शिशु गृह योजना छत्तीसगढ़ में फ्लॉप

रायपुर | संवाददाता : कामकाजी माताओं के बच्चों के लिये राष्ट्रीय शिशु गृह योजना छत्तीसगढ़ में फिसड्डी साबित हुई है. इस योजना में सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक कामकाजी माताओं के छोटे बच्चों के लिये देखभाल सुविधा प्रदान की जाती है.

इस योजना में बच्चों हेतु सुरक्षित स्थान होने के अलावा शिशु गृह, पूरक पोषण, स्कूल पूर्व शिक्षा एवं आपातकालीन स्वास्थ्य देखभाल जैसी सुविधाएं प्रदान की जाती हैं. इस योजना को सरकार ने बहुत महत्वपूर्ण माना था. लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार ने साल दर साल बजट के बाद भी इस योजना को गंभीरता से लागू करने की कोई कोशिश ही नहीं की. रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग जैसे इलाकों में जहां बड़ी संख्या में कामकाजी मातायें हैं, वे इस योजना का लाभ ले सकती थीं. लेकिन महिलाओं के प्रति संवेदनशील होने का दावा करने वाली छत्तीसगढ़ सरकार में इस योजना को हाशिये पर डाल दिया गया.


महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी के अनुसार केंद्र ने 2016-17 में छत्तीसगढ़ को इस योजना के मद में 2,55,44,340 रुपये आवंटित किये थे. इसके अलावा 2017-18 में 2,72,63,340 रुपये छत्तीसगढ़ को आवंटित किये थे. लेकिन राज्य में शिशु गृह योजना की संख्या ही सारी कहानी कह देते हैं.

देश भर में शिशु गृह की संख्या 6,907 है और छत्तीसगढ़ में इनकी संख्या महज 4 है. छत्तीसगढ़ में शिशु केंद्र की जरुरत क्यों नहीं समझी गई, इसका ठीक-ठीक जवाब किसी के पास नहीं है.

तमिलनाडु में ऐसे शिशु गृह की संख्या 944 है. कश्मीर में यह संख्या 670 है. इसी तरह मणिपुर में 533, असम में 641, मध्यप्रदेश में 545, केरल में 571, कर्नाटक में 611 शिशु गृह हैं. हालत ये है कि छोटे राज्यों में नागालैंड में भी 144, त्रिपुरा में 201, मिजोरम में 262, अरुणाचल में 175, पुद्दुचेरी में 104 शिशु केंद्र चल रहे हैं.

जाहिर है, इन राज्यों में शिशु गृहों के संचालन के कारण महिलाओं के लिये यह सुविधाजनक होता है कि वे अपने बच्चे को काम से पहले शिशु गृह में छोड़ जायें और शाम को वापसी के समय अपने बच्चे को अपने साथ घर ले जायें. इस दौरान शिशु की देखभाल और उसके स्कूल पूर्व अध्ययन की सुविधाओं के कारण कामकाजी मातायें बच्चे की चिंता से मुक्त रहती हैं.

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