‘नीरजा’ के परिवार ने हमें हां की

मुंबई | मनोरंजन डेस्क: राम माधवानी इसके लिये साधुवाद के पात्र हैं कि उन्होंने घटना के करीब 30 साल बाद की पीढ़ी को नीरजा भनोट की बहादुरी से परिचित करवाया है. वर्ना 1986 घटी घटना आज के जमाने के कितने लोग जानते थे. हालांकि इससे पहले कईयों ने नीरजा भनोट पर फिल्म बनाने के लिये उसके परिवार से संपर्क किया था परन्तु हां रां माधवानी को ही मिली. फिल्म-निर्देशक राम माधवानी ने कहा कि नीरजा भनोट के परिवार ने नीरजा पर फिल्म बनाने के लिए बहुतों को मना कर दिया, लेकिन उन्होंने हम पर भरोसा जताया.

राम माधवानी ने कहा, “फिल्म निर्माता अतुल कस्बेकर ने शुरू में नीरजा के परिवार से बातचीत की. इससे पहले कई लोगों ने नीरजा पर फिल्म बनाने के बारे में पूछा लेकिन उन्होंने सभी को मना कर दिया और हमें हां कह दिया.”


राम माधवानी द्वारा निर्देशित फिल्म आतंकवादियों द्वारा 1986 में पैन एम के एक विमान (फ्लाइट 73) को अगवा किए जाने की कहानी पर आधारित है, जिसमें 23 वर्षीय नीरजा एयर हॉस्टेस थीं. उन्होंने 359 से अधिक लोगों को बचाने के लिए अपनी जान दे दी थी. इसके लिए उन्हें अशोक चक्र से नवाजा गया.

‘तारे जमीन पर’ जैसी फिल्मों का निर्देशन कर चुके राम माधवानी ने बताया, “मेरे दोस्त अतुल कस्बेकर ने पहले मुझसे संपर्क किया, उन्होंने मुझे नीरजा के बारे में जानने के लिए कहा, मैं ऐसे कुछ लोगों में से था जो नीरजा के बारे में नहीं जानते थे, लेकिन मैं उनके बारे में जानना चाहता था. मुझे विमान घटना के बारे में पता था और यह भी पता था कि उन्हें अशोक चक्र दिया गया है. अतुल ने मुझसे इस पर फिल्म बनाने के बारे में पूछा और मैंने तुरंत हां कह दिया क्योंकि यह कहानी सभी को बताने की जरूरत है.”

‘नीरजा’ की कहानी-
साल 1986 में मुम्बई से न्यूयॉर्क के लिये रवाना पैन ऍम-73 को कराची में चार आतंकवादियों ने अपहृत कर लिया था. आतंकियों ने सारे यात्रियों को बंधक बना लिया. नीरजा उस विमान में सीनियर पर्सर के रूप में नियुक्त थीं. उन्हीं की सूचना पर चालक दल के तीन सदस्य विमान के कॉकपिट से तुरंत सुरक्षित निकलने में कामयाब हो गये थे. पीछे रह गयी सबसे वरिष्ठ विमानकर्मी के रूप में यात्रियों की जिम्मेवारी नीरजा के ऊपर थी. 17 घंटों के बाद आतंकवादियों ने यात्रियों की हत्या शुरू कर दी और विमान में विस्फोटक लगाने शुरू किये तो नीरजा ने विमान का इमरजेंसी दरवाजा खोल दिया जिससे यात्री सुरक्षित बाहर निकल सके.

नीरजा भनोट चाहतीं तो दरवाजा खोलते ही खुद पहले कूदकर निकल सकती थीं किन्तु उन्होंने ऐसा न करके पहले यात्रियों को निकलने का प्रयास किया. इसी प्रयास में 3 बच्चों को निकालते हुए जब एक आतंकवादी ने बच्चों पर गोली चलानी चाही तो नीरजा के बीच में आक गई. नीरजा के इस वीरता ने उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हीरोइन ऑफ हाईजैक के रूप में मशहूरियत दिलाई.

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