नक्सलियों ने की चुनाव बहिष्कार की अपील

जगदलपुर | आलोक प्रकाश पुतुल: छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने एक बार फिर चुनाव बहिष्कार की घोषणा की है. बस्तर के अलग-अलग इलाकों में पर्चा बांटकर और बैनर लगाकर चुनाव बहिष्कार की अपील की जा रही हैं.

कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल ज़ोनल कमेटी ने लोगों से छत्तीसगढ़ में चुनाव के बहिष्कार की अपील करते हुए कहा है, “चुनाव के ज़रिए वर्तमान शोषणकारी व्यवस्था ख़त्म नहीं होगी. जनता की बुनियादी ज़रूरतों की पूर्ति भी नहीं होगी. वर्तमान व्यवस्था को जड़ से बदलने से ही यह संभव होगा.”


दूसरी ओर, राज्य के पुलिस महानिदेशक रामनिवास का दावा है कि वे लोगों के सहयोग से बेहतर चुनाव करा पाने में सफल रहेंगे. चुनाव के लिए केंद्र और दूसरे राज्यों से सुरक्षाबलों के छत्तीसगढ़ पहुंचने का सिलसिला भी शुरू हो गया है.

असल में बस्तर इलाके में मतदान सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ अकेला वह इलाका है, जहां दो चरणों में मतदान होना है. पहले चरण में 11 नवंबर को राज्य के नक्सल प्रभावित बस्तर की 12 और राजनांदगांव की 6 सीटों पर मतदान होगा.

मई में बस्तर की झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर नक्सली हमले में 35 लोगों के मारे जाने के बाद से सियासी दलों पर गहरा असर पड़ा है. हमले में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा की मौत हो गई थी.

यही कारण है कि आम लोगों के अलावा राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता भी इस बार डरे हुए हैं. चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवार अपने कार्यकर्ताओं को सुरक्षा का भरोसा दिलाने के लिए उनका जीवन बीमा करा रहे हैं.

बस्तर में इस बार 63 फ़ीसदी मतदान केंद्रों को संवेदनशील माना गया है. हालत ये है कि बीजापुर ज़िले में 243 मतदान केंद्र हैं, लेकिन इसमें से एक भी मतदान केंद्र सामान्य नहीं है. इनमें 104 मतदान केंद्र अतिसंवेदनशील हैं तो 139 संवेदनशील.

पिछले चुनाव में दंतेवाड़ा और कोंटा में 70 से अधिक मतदान केंद्रों को नक्सलियों के कारण बदल दिया गया था. इसके बाद भी नक्सलियों का असर इतना ज़्यादा था कि 33 केंद्रों पर फिर मतदान करवाना पड़ा. कोंटा के गोगुंडा केंद्र में तो तीन बार वोटिंग करानी पड़ी थी.

हालांकि चुनाव आयोग का दावा है कि माओवाद प्रभावित बस्तर में उसके सामने किसी तरह का संकट नहीं है.

राज्य के मुख्य चुनाव निर्वाचन अधिकारी सुनील कुजूर नक्सलियों के चुनाव बहिष्कार पर उल्टे सवाल पूछते हैं, “आपने अभी तक ऐसी कोई घटना सुनी है जब किसी मतदाता को नक्सलियों ने कोई नुकसान पहुंचाया हो या उनकी उंगली काट ली हो? बस्तर में हमारे सामने वैसी ही चुनौतियां हैं, जैसी रहती हैं.”

लेकिन बस्तर में चुनाव की चुनौतियों से ऐसे लोग बेहतर वाकिफ़ हैं, जिन्हें इससे निपटना होता है.

राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन का मानना है कि बस्तर में चुनाव कराना बेहद मुश्किल काम होता है. उनके मुताबिक़ सारा दारोमदार सुरक्षा बलों पर होता है.

विश्वरंजन कहते हैं, “केंद्र से हर बार पर्याप्त सुरक्षा बल की मांग की जाती है. मेरे पास जो ख़बर है, उसके मुताबिक़ इस बार भी बेहतर चुनाव के लिए सुरक्षा बल की मांग की गई है. अगर सुरक्षा बल में कमी हुई, तो चुनाव मुश्किल हो जाएगा.”

हालांकि इस बार बस्तर इलाके को विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र सुरक्षाबलों से पाट देने की योजना है. पुलिस सूत्रों के मुताबिक़ बस्तर और राजनांदगांव में चुनाव के लिए राज्य पुलिस के अलावा केंद्रीय और राज्य सशस्त्र बलों की 560 कंपनियां तैनात की जाएंगी. इनमें पहले से ही सुरक्षाबलों की 33 बटालियन तैनात हैं.

राज्य के पुलिस महानिदेशक रामनिवास मानते हैं कि जनसहयोग से बस्तर में शांतिपूर्ण ढंग से चुनाव निपटा लिए जाएंगे.

रामनिवास ने कहा, “प्रजातंत्र के जो हमारे मूल्य हैं, उसका समावेश जनता में हर कहीं है. वही जनता इसका जवाब देगी. सवाल केवल सुरक्षा बल का नहीं है, यहां हर आदमी एक दूसरे का सहयोग कर रहा है.”

दंतेवाड़ा के कांग्रेस नेता राजकुमार तमो का कहना है कि माओवादियों हमेशा चुनाव का बहिष्कार करते रहे हैं. वे पंचायत से लेकर लोकसभा चुनाव तक में बहिष्कार का नारा देते रहे हैं, लेकिन जनता तो चुनाव में भाग लेती ही है.

चुनाव बहिष्कार
दूसरी ओर माओवादी कवि वरवरा राव चुनाव बहिष्कार को बदलाव और क्रांति से जोड़ते हैं.

वरवरा राव कहते हैं, ”जो व्यवस्था है, उसे नकारे बिना कोई नई व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती. एक वैकल्पिक व्यवस्था बनाने लिए सरकार को वोट नहीं डालना और सरकार को टैक्स नहीं देना, ये दो रास्ते हो सकते हैं. 1950 से अब तक लोकतांत्रिक सुधार की जितनी भी कोशिशें हुई हैं, वे विफल रही हैं. विश्व बैंक और औद्योगिक घरानों ने भारतीय लोकतंत्र ऊपर से लादा हुआ है. इसका बहिष्कार होना ही चाहिए.”

लेकिन पिछले चुनाव के अनुभव बताते हैं कि नक्सलियों के बहिष्कार के बाद भी पूरे राज्य में बस्तर में सर्वाधिक मतदान हुआ. क्या ऐसा मानना चाहिए कि नक्सलियों के बहिष्कार को जनता ने नकार दिया था?

इस सवाल के जवाब में वरवरा राव कहते हैं, ”वोट डालना चेतना से जुड़ा हुआ मुद्दा नहीं है. यह आदत भी होती है और कई बार वोट देना एक मजबूरी की तरह भी होता है. ठीक उसी तरह, जैसे ख़राब खाना मिलने के बाद भी लोगों को होटल में जाना पड़ता है. इसके अलावा बस्तर में तो सरकार के लोग और सुरक्षा बलों के लोग ही वोटिंग करते हैं.”

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