अतीत के साथ वर्तमान

सुनील कुमार
मीडिया में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए इन दिनों ट्विटर पर एक दिलचस्प झगड़ा चल रहा है. लंबे समय तक एनडीटीवी पर काम करने वाली, और उसकी सबसे दिग्गज टीवी जर्नलिस्टों में से एक बरखा दत्त एनडीटीवी पर टूट पड़ी हैं. और महज अपने निकल जाने के बाद के एनडीटीवी पर नहीं, बल्कि अपने वहां रहने के वक्त की बातों को लेकर भी. दूसरी तरफ अभी एनडीटीवी में काम कर रहीं कुछ दूसरी महिला जर्नलिस्ट ऐसी हैं जो कि बरखा दत्त के सितारा दर्जे के सामने कभी उभर नहीं पाई थीं, और उनमें से कुछ ने अभी एनडीटीवी की तरफ से मोर्चा सम्हाला है. कुछ लोग चटखारे लेकर इस झगड़े को देख रहे हैं क्योंकि भारत में एनडीटीवी के विरोधियों का एक बड़ा तबका ऐसा है जो कि इसे और गहरी मुसीबत में देखने की हसरत रखता है, और वह बरखा दत्त को री-ट्वीट करने में लगा हुआ है.

इस पर कल जब मैंने यह ट्वीट किया कि इन दोनों खेमों सहित बाकी लोगों को भी यह सीखना चाहिए कि अपने भूतकाल के साथ कैसे जिया जाए, भूतपूर्व मालिक के साथ, भूतपूर्व कर्मचारी के साथ, भूतपूर्व सहयोगियों के साथ, तो इस ट्वीट पर एक बहुत ही दिलचस्प इंसान की तरफ से तारीफ का एक शब्द पोस्ट हुआ जिसका कि इस झगड़े से, या कि राजनीति से कोई लेना-देना नहीं दिखता है. विराट कोहली ने इस ट्वीट के जवाब में तारीफ का एक शब्द लिखा, और वह शब्द शायद बरखा और उसकी भूतपूर्व सहयोगियों के लिए नसीहत का एक अधिक भारी-भरकम ट्वीट था, मेरे ट्वीट के मुकाबले.


दिक्कत यह है कि लोग अपने भूत के साथ जीने का शऊर नहीं रखते. भूतपूर्व पति-पत्नी या भूतपूर्व प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे से हिसाब चुकता करने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं. मध्यप्रदेश में बहुत पहले एक बड़ा दिलचस्प मामला था जब एक चर्चित आदमी ने अपनी बीवी को तलाक दे दिया था, और उसके बाद उस महिला की किसी और से दोस्ती हुई, और उस दोस्ती को बर्दाश्त न करते हुए वह भूतपूर्व पति उस दोस्त या प्रेमी का वर्तमान दुश्मन बन बैठा, और अपनी ताकत का बड़ा इस्तेमाल उसे बर्बाद करने में लगाने लगा. भारत की राजनीति में हम रोज ही देखते हैं कि कल तक के हमप्याला-हमनिवाला लोग पार्टी बदलते ही एक-दूसरे के खिलाफ ऊंचे दर्जे का जहर उगलने लगते हैं, और खून के प्यासे हो जाते हैं.


यह पूरा सिलसिला लोगों का अपना ओछापन बताता है कि वे किस घटिया दर्जे के लोग हैं. अगर भूत को जगाने की कोशिश की जाए, तो बहुत करीबी रहे हुए लोग आत्मघाती अंदाज में एक-दूसरे का भारी नुकसान कर सकते हैं, और अपना खुद का भी. लेकिन यह मामूली बात उनकी मोटी समझ में नहीं बैठ पाती कि ऐसा करते हुए वे अपनी खुद की साख पूरी तरह खत्म कर बैठते हैं. आसपास के और लोग समझ जाते हैं कि इनसे संबंध रखने का मतलब कुछ बरस बाद जाकर खुद भी अपनी ऐसी-तैसी करवाना है, इसलिए बाजार में ऐसे लोगों की साख गटर की गहराईयों तक पहुंची हुई रहती है.

भारत की राजनीति में एक इंसान ऐसा भी दिखता है जिसने रिश्ता खत्म होने के बाद कभी मुंह भी नहीं खोला. राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए उनके रक्षा राज्यमंत्री रहे अरूण सिंह राजीव-सरकार से अलग होने के बाद जाकर पहाड़ में बस गए, और उनके बारे में बाद में किसी ने देखा-सुना भी नहीं. उन्होंने कभी भी अपनी जुबान राजीव-सरकार या उसके विवादास्पद बोफोर्स सौदे सहित किसी भी बारे में नहीं खोली. भारतीय राजनीति में ऐसा बहुत ही कम देखने में आया है. दूसरी तरफ जो नेहरू के वफादार निजी सहायक होने का दंभ रखते रहा, वह ओ.एम. मथाई अपनी आत्मकथा में नेहरू की बेटी के बारे में अश्लील इशारों के साथ बेबुनियाद गंदी बातों को लिखकर अपनी किताब बेचता रहा.

