प्रभावी संवादों से भरपूर एक नवाचार है न्यूटन

बिकास के शर्मा
न्यूटन फिल्म में एक दृश्य आता है, जहां पंकज त्रिपाठी द्वारा निभाया गया किरदार-सीआरपीएफ अधिकारी- आत्मा सिंह कुछ अन्य जवानों के सहयोग से न्यूटन कुमार यानी राजकुमार राव को जमीन पर पटक कर उसको धूल चटा देता है और ठीक इसके कुछ देर पहले जो हुआ उससे इन पंक्तियों के लेखक को ग्वालियर के प्रसिद्ध जनवादी कवि मुकुट बिहारी सरोज की एक कविता की पंक्तियां याद आई, “मरहम से क्या होगा यह फोड़ा नासूरी है, अब तो इसकी चीर-फाड़ करना मजबूरी है. अब तुम कहो कि ये हिंसा है, होगी, लेकिन बहुत जरूरी है.“

फिल्म के कुछ प्रारंभिक दृश्यों को देखकर एवं न्यूटन कुमार के संवादों को सुनकर यह महसूस होने लगता है कि यह लड़का बचपन से ही अपनी सोच के रास्ते पर चलकर बड़ा हुआ है क्योंकि न पसंद आने के फलस्वरूप वह अपने नाम को ही बदलकर ‘नूतन कुमार’ से ‘न्यूटन कुमार’ बनता है.


न्यूटन इस बात को लेकर चिंतित रहता है कि देश में लोग अपना-अपना काम ईमानदारी से एवं तन्मयता से क्यों नहीं करते और कालांतर में वह ऐसा करते-करते खुद को मानक भी मानने लग जाता है. कहानी अनुसार न्यूटन की अपनी तरह की अलग सोच के कारण ही वह हिंसा तक के लिए आतुर हो उठता है और आत्मा सिंह के सामने बंदूक तानकर खड़ा हो जाता है. सीआरपीएफ की समूची टुकड़ी को चेतावनी देता है कि उसके निर्धारित काम में कोई बाधा आई तो वह गोली चला देगा.

यही फिल्म का सबसे प्रभावी दृश्य भी है, जहां न्यूटन इकाई न होकर सामूहिक अवचेतन का प्रतिनिधित्व करता है. वह हिंसा करना जरूरी समझता है ताकि उसके अनुसार जो फोड़ा है उसे नासूर बनने से रस्ते में थोड़ी खलल पैदा की जाये. ईमानदारी का रेखांकन फिल्म में कोई नई बात नहीं किन्तु इस फिल्म में प्रोटेग्निस्ट को उसके विचारों के साथ जिस मजबूती के साथ खड़ा किया गया है, साथ ही सुनहरे पर्दे पर उसका फिल्मांकन इतना संप्रेषणीय है, कि एक सजग दर्शक के मन में फिल्म पूरी हो जाने के बाद कई सवाल कुलबुलाते हैं. शायद, यह फिल्म पूरी न होकर ‘टू बी कन्टीन्यूड’ के ‘डॉट्स’ को हमारे दिल की घड़कन में ऐसा घोलती है कि हमें बीच-बीच में खुद को थोड़ा सा छूकर पता लगाना पड़ेगा कि हम जिंदा हैं भी या नहीं.

फिल्म के जानकारों ने इसे ‘कल्ट’ की श्रेणी में खड़ा किया है जो अनायास ही नहीं होता, बल्कि इसके कारण को समझने हेतु हमें फिल्म में उठाये गए कुछ प्रश्नों या बिन्दुओं से जूझना होगा.

अव्वल तो यह कि क्या लोकतंत्र के सबसे बड़े जलसे के रूप में हमारे सामने चुनाव का आना ही उसके परिपक्व होने का एक मात्र पैमाना है? क्योंकि, फिल्म में एक दृश्य आता है जहाँ, छत्तीसगढ़ (जहाँ की पृष्ठभूमि पर यह फिल्म बनाई गयी है) के बस्तर का डीजीपी (दानिश हुसैनी) एक अमरीकी पत्रकार को पोलिंग बूथ पर लेकर आता है और वह पत्रकार कहती है कि यहाँ माओवादियों ने चुनाव का बहिष्कार किया है और वैसे क्षेत्र में शांतिपूर्ण ढंग से लोग अपने मत का प्रयोग कर रहे हैं जो कि विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का गुण है. इस दृश्य के ठीक पहले हम देखते हैं कि जवानों की एक टुकड़ी गाँव जाकर आदिवासियों को वोट देने हेतु बुलाकर लाती तो है किन्तु उस घटना की विद्रूपता हमको झकझोर कर रख देती है क्योंकि वहां लोकतंत्र ‘मुर्गी के पंखों’ की तरह तार-तार होता है. वैसे फिल्म में एक जवान जब एक आदिवासी महिला को मुर्गा पकाने का आदेशात्मक सन्देश देता है तो व्यंजन में मसाला ज्यादा डालने की बात करता है.

