ओबामा की विदेश नीति अदूरदर्शी

आतंकवाद के मामले में ओबामा की विदेश नीति अदूरदर्शी तथा दोमुंही है. एक तरफ ओबामा इस्लामिक स्टेट से निपटने में नाकाम रहे तथा दूसरी तरफ आतंकवाद को बढ़ावा दिये जाने के बावजूद भी पाकिस्तान को आर्थिक मदद जारी रखे हुये हैं. इसलिये भ्रम होता है कि वास्तव में उकी विदेश नीति की दिशा क्या है. अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा अपने दूसरे कार्यकाल के अंतिम पड़ाव पर है. अमरीका में लीप ईयर का यह समय भावी राष्ट्रपति की चर्चा और प्रक्रिया में व्यतीत होता है. संविधान किसी राष्ट्रपति को तीसरी बार चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं देता. ऐसे में ओबामा के लिए सांकेतिक रूप में यह सामान समेटने का वर्ष है.

आंतरिक स्तर पर उनके कार्यों की समीक्षा के अनेक बिंदु हैं. इन पर भविष्य में चर्चा होती रहेगी. लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्वव्यापी इस्लामी आतंकवाद सबसे बड़ा मुद्दा रहा है. यह सच है कि ओबामा को यह विरासत में मिला था.

तालिबान, इराक पर हमला, अमरीका पर 9/11 का हमला आदि ओबामा के राष्ट्रपति बनने के पहले की घटनाएं हैं. जाहिर तौर पर उन्हें यह समस्या विरासत में मिली थी. इसी के साथ विश्वव्यापी इस्लामी आतंकवाद विरोधी अभियान की कमान भी उन्हें मिली थी.

ओबामा जब पहली बार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे थे, तब उन्होंने वैश्विक आतंकवाद तथा खासतौर अमरीका, इसराइल व यूरोप पर उसके खतरे को भी बड़ा मुद्दा बनाया था. यह वह समय था जब इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में आतंकवादी संगठन सक्रिय थे.

ओबामा की बातों से लगा था कि वह इस बड़ी समस्या के समाधान में अपनी निर्णायक भूमिका का निर्वाह करेंगे. लेकिन इस विदाई वर्ष में ओबामा इस मसले पर संतोष व्यक्त करने की स्थिति में नहीं है.

विश्व में इस्लामी आतंकवाद का खतरा पहले के मुकाबले बहुत बढ़ा है. देखते ही देखते आईएस जैसा आतंकी संगठन विश्व के बड़े इलाके में अपनी गतिविधियों का विस्तार करने में सफल रहा. अमरीका की खुफिया एजेन्सी इस खतरे को समय रहते पहचान नहीं सकी. यह समस्या जब विकराल रूप में सामने आई, तब भी ओबामा तत्काल कदम उठाने से बचते रहे. आतंकवाद विरोधी विश्वव्यापी अभियान को समाप्त करने की कोई स्थिति नहीं थी.

महाशक्ति का राष्ट्रपति होने के कारण इसकी कमान उन्हीं के पास थी. लेकिन आईएस का जाल फैलता रहा, ओबामा अदूरदर्शिता से बाहर नहीं निकल सके. वह जानते थे कि सीरिया, इराक की सरकारें आईएस का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है. फिर भी ओबामा ने समय रहते वहां हस्तक्षेप नहीं किया. इसका आईएस ने भरपूर फायदा उठाया. उसने अपनी ताकत बहुत बढ़ा ली. धन, मादक पदार्थ, हथियारों की तस्करी का नेटवर्क बना लिया.

विश्व के अनेक देशों से वह युवकों को भर्ती करने लगा. यह स्थिति आज भी जारी है. अमरीका से अधिक तत्परता रूस ने दिखाई. रूस और फ्रांस ने मिलकर आईएस ठिकानों पर हमले किए. इससे उसे नुकसान हुआ. यदि इस काम में अमरीका का यूरोप के देशों का सहयोग रहता तो आईएस की कमर तोड़ी जा सकी थी. लेकिन तब ओबामा इस बात को प्राथमिकता दे रहे थे कि सीरिया मे किसकी सरकार होनी चाहिए. जबकि प्राथमिकता यह थी कि आईएस को समाप्त होना चाहिए.

