बड़ों को कर्ज देकर डूबते बैंक

प्रकाश करात
बैंकों का डूबे ऋणों का बोझ पिछले छ: महीने में और बढ़ गया है. भारतीय रिजर्व बैंक की ताजातरीन फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट में यह जानकारी दी गयी है. इस रिपोर्ट के अनुसार सकल डूबे हुए ऋणों (नॉन परफार्मिंग एसेट्स–एनपीए) का अनुपात, जो पिछले सितंबर में 5.1 फीसद पर था, इस साल मार्च में तेजी से बढक़र 7.6 फीसद पर पहुंच गया. इसमें इतना और जोड़ लें कि तमाम डूबे हुए ऋणों में बड़े ऋण लेने वालो का हिस्सा बढक़र 86.4 फीसद पर पहुंच चुका है, जबकि 2016 के मार्च तक कुल ऋणों में बड़े ऋण लेने वालों का हिस्सा 58 फीसद ही था. एक अनुमान के अनुसार, भुगतान विफलता के खतरे में माने जा रहे कार्पोरेट ऋणों का आंकड़ा 6.7 लाख करोड़ रु0 का है.

डूबे हुए ऋणों या बैंकों के नॉन परफार्मिंग एसेट्स की समस्या तब उभरकर सामने आ गयी, जब रिजर्व बैंक ने बैंकों से मांग की कि वे अपनी परिसंपत्तियों की गुणवत्ता की समीक्षा करें तथा अपनी बैलेंस शीट्स में स्वच्छता लाएं. इस कसरत के फलस्वरूप पता चला कि बैंकों के डूबे हुए ऋण, जितने बताए जा रहे थे उससे कहीं बहुत ज्यादा हैं. बैंकिंग क्षेत्र की यह दुर्दशा यूपीए-2 की सरकार द्वारा अब मोदी सरकार द्वारा नवउदारवादी बलाघात को बढ़ाए जाने के चलते हुई है, जिसके तहत बैंकों पर खासतौर पर ढांचागत क्षेत्र में निजी कंपनियों को बहुत उदारता से ऋण देने के लिए दबाव डाला जा रहा था. चूंकि सरकार ने राजकोषीय जिम्मेदारी की बेडिय़ां अपनी पांवों में डाल रखी थीं, ढांचागत परियोजनों में निजी-सार्वजनिक भागीदारी के नाम पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को बिजली उत्पादन, बिजली वितरण, बंदरगाह, राजमार्ग जैसे ढांचागत क्षेत्रों में ज्यादा से ज्यादा ऋण देने के लिए बढ़ावा दिया जा रहा था.


इन हालात में दरबारी पूंजीवाद को बढ़ावा दिए जाने ने यह सुनिश्चित किया कि कृपाप्राप्त बड़े कार्पोरेट खिलाडिय़ों को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अंधाधुंध तरीके से ऋण दें. निजी निवेश संचालित ढांचागत विकास की विफलता अब खुलकर सामने आ गयी है. एस्सार, जेपी, जीएमआर, रिलायंस एडीएजी, अडानी, लेंको आदि बड़ी ढांचागत कंपनियों पर डूबे हुए ऋणों का भारी बोझ, इसी का सबूत है.

लेकिन, बैंकों के डूबे हुए ऋणों के संकट का सरकार ने तोड़ यह निकाला कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, पक्के डिफॉल्टरों के ऋणों को अपने खातों से ही निकाल दें. इस तरह, 2013 से 2015 के बीच बैंकों ने पूरे 1.24 लाख करोड़ रु0 के ऋण बट्टे खाते में डाले थे. वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, जान-बूझकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के ऋण मारने वालों पर 2015 के दिसंबर तक बैंकों का 66,190 करोड़ रुपया बकाया था. चौतरफा दबाव में रिजर्व बैंक ने हाल ही में ऐसे जान-बूझकर बैंकों का ऋण मारने वालों के नाम सार्वजनिक करने का फैसला लिया है.

लेकिन, असली मुद्दा तो यह है कि ऐसे जान-बूझकर कर्जा मारने वालों के खिलाफ, उनकी परिसंपत्तियों के सरकारी अधिग्रहण तथा उनकी परिसंपत्तियों की बिक्री के जरिए, दबाए गए पैसे की वसूली के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं. अब तक तो सिर्फ इतना हुआ है कि अगर किसी व्यक्ति, कंपनी आदि को जान-बूझकर कर्जा न चुकाने वाला घोषित कर दिया जाता है, उसके लिए आइंदा ऋण के सारे रास्ते बंद कर दिए जाते हैं और उसे किसी भी बैंक या संस्था से कोई भी अतिरिक्त ऋण सुविधा हासिल नहीं हो सकती है. सरकार तथा रिजर्व बैंक को यह सुनिश्चित करने के लिए भी निर्देश देने चाहिए कि बड़े कार्पोरेट, जिन पर बैंकों का सबसे ज्यादा ऋण होता है, एक समुचित समय सीमा में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा दिए गए ऋण लौटाएं.

इन डूबे हुए ऋणों के चलते बैंकों को जो राजस्व हानि होती है, उसका बोझ खुदरा ऋण क्षेत्र पर अतिरिक्त बोझ बनाकर डाल दिया जाता है. इसका नतीजा यह होता है कि बड़े ऋण मारने वालों की करनी की सजा आवास, शिक्षा आदि के लिए छोटे-छोटे ऋण लेने वालों को और छोटे उद्यमों को भुगतनी पड़ती है.

नवउदारवादी निजाम में बैंकिंग क्षेत्र द्वारा पकड़ी गयी पूरी दिशा की ही समीक्षा किए जाने की जरूरत है. सचाई यह है कि आज ज्यादातर कृषि ऋण, किसानों को न मिलकर, कृषि-बिजनेस तथा गैर-कृषि कामों में ही जाते हैं. प्राथमिकता वाले क्षेत्र के लिए ऋण वितरण की पूरी व्यवस्था को ही भीतर से ध्वस्त कर दिया गया है. मोदी सरकार निजीकरण को नये सिरे से गति देने में लगी हुई है.

बैंकिंग क्षेत्र के निजीकरण को आगे बढ़ाए जाने से हालात और बदतर ही होंगे. रिजर्व बैंक का यह फैसला पूरी तरह से गलत है कि निजी बैंकों के लिए लाइसेंस दिए जाएं, जिसमें कार्पोरेटों द्वारा प्रायोजित निजी बैंक भी शामिल हैं. एक ओर तो सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में पूंजी डालने के लिए बहुत कम आवंटन किया है और दूसरी ओर सरकार का यह रुख है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के शेयरों के विनिवेश के जरिए पूंजी जुटायी जाए. इन दोनों कदमों का योग, सार्वजनिक बैंकिंग व्यवस्था के निजीकरण की ओर ही ले जाएगा.

जरूरत इस बात की है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में पर्याप्त पूंजी डालने की व्यवस्था की जाए. सरकार ने 2019 तक 700 अरब डालर की पूंजी सहायता दिलाने का जो वादा किया है, अपर्याप्त है. सार्वजनिक बैंकों के पुनर्पूंजीकरण की संशोधित योजना को लागू करते हुए सरकार को नवउदारवादी राजकोषीय चिंताओं को परे खिसका देना चाहिए. यह भी जरूरी है कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को ढांचागत क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए उदार होकर ऋण देने के निर्देश देना बंद करे. इस तरह का वित्त जुटाने के लिए एक वैकल्पिक संस्थागत तंत्र होना चाहिए.

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