हास्य का अपना अलहदा मिज़ाज है और वह किस क्षण हँसाते-हँसाते आपके अन्दर संवेदना प्रवाहित कर दे, कहना मुश्किल है, और न्यूटन भी हमारे साथ यही करती है.

एक संवाद जो मलको (अंजलि पाटिल) न्यूटन से करती है, “बड़े बदलाव एक दिन में नहीं आते, बरसों लग जाते हैं जंगल बनने में,” नए प्रश्न खड़े करता है और इससे बस्तर के वनों की विशालता एवं घनत्व को दर्शाता है. न्यूटन चुनाव अधिकारी होने के नाते सफलता पूर्वक चुनाव करवाना चाहता है किन्तु उसके सामने कई स्थानीय एवं प्रशासनिक चुनौतियाँ आती हैं, जिससे वो खीजता है तो मलको का उसे यह कहना, “सर जो आज आप पहली बार देख रहे हैं न, यह हम सब बचपन से देख रहे हैं,” एक ही देश में दो तरह के देशों के होने की बात को पुष्ट करता है.

न्यूटन शहर का लड़का है और बस्तर में भी बड़े शहरों से अध्ययन एवं पत्रकारिता हेतु अनेक लोग आते हैं. बस्तर में रहने वाले पत्रकारों या लेखकों के लिए उस भू-भाग की वर्तमान समस्या पर लिखना अब केवल घटना आधारित शेष रह गया है क्योंकि वह क्षेत्र उनके लिए शहरों से आये लोगों की तरह फंतासी एवं रोमांच से भरा नहीं.

फिल्म में स्थानीय बनाम वैश्विक की अवधारणा पर भी करारा प्रहार किया गया है, जैसे कि-आत्मा सिंह का मलको को पोलिंग पार्टी के साथ जाने से यह कहकर रोकना कि वह लोकल है तो उस पर शक करना प्रासंगिक है.

आज भी रायपुर से धमतरी के रास्ते बस्तर में प्रवेश करने पर एवं बस्तर क्षेत्र में भ्रमण करने पर पुलिस या अर्ध सैनिक बालों के जवानों द्वारा आपके वाहन की चेकिंग करना अथवा आपके पहचान पत्र को मांगकर नाम पता लिखना एक आम प्रक्रिया है, जिसे ‘लॉ एंड आर्डर’ के नाम पर जारी रखा गया है. बस्तर के लिए ‘युद्ध क्षेत्र’ उसका उपनाम हो गया है और विकास की बयार वहां के गांवों तक पहुंचाना शासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है. ऐसे में बस्तर- विशेषकर सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर जिलों- के सुदूर अंचलों में निवासरत आदिवासियों से बात करने पर ज्ञात होता है कि वे क्यों वोट देना जरूरी नहीं समझते. वहां के निवासरत आदिवासी वही चाहते हैं जो मलको फिल्म में कहती है, “हमें छुटकारा चाहिए इन दोनों (जवानों एवं नक्सालियों) से,” और वह बात गोलियों के शोर में गुम हो रही है.

फिल्म को बनाने में जहाँ निर्देशक अमित मासूरकर ने काफी शोध किया है वहीँ उन्होंने स्थानीय लोगों को काम करने का मौका भी दिया है, जिसके फलन में हमें ओमकार दास मानिकपुरी, दिनेश नाग आदि स्थानीय अभिनेतों को इस नवाचारी फिल्म में देखने का मौका मिला, जो छत्तीसगढ़ के लिए हर्ष एवं गर्व का विषय है.

छत्तीसगढ़ के बस्तर में अपार खनिज एवं वनोपज व्याप्त है और धीरे-धीरे उसकी नैसर्गिकता को वहां पहुंचने वाली कंपनियों से चुनौती मिल रही है, यही आज के बस्तर का सच है और उसी सच को इस फिल्म ने भी प्रतीकात्मक किन्तु प्रभावोत्पादक ढंग से रुपहले पर्दे पर प्रदर्शित किया है, बिना किसी शोर के. रिलीज के दिन ही ऑस्कर अवार्ड हेतु नामांकित हो चुकी इस फिल्म के दृश्यों में कई जगहों पर निर्देशक ने मौन का भरपूर प्रयोग किया है, जो दर्शक को एजुकेट करता है.

