नक्सलवाद:वार्ता बनाम युद्ध

दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ के नए राज्यपाल बलरामदास टंडन ने छत्तीसगढ़ की नक्सल समस्या पर स्पष्ट रूप से अपने विचार रखे हैं. राज्यपाल के रूप में नामित होने के तुरंत बाद चंडीगढ़ में मीडिया से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वे इस समस्या का हल बातचीत के जरिए ही संभव देखते हैं.

श्री टंडन राजनीतिक बिरादरी से हैं तथा पंजाब के उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं. जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में गिने जाने वाले 87 वर्षीय वयोवृद्ध राज्यपाल का मानना है कि बंदूक की नोक पर राज्य की इस समस्या को सुलझाया नहीं जा सकता. अत: जरूरी है कि माओवादियों को वार्ता के लिए तैयार किया जाए.


श्री टंडन राज्यपाल के रूप में इस दिशा में किस तरह पहल करेंगे, करेंगे भी या नहीं, यह भविष्य ही बताएगा लेकिन रमन सिंह सरकार अब बातचीत की बहुत इच्छुक नहीं है. यह इसलिए भी है क्योंकि केन्द्र सरकार के गृहमंत्री राजनाथ सिंह माओवादियों के साथ वार्ता के पक्ष में नहीं है और वे ताकत के बल पर नक्सल समस्या को खत्म करने का इरादा रखते हैं. इसीलिए उन्होंने छत्तीसगढ़ सहित नक्सल प्रभावित तमाम राज्यों को हर तरह से केन्द्रीय सहायता उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है, जिसमें अत्याधुनिक संचार साधनों के अलावा, अर्द्धसैनिक बलों की टुकड़ियां, हेलीकाप्टर, टोही विमान एवं गोला बारूद शमिल है.

केन्द्र के रूख को देखते हुए राज्य सरकारों ने भी आक्रामक रवैया अपना रखा है. छत्तीसगढ़ इस मामले में दो कदम आगे ही है. पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों के जवान नक्सलियों के ठिकानों की तलाश में जंगल में चप्पा-चप्पा छान रहे हैं.

इसमें दो राय नहीं कि पिछले कुछ महीनों से फोर्स के दबाव की वजह से बस्तर के माओवादी बैकफुट पर है. वे कोई बड़ी वारदात भी नहीं कर पाए हैं. उनमें भगदड़ जैसी स्थिति है. बीते जून-जुलाई में ही लगभग तीन दर्जन नक्सलियों ने जिनमें कमांडर भी शामिल है, आत्मसमर्पण किया है. पुलिस ने मुठभेड़ों के जरिए कईयों को मार गिराया है और बड़ी संख्या में उन्हें गिरफ्तार किया है.

इन स्थितियों को देखकर यह आभास होता है कि नेतृत्व के छिन्न-भिन्न होने एवं नक्सली कमांडरों के आत्मसमर्पण से नक्सलियों के पैर कम से कम बस्तर से उखड़ रहे हैं. ऐसी स्थिति में पुलिस का काम और आसान हो जाता है. जिस तैयारी के साथ आंध्र प्रदेश के ग्रेहाउंड के साथ मिलकर पुलिस संयुक्त आपरेशन चला रही है, उससे सफलता की उम्मीद बढ़ गई है. यानी फोर्स के दबाव के चलते नक्सली या तो हथियार डालेंगे या फिर बस्तर से पलायन करने विवश हो जाएंगें. यदि ऐसा हुआ तो यह कहा जाएगा कि बंदूक की नोक से नक्सलियों का सफाया कर दिया गया. और केन्द्र व राज्यों की रणनीति सफल रही.

लेकिन क्या वास्तव में यह इतना आसान है? क्या बस्तर के जंगल माओवादियों से खाली हो जाएंगे? क्या पुलिस मुठभेड़ों के जरिए समस्या को खत्म कर देगी? पुलिस के संयुक्त अभियान को भले ही प्रारंभिक सफलता मिली हो किन्तु बस्तर में नक्सलवाद की 40 सालों की जड़ों को उखाड़ फेंकना लगभग असंभव सा प्रतीत होता है. इसलिए यदि नए राज्यपाल वार्ता की वकालत कर रहे हैं तो यह उचित ही है. अब यह अलग बात है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह इस मामले में दोहरी मानसिकता में है.

