नेताओं को नहीं, इन्हें याद रहा

कोरबा | अब्दुल असलम: कोरवा आदिवासियों को नेता भले ही भूल गये लेकिन ये आदिवासी मतदान करना नहीं भूले. लोकतंत्र के महापर्व मे वैसे तो देश के करोड़ों मतदाताओ ने मतदान डाल कर अपनी आहुति दी लेकिन इनमें सबसे खास लोग वो रहे, जो जान जोखिम में डाल कर भी मतदान करने पहुंचे.

छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में सैकडों मतदाता नदी पार कर वोट देने पहुंचे.नदी जंगल के बीच मुलभूत सुविधाओ से वंचित रहने वाले राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र पहाडी कोरवा को सरकार आज़ादी के 65 साल बाद भी ज़रुरी सुविधाएं नहीं मिल पातीं. लेकिन कोरबा जिले के रामपुर विधान सभा क्षेत्र के ग्राम पोखरा आमा, कुकरीचोली और कांशीपानी के विशेष संरक्षित जन जाति के लोग अपना कर्तव्य का पालन करना नहीं भूलते.


पहाड़ी कोरवाओं का यह समुदाय अपने दैनिंदन कार्यों के लिये एक अदद पुल के अभाव में जान जोखिम में डाल कर बांगो के डुबान को पार कर करता है. लेकिन यह सब होने पर भी ये आदिवासी सतरेंगा के मतदान केन्द्र में वोट डालना कभी नही भुलते.

इस गांव मे कुल 88 मतदाता सतरेंगा के पोलिग बूथ में नदी नाव से नदी पार कर मतदान करने पहुचे. नेताओं के झुठे वादे और इनसे जीवन काल में कई सरकार बनी लेकिन इन बेबस लोगो की सुध लेने भले ही नेता जी उनके दरवाजे नही पहुचे. लेकिन एक जिम्मेदार देश के नागरिक होने का परिचय देना ये कोरवा कभी नही भुलते.

पोखरा आमा, कुकरीचोली और कांशी पानी के कोरवा मतदाताओ में मतदान को लेकर काफी उत्साह था. जहां एक ओर शहरी इलाको में कई लोग मतदान करने नहीं पहुचे, वहीं संरक्षित जनजाति के पहाड़ी कोरवा पहाड़ों से उतरकर मतदान के लिये जा पहुंचे. कई किलोमीटर पैदल दूरी तय करके मतदान के लिये पहुंचे इन पहाड़ी कोरवाओं को पिछले विधानसभा चुनावों में नेताओं के झूठे वादे भी याद थे. इस बार तो चुनाव प्रचार के लिये इन गांवों में कोई नेता गया भी नहीं. लेकिन मतदान की तारीख पर इन पहाड़ी कोरवाओं ने नेताजी को नहीं, लोकतंत्र को याद रखा.

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