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष उसके संवादों एवं दृश्यों में बिम्बों का प्रयोग है, जो अमूमन साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्मों में ही देखने को मिलता है किन्तु, यहाँ निर्देशक उसे ज्यादा गरिष्ठ नहीं होने देते. मसलन, आत्मा सिंह, न्यूटन को अपनी रायफल उठाने को देता है और यह कहता है कि यह देश का भार है जिसे जवान अपने कंधे पर उठाते हैं. अंजलि पाटिल ने मलको की भूमिका में संवादों के अंत एवं मध्य में एक मौन को स्थान दिया है, जो हमको उसके साथ जोड़ता है और जो लोग आदिवासी समुदाय को जानते-समझते हैं वे इस मौन के अर्थ खुद तलाश लेंगे, यही फिल्म का रचनात्मक सौन्दर्य भी है.

राजकुमार राव ने विगत कुछ वर्षों में बॉलीवुड में बनी बनाई परिपाटी को चुनौती देते हुए ‘सिटी लाइट्स’, ‘अलीगढ’ और ‘ट्रैप्ड’ जैसी मौलिक फिल्मों में अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ी है, जिसकी वजह से वे आज ‘एंटरटेनमेंट’ एवं ‘कंटेंट’ के बीच की गहरी खाई के ऊपर पुल बनने में सफल हुए हैं. इस विधा के सबसे चर्चित एवं विश्वसनीय अभिनेता अभय देओल माने जाते हैं और ऐसा कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि राजकुमार व अभय के रास्ते का एक ही ध्येय है-बेहतर कहानी कहना. राजकुमार एक विस्तारक है एवं आज के दौर में उन्होंने अभिनय की कला को विस्तार दिया है जो एक अभिनेता की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है.

सही मायने में यही एक फिल्म है जिसमें पंकज त्रिपाठी को उनके अनुसार ‘टर्फ’ मिली है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित पंकज हास्य से लेकर गंभीर भूमिका को बखूबी निभाते हैं और उसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि वे कहानी को सर्वोपरि मानते हैं. पंकज का यह मानना, “सिनेमा केवल मनोरंजन तो नहीं होता,” हमको आश्वस्त करता है कि अच्छी कहानियों के दौर को कभी विराम नहीं लगने वाला और अभिनय की गुफा में ध्यानमग्न होकर ही अभिनेता मंजता है.

इस फिल्म में पंकज चूँकि युद्ध क्षेत्र में अर्ध सैनिक बल के अधिकारी की भूमिका में हैं तो उन्होंने अपनी संवाद अदायगी में कहीं भी जोर नहीं दिया है. युद्ध क्षेत्र में अनावश्यक आवेश बड़ा नुकसान कर सकता है. वे इस स्थापना को बल देते हैं कि गंभीर बात करने हेतु गरजने की आवश्यकता नहीं होती अपितु, उसमें भावों का आधिक्य होना अनिवार्यता होती है. पंकज ने अपने अभिनय कौशल से इस फिल्म के माध्यम से हिंदी फिल्म जगत को एक सन्देश दिया है कि अब वे नहीं रुकने वाले.

रघुवीर यादव की उम्र का काफी लाभ निर्देशक ने लिया है और वे स्क्रीन पर अपने वास्तविक जीवन के करीब के लहजे में संवाद बोलते हैं और प्रस्तुत होते हैं. यही इस तरह के फिल्म के श्रृंगार को और बेहतर बनाता है.

खैर, वर्तमान में बस्तर की दीवारों का कंपन कम-से-कम मुंबईया फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों को वहां से दूरी बनाने के लिए पर्याप्त है, क्योंकि बहुत सीमित लोग ही आज भी बस्तर से काम करके लौट आते हैं और उनसे दहशत का कोई साबका नहीं हो पाता. फिल्मों के केंद्र में बस्तर होकर भी नहीं होता क्योंकि ‘चक्रव्यूह’ और ‘हमारी अधूरी कहानी’ से लेकर ‘न्यूटन’ तक में दंडकारण्य की पृष्ठभूमि तो है किन्तु वह खुद पर्दे पर नहीं होता. ‘न्यूटन’ की शूटिंग दल्लीराजहरा एवं आसपास के क्षेत्रों में हुई है. फिल्म को साल 2001 में आई ईरानी फिल्म ‘द सीक्रेट बैलट’ की कॉपी बताया जा रहा था, जिसे उस ईरानी फिल्म के निर्माता ने ख़ारिज कर दिया.
* लेखक युवा पत्रकार हैं

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