जब नक्सली कोई बड़ी हिंसात्मक वारदात करते हैं तो वे उनसे सख्ती से निपटने एवं बातचीन न करने का ऐलान करते हैं. लेकिन अलग-अलग अवसरों पर इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान वे नक्सलियों से मुख्यधारा में शामिल होने की अपील के साथ बातचीत की इच्छा भी जताते हैं. अब प्रश्न यह है कि क्या वे इस दुविधा से उबरेंगे? राज्यपाल श्री टंडन के विचारों को जानने के बाद क्या वे इस दिशा में सरकार की ओर से पहल करेंगे? वह भी ऐसी स्थिति में जब केन्द्र बातचीत की संभावना को नकार रहा हो.

बहरहाल यह देखना दिलचस्प रहेगा कि नक्सल मुद्दे पर राज्य सरकार की अगली रणनीति क्या होती है. चूंकि यह समस्या राष्ट्रीय है तथा देश के 76 जिले इससे प्रभावित हैं लिहाजा एक राज्य से इसका खात्मा स्थायी हल नहीं है. हालांकि आंध्रप्रदेश ने अपने युद्ध प्रशिक्षित कमांडों ग्रेहाउंड के जरिए नक्सलियों को अपने यहां से मार भगाया है. इससे सीमान्ध्र और तेलंगाना में तो शांति स्थापित हो गई किन्तु बस्तर एवं अन्य पड़ोसी राज्यों में नक्सलियों की हिंसक गतिविधियां बढ़ गई.

भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा जारी किए गए अधिकृत आंकड़ों के अनुसार सन 2011 में 1760 नक्सली घटनाओं में 611 लोग मारे गए. सन 2012 में 1415 घटनाओं में 415 लोगों की मौंतें हुई. तथा सन 2013 में 1136 घटनाओं में 397 लोग जान से हाथ धो बैठे. सन 2014 में 31 मई तक 158 लोग नक्सल हिंसा में मारे जा चुके हैं. तीन सालों के इन आंकड़ों में सर्वाधिक घटनाएं एवं मौतें छत्तीसगढ़ में हुई हैं.

छत्तीसगढ़ के राज्यपाल चूंकि बातचीत के जरिए समस्या का हल चाहते हैं, लिहाजा इस मुद्दे पर नए सिरे से पहल की संभावना दिखती है. वार्ता के समर्थक बहुतेरे नामचीन लोग हैं जो संगठित होकर वार्ता के लिए माहौल बना सकते हैं. दिक्कत सही प्लेटफार्म तैयार करने की. आश्चर्य है कि इतनी गंभीर राष्ट्रीय समस्या, जिसे देश की अखंडता के लिए खतरनाक माना गया है, पर गंभीर प्रयास कभी नहीं हुए. विकास और प्रतिहिंसा को आधार बनाकर इस समस्या को हल करने की कोशिश की गई जो अभी भी जारी है. पर नतीजा सबके सामने है. नक्सलियों पर काबू नहीं पाया जा सका है. न हिंसा रूकी है और न ही बस्तर संभाग जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की गंगा बही है. और तो और शोषण चक्र और भी मजबूत हुआ है, भ्रष्टाचार बेइंतिहा बढ़ा है तथा आदिवासी पुलिस और नक्सली, दो पाटों के बीच में फंस गए हैं. दोनों तरफ खाई है, गिरे कि मरे. घटनाएं इसकी गवाह हैं.

यह निश्चित है, हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा से नहीं दिया जा सकता. अदालतें हत्यारों को फांसी की सजा देती हैं पर फैसला सुनाने के पूर्व उन्हें बचाव का पूरा मौका दिया जाता है. सरकार भी नक्सलियों को आत्मसमर्पण का अवसर दे रही है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. दरअसल माओवादियों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए मनोवैज्ञानिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल करना होगा. उन्हें वार्ता की टेबिल पर लाने के लिए विशेष मुहिम चलानी होगी. क्या सरकार इसके लिए एक विशेष कार्यदल का गठन नहीं कर सकती जिसमें जाने-माने विचारकों के अलावा मीडिया के लोग भी शामिल हो?

माओवादी, सरकार पर नहीं मीडिया पर ज्यादा भरोसा करते हैं, इसलिए माओवादी विचारकों एवं उनके शीर्षस्थ नेताओं को मानसिक रूप से तैयार करना यद्यपि कठिन जरूर है पर असंभव नहीं. क्या केन्द्र या छत्तीसगढ़ सरकार इस संदर्भ में विचार करेगी? नए राज्यपाल अपने विचारों के अनुरूप प्रभावकारी पहल कर सकते हैं. देखें, वे कितना कुछ कर पाते हैं या केवल भावनाओं तक सीमित रहते हैं.
*लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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