दरअसल इंसान आमतौर पर ऐसा ही ओछा और घटिया होता है, और गिने-चुने लोग ही ऐसे ओछेपन से ऊपर उबर पाते हैं कि वे अपने भूतकाल को सचमुच ही भूत बने रहने दें. आमतौर पर लोग भूतकाल से कुश्ती लड़ते हुए अपना वर्तमान बर्बाद कर बैठते हैं, और अपना भविष्य भी.

लोगों को याद होगा कि जब इमरजेंसी के वक्त बाबू जगजीवन राम इंदिरा गांधी से अलग हो रहे थे, या अलग हो चुके थे, तब इंदिरा के तानाशाह बेटे संजय की पत्नी मेनका ने अपनी नई-नई पत्रिका, सूर्या, में जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम और उसकी महिला मित्र सुषमा की बंद कमरे की अंतरंग तस्वीरों को छापने का एक ऐसा काम किया था जो कि भारतीय पत्रकारिता में न उसके पहले हुआ, न उसके बाद. वह पूरा का पूरा अंक महज इन्हीं सेक्स-तस्वीरों से भरा हुआ था, और उन तस्वीरों का न तो कोई सार्वजनिक महत्व था, न ही सुरेश राम किसी तरह की सार्वजनिक जिंदगी में था. बाबू जगजीवन राम से हिसाब चुकता करने के लिए, या कि उन्हें ब्लैकमेल करने के लिए, नेहरू की बेटी इंदिरा की बहू ने ऐसा घटिया काम किया था, और जाहिर है कि यह इंदिरा की सहमति से किया गया होगा. जगजीवन राम से लंबे संबंधों का कोई महत्व नहीं रह गया, और नेहरू का कुनबा भारत के इतिहास की सबसे बुरी पीत-पत्रकारिता पर उतर आया.

लेकिन भूत भगाए नहीं भागते हैं. अभी मेनका के सांसद बेटे वरूण गांधी की उसी किस्म की कई तस्वीरों का सैलाब दिल्ली में आया हुआ है क्योंकि वे भाजपा की मौजूदा रीति-नीति से कुछ तिरछे-तिरछे चल रहे हैं, और ऐसी अफवाहें भी हैं कि वे भाजपा छोड़ सकते हैं. ऐसे में उनकी बताई जा रही ऐसी सेक्स-तस्वीरों का बाजार में आना, सूर्या पत्रिका के उस अंक की याद तो दिलाता ही है. यह अपने भूतकाल के साथ जीने की क्षमता में कमी की एक और मिसाल है कि अगर कोई सांसद पार्टी का भूतपूर्व बनते दिख रहा है, तो उसे इस तरह से निपटाया जाए, या कि रोका जाए.

राजनीति तो है ही घटिया, लेकिन इंसानों को ऐसे घटियापे से उबरने की कोशिश करनी चाहिए. अच्छे दिनों के रिश्तों की जानकारी को बुरे दिनों के हिसाब चुकता करने के लिए इस्तेमाल करने का कोई अंत नहीं हो सकता. यह सिलसिला सबको जलाकर रख देता है, और आत्मघाती आतंकियों का यह अंदाज भले इंसानों का कभी नहीं हो सकता. इसलिए लोगों को अपने अतीत के साथ वर्तमान व्यतीत करना आना चाहिए.

अभी मुंबई में देश की एक सबसे बड़ी विज्ञापन एजेंसी में कल्पनाशील काम करने वाले एक बड़े कामयाब और नामी-गिरामी नौजवान ने काम छोड़ा. इसके बाद इस विज्ञापन एजेंसी ने मुंबई की सड़कों के किनारे कम से कम एक बड़े महंगे होर्डिंग पर उसके लिए बिदाई संदेश टांगकर यह लिखा- राजीव राव, जहां कहीं जाओगे, हमारा प्यार तुम्हारा पीछा करता रहेगा, तुम्हारी कमी खलती रहेगी, जहां भी रहो, कामयाब रहो-ओजिल्वी (विज्ञापन एजेंसी).
* लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार और शाम के अखबार छत्तीसगढ़ के संपादक हैं.

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