बिना कमांडेंट के नक्सलियों से मोर्चा

राजनांदगांव | छत्तीसगढ़ संवाददाता: छत्तीसगढ़ में नक्सल मोर्चे पर तैनात राज्य पुलिस के अधीनस्थ बटालियन की प्रशासनिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई है. अरसे से प्रदेश के विभिन्न जिलों में कार्यरत बटालियन के कमांडेंट के पद खाली पड़े हैं. नक्सलियों के साथ संयुक्त रूप से लड़ाई में शामिल इन बटालियनों के शीर्ष नेतृत्व की पदस्थापना को ही अनदेखा कर दिया गया है. प्रदेश के 17 में से 7 बटालियन में कमाडेंट की लंबे समय से नियुक्ति नहीं की गई है. कुछ कमाडेंट के पास दोहरे प्रभार भी है. नक्सल ऑपरेशन देख रहे उच्चाधिकारियों ने भी माना है कि अफसरों की कमी से कई बटालियनों में कमांडेंट नहीं है और स्वाभाविकतौर पर काम प्रभावित हो रहा है.

व्यवहारिक रूप से प्रशासनिक ढांचा के दुरूस्त नहीं होने के पीछे कई तर्क भी दिए जा रहे हैं. इस मामले में राज्य लोक सेवा आयोग को सबसे अधिक जिम्मेदार बताया जा रहा है. सूत्रों का कहना है कि लोक सेवा आयोग ने राज्य गठन के बाद सिर्फ तीन बार ही राजपत्रित अधिकारियों की भर्ती की है. राज्य गठन के बाद 2003, 05 एवं 2008 में ही भर्ती प्रक्रिया हुई. यही वजह है कि राज्य में डीएसपी सहित पुलिस महकमे के कई पद पर नई नियुक्ति नहीं हो पाई है.

राज्य पुलिस मुख्यालय ने लोकसेवा आयोग से इस संबंध में पत्र-व्यवहार भी किया है. सूत्रों का कहना है कि नक्सल मोर्चे में बटालियन के जवानों की अहम भूमिका है. पुलिस को बटालियन का सीधी मदद मिलती है जिससे लड़ाई में जवानों का मनोबल ऊंचा रहता है.

मिली जानकारी के अनुसार राज्य की 1ली, 7वीं, 8वीं, 10वीं, 14वीं, 15वीं व 17वीं बटालियनें इस समय बगैर कमांडेंट की हैं. इन बटालियनों के कमांडेंट या प्रभारी उस जिले के एसपी अथवा समीप के कमांडेंट को बनाया गया है. महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें 8वीं, 10वीं, 14वीं, 15वीं, 16वीं एवं 17वीं बटालियनें नक्सल प्रभावित जिलों में नियुक्त हैं. 8वीं राजनांदगांव, 10वीं सरगुजा, 14वीं बालोद जिले के दल्लीराजहरा, 15वीं एवं 17वीं बटालियन को कवर्धा जिले में तैनात किया गया है. राजनांदगांव, सरगुजा तथा बालोद में नक्सल गतिविधियां जारी रहती हैं. इन बटालियनों की जिम्मेदारी को एसपी के भरोसे छोड़ दिया गया है.

राज्य गठन के बाद से लोकसेवा आयोग ने पिछले 13 वर्षों में दो बार ही भर्ती की है. अफसरों की कमी से राज्य पुलिस मुख्यालय भी हताश है. कई बार सरकार को पुलिस मुख्यालय ने सीधे भर्ती किए जाने की सलाह दी है. संवैधानिक अड़चनों की वजह से पीएचक्यू की सलाह को लागू नहीं किया जा रहा है. इस बीच प्रदेश में कमांडेंट पद के रिक्त होने से इन बटालियनों की जिम्मेदारी डिप्टी कमांडेंट अथवा सहायक कमांडेंट को सौंपी जा रही है. हालांकि वित्तीय अधिकार वहां के एसपी अथवा समीपस्थ जिले के कमांडेंट देख रहे हैं, जिन जिलों में बटालियनें कार्यरत हैं.

कमांडेंट के खाली पद से व्यवहारिक मुश्किलें बटालियनों को आ रही है. पहले से ही वहां के एसपी के पास नक्सल मुहिम जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, इसके साथ ही बटालियनों को अलग से निर्देशित करना उन पर अतिरिक्त बोझ डालना हो गया है. इसका उनके कामकाज पर तो असर पड़ ही रहा है, बटालियनों पर वे पूरा ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे हैं. सूत्र बताते हैं कि डिप्टी कमांडेंट और सहायक सेनानी को मैदानी इलाके में फोर्स का नेतृत्व करने के नियम का पालन करना पड़ता है. कमांडेंट की कमी की वजह से ये अफसर मैदानी इलाकों में नहीं जा पा रहे हैं. राज्य की 17 बटालियनों में 14 हजार से अधिक जवान विभिन्न नक्सल जिलों में काम कर रहे हैं. 7 जिलों में कमांडेंट नहीं होने से नेतृत्व की कमी साफ दिख रही है.

यूपीएससी से कम आ रहे अधिकारी: विज
अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक नक्सल ऑपरेशन आरके विज ने बताया कि पहले से ही अधिकारियों की कमी है, इसीलिए कई बटालियनों के कमांडेंट नियुक्त नहीं हो सके हैं. इसका कारण उन्होंने यह भी बताया कि केंद्रीय लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी से भी अधिकारी अपेक्षाकृत इस प्रदेश में कम आ रहे हैं. इसके चलते कई बटालियनों की कमांड जूनियर अधिकारियों को दी गई है या फिर समीपस्थ जिले के एसपी को अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है.

यह पूछे जाने पर कि क्या इससे ऐसे पुलिस अधीक्षकों का काम प्रभावित नहीं होता, श्री विज का कहना था कि ऐसा होना स्वाभाविक है. उन्होंने बताया कि इस कमी को दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं, क्योंकि इसके महत्व से विभाग पूरी तरह वाकिफ है. उम्मीद है कि इन पदों पर जल्द ही नियुक्तियां की जाएंगी.

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