विश्वव्यापी आतंकवाद पर ओबामा की अदूरदर्शिता यहीं तक सीमित नहीं है. पाकिस्तान के आतंकी देश होने में कोई संदेह नहीं रह गया है. विश्व में ऐसी कोई भी आतंकी घटना नहीं होती जिसके तार किसी न किसी रूप में पाकिस्तान से जुड़े न हों.

कैसी विडंबना है कि जब एक तरह आतंकी हेडली पाकिस्तान की हकीकत बयान कर रहा था, उसी समय ओबामा प्रशासन पाकिस्तान को आतंकवाद रोकने के लिए अट्ठावन अरब रुपये की सहायता का प्रस्ताव तैयार कर रहा था. इसमें अट्ठारह अरब रुपया केवल रक्षा सामग्री खरीदने के लिए होगा. यह सहायता आतंकवाद से लड़ने तथा परमाणु हथियारों की सुरक्षा के लिए दी जाएगी.

ऐसा भी नहीं कि हेडली किसी बड़े रहस्य से पर्दा उठा रहा था. या उसकी बातों की सच्चाई जांचने के लिए समय की आवश्यकता हो. हेडली तो केवल उन्हीं बातों की एक प्रकार से पुष्टि कर रहा है, जो मुम्बई पर छब्बीस ग्यारह हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को दिए गए सबूतों में कही थी. इसमें हमला करने वाले आतंकियों की पाकिस्तान में बैठे आकाओं से बातचीत के अंश भी शामिल थे.

हमले के समय भी इन आतंकियों को पाकिस्तान की जमीन से ही दिशा-निर्देश मिल रहे थे. बाद में गिरफ्तार आतंकी कसाब की बातों से भी साबित हो चुका था कि हमलावरों को पाकिस्तानी सेना और सीआईए के अधिकारियों ने ही प्रशिक्षण दिया था.

इस तथ्य को ओबामा प्रशासन के पाकिस्तान को भारी सहायता देने संबंधी प्रस्ताव से जोड़कर देखिए. इससे एकदम साफ होगा कि ओबामा का विश्वव्यापी इस्लामी आतंकवाद विरोधी अभियान कोरे आदर्शवाद और आदर्शवादिता पर आधारित है. इससे आतंकवाद पर नियंत्रण की कौन कहे, उल्टे उसको संरक्षण मिलने में तेजी आयेगी. इसका ठोस आधार है.

ओबामा प्रशासन ने जिस पाकिस्तान से आतंकवाद समाप्त करने का विश्वास किया है, भारी धनराशि इसके मद्देनजर उसके हवाले की जा रही है, वह पाकिस्तान ऐसा करने की स्थिति में ही नहीं है, जिस देश की सेना और गुप्तचर संस्था में आतंकियों को संरक्षण देने वालों का वर्चस्व है, जिस देश में निर्वाचित सरकार भी सेना के सामने लाचार हो, उस देश से यह उम्मीद करना बेमानी है कि वह आतंकवाद को रोकेगा.

अमरीका आतंकवाद रोकने के नाम पर अरबों रुपए की रक्षा सामग्री पाकिस्तान को देगा. लेकिन इन हथियारों का प्रयोग प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके सियासी सहयोगी नहीं करेंगे. यह काम तो सेना को ही करना होगा. उसमें बड़ी संख्या में आतंकी संगठनों के सहयोगी, हमदर्द और मुखबिर है.

ऐसे में पाकिस्तानी सरकार से आतंकवादियों पर कार्रवाई करने की उम्मीद बेबुनियाद है. यह सहायता दशकों से दी जा रही है. ओबामा की समझदारी इसमें थी कि वह पहले दी जा रही सहायता की समीक्षा करते. तब पता चलता यह सहायता कहां खर्च हो रही है. लेकिन ओबामा ने अदूरदर्शिता दिखाई है.

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