गई जबकि तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण की व्यव्स्था है और उसमें कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है.
ख) पिछड़े वर्गों के लिए क्रीमीलेयर का सिद्धांत लागू किया गया.
ग) पिछड़े वर्गों की सूची को विभाजित करने की मांग की गई.
घ) आरक्षण की प्रक्रियाओं में कई स्तरों पर परिवर्तन किया गया ताकि आरक्षित पदों की संख्या कम हो सके. मसलन यूजीसी का विश्वविद्यालयों के लिए भेजा गया आरक्षण संबंधी एक परिपत्र
च) आरक्षित पदों को भरा नहीं गया.
छ) आरक्षण को लागू करने के लिए कानून बनाने की मांग को खारिज कर दिया गया.

तात्कालिक तौर पर यह समझने की कोशिश करनी है कि आरक्षण को लेकर राजनीति की दिशा क्या है. आरक्षण सरकारी नौकरियों में है और सरकार में नौकरियां लगातार घट रही हैं क्योंकि नई आर्थिक नीति नौकरियों की संख्या बढ़ाने की इजाजत नहीं देती है. तब भारतीय जनता पार्टी की सरकार क्या करें कि वह अपने वोट बैंक में इजाफा कर सकें. पहली बात कि नरेन्द्र मोदी की सरकार के लिए देश में पहली बार फारवर्ड बुलाई जाने वाली जातियों के बीच धुवीकरण यानी मोदी के पक्ष में एकतरफा वोट दिया गया और यह प्रचार कर कि नरेन्द्र मोदी पिछड़े वर्ग के बीच से आते हैं. भाजपा ने वी पी सिंह की सरकार द्वारा आरक्षण लागू करने के बाद ही यह समझ लिया था कि अपने वर्चस्व की राजनीति को वह किसी पिछड़े का चेहरा लगाकर ही कायम रख सकती है. नरेन्द्र मोदी की सरकार का यह उद्देश्य है कि पिछड़ों के नाम पर जो विमर्श बना हुआ है, उसे बदला जाए और उसमें अति पिछड़ों के नाम पर नये विमर्श की रचना कर उसकी कमान अपने हाथों में ले.

इसी कोशिश के तहत राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग को संवैधानिक दर्जा देने के केन्द्र सरकार के इरादे को काफी प्रचारित किया गया. दूसरी तरफ पिछड़े वर्ग की सूची को विभाजित करने की योजना पर सरकार लगातार काम कर रही है. पिछड़े वर्गों की जातियों का वर्गीकरण के लिए “एक्जामीन सब कैटेगोराइजेशन ऑफ ओबीसी कमीशन” ने लगातार विज्ञान भवन में पिछड़े वर्गों से जुड़े विभिन्न संगठनों की सुनवाई की और उनके पक्षों को सुना है.

विदित हो कि मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि आरक्षण के लिए पिछड़े वर्ग को दो हिस्सों में विभाजित करने के बारे में कहा था लेकिन उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी समेय अन्य के नेतृत्व में बनी सरकारों ने उसके मुताबिक पिछड़ों की सूची में विभाजित करने की पहल नहीं की. लेकिन नरेन्द्र मोदी की सरकार ने उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह ने जो कोशिश की थी, उसे अगले चुनाव से पहले पूरा कर देने के इरादे से अपनी सक्रियता बढ़ा दी है. मनमोहन सिंह की सरकार के कार्यकाल के दौरान राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने भी 2011 में पिछड़ों की सूची को यानी 27 प्रतिशत के आरक्षण को पिछड़ा, अति पिछड़ा और महापिछड़ा में वर्गीकृत करने की सिफारिश की थी.

प्रधानमंत्री जो अति पिछड़ों को 27 प्रतिशत में ही ज्यादा लाभ देने की वकालत कर रहे हैं, वास्तव में वह “एक्जामींन सब कैटेगोराइजेशन ऑफ ओबीसी कमीशन” की रिपोर्ट के आने का संकेत है. इस रिपोर्ट के बाद सरकार तत्काल कार्रवाई करेगी जिसके जरिये सामाजिक न्याय की राजनीति के भीतर सामाजिक अन्याय को दूर करने का एक विमर्श खड़ा करने की कोशिश हो सकती है. यही बात उत्तर प्रदेश में योगी आदित्य नाथ भी दोहरा रहे हैं. वहां भी बिहार में नीतिश कुमार के फैसले के तर्ज पिछड़े और दलितों की सूची को छोटा बड़ा किया जा सकता है. भाजपा के नेतृत्व वाली इस सरकार के इस तरह के फैसलों से अतिपिछड़ों के बीच राजनीतिक सेंधमारी की उम्मीद की जा सकती है क्योंकि उत्तर भारत के राज्यों में जो नये सामाजिक समीकरण बन रहे हैं, उनमें भाजपा को यह एक नई उम्मीद दे सकती है.

सबसे महत्वपूर्ण बात कि सोशल इंजीनियरिंग के जरिये भाजपा ने पिछड़ों और दलितों के भीतर एक जाति के वर्चस्व के खिलाफ दूसरी जाति के वर्चस्व की मह्त्वकांक्षा पैदा करने में सफल हुई है. वह वैसी जातियों के बीच उभरे नेतृत्व को अपने नये फैसले से एक ताकत दे सकती है, जिसके जरिये उन्हें जातीय भावना का ध्रुवीकरण करने में आसानी हो. उत्तर प्रदेश में पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने ठीक ही कहा है कि सपा बसपा गठबंधन को ध्वस्त करने के लिए ब्रह्मास्त्र तैयार कर लिया गया है. नया ब्रह्मास्त्र ब्राहम्णवादी वर्चस्व नहीं, पिछड़ों में पिछड़े के वर्चस्व का है.

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