छत्तीसगढ़ी, नक्सलगढी़, पत्थलगड़ी

कनक तिवारी | फेसबुक: छत्तीसगढ़ में आदिवासी जशपुर इलाके से शुरू कर जगह जगह एक नए किस्म की चुनौती सत्ता स्वभाव को देने लालायित हो रहे है. इसे पत्थलगड़ी अभियान का लोकप्रिय नाम मिल गया है. वे पत्थर गाड़कर आदिवासी इलाके की सरहद तय करते हैं. नहीं चाहते कि उस इलाके में मौजूदा सत्ता मशीनरी का दखल हो. वे आंतरिक प्रशासन और खुद के अनुशासन के जरिए प्रबंधन के नए आयाम ढूंढ़ना कहना चाहते हैं. आदिवासी अस्मिता इतिहास की चिनगारी की तरह बार बार कौंधती देखी गई है. छत्तीसगढ़ में तो नारायण सिंह नामक आदिवासी जमींदार ने ही अंग्रेजी जुल्म के खिलाफ शहादत देकर बगावत का बिगुल फूंका था. उसके अतिरिक्त भी बस्तर में गुंडाधूर, डोंगरगांव में रामाधीन गोंड़, चौकी के लाल श्याम शाह जैसे कई आदिवासी जनायनक हुए हैं. वे अपने अधिकारों के लिए खून पसीना बहाने तक को प्रतिबद्ध रहे हैं. यह हो सकता है कि मौजूदा आदिवासी जुगनू की चमक की तरह प्रतिरोध का एक प्रतीक बनकर रहें. उसे सत्ता और समाज के हाशिए पर रखकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए. राजनीति के पचड़े में पड़े बिना सरकार का दृष्टिकोण जिरह और जांच मांगता है. मुख्यमंत्री ने आसानी से कह दिया पत्थलगड़ी अभियान के पीछे ईसाई मिशनरियों का हाथ है.

हिंदुत्व की ताकतों में इतने अंतर्विरोध और मतिभ्रम हैं. वैज्ञानिक जांच से पोस्टमार्टम की रिपोर्ट की तरह उनका खुलासा हो जाता है. संविधान में सिक्ख, जैन, बौद्ध, पारसी, मुसलमान वगैरह को अल्पसंख्यकों का दर्जा दिया गया है. हिन्दू दलित डॉ. अंबेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष और बाद में कानून मंत्री रहे. तब बौद्धों की संख्या बहुत नहीं थी. आजादी के बाद बाबा साहेब की ही अगुवाई में नागपुर में ही लाखों दलित हिन्दू धर्म छोड़ बौद्ध बन गए. तब हिन्दुत्व के स्वनामधन्य विचारकों ने आत्मविश्लेषण नहीं किया. नागपुर में ही संघ का मुख्यालय रहा है. दलितों पर अल्पसंख्यक धर्मों के लोग अत्याचार नहीं कर रहे थे. यह थोकबंद धर्मांतरण हिन्दुत्व के फतवों के खिलाफ था. इस पर विवाद की स्थिति नहीं बनती.


विवेकानंद और गांधी धर्मांतरण के सख्त खिलाफ थे. धर्मांतरण हिन्दुओं का ईसाइयत और इस्लाम में ही हो रहा था. दोनों महापुरुषों ने दलितों पर अत्याचार करने वाले हिंदू पोंगापंडितों के मुंह से नकाब नोचे. दलितों को अपनी आत्मा के आगोश में लिया. हिन्दुत्व के ताबेदार विवेकानंद फाउंडेशन बनाते हैं. गांधी को शौचालय में प्रतिष्ठित करते हैं. दलितों के घर होटल की थाली बुलाकर भोजन करते हैं. सबकी तस्वीरें खिंचवाते हैं. पालतू मीडिया के पास बहुत से फालतू काम भी होते हैं. यही हाल आदिवासी की हालत को लेकर है. इसमें शक नहीं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने वनवासियों की सेवा का बीड़ा जरूर उठाया है. शिक्षा के इलाके में भी उन्होंने ईसाई मिशनरियों के मुकाबले काम करना जारी रखा है. यह सामाजिक और सतही तौर से लोककल्याणकारी है. ईसाई मिशनरियों के मन में आदिवासियों के लिए जातिगत घृणा नहीं होती. उच्च वर्णीय हिन्दुओं में होती ही है. जातिवाद ही तो हिन्दू धर्म का जहर है वरना हमारे पुरखों के विचारों में अमृत ही अमृत भरा है. उसकी ही बूंदें तो बुद्ध से लेकर विवेकानंद तक ने सारी दुनिया में छलकाई हैं. यह समस्या राजनीतिक बयानबाजी और हथियारबंद सरकारी हिंसा के जरिए तय नहीं हो सकती है. आदिवासी की अस्मत और अस्मिता लोकतंत्र की आंखें हैं उनसे इंसानियत के मानक रूपों का क्षितिज दिखाई देता है.

राजनीति में आरक्षण को लेकर उच्चवर्णीय नाक भौं सिकोडना सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा है. विधायिकाओं में आरक्षण के बावजूद मलाईदार विभाग आदिवासी मंत्रियों को नहीं दिए जाते. वे वैश्य वृत्ति के मंत्रियों तक सीमित होते हैं. मलाईदार विभाग रखने से भी उन्हें अपच नहीं होती. सरकारी नौकरी में आदिवासियों और दलितों को स्वतंत्र प्रभार देने के बदले लूपलाइन तथा दोयम दर्जें के विभाग और स्थापनाओं में खपाया जाता है. सुप्रीम कोर्ट तक अपने फैसलों में कह चुका है कि तरक्की में आरक्षण देने के पहले संविधान की धारा 338 के तहत देख लिया जाए कि दलित और आदिवासी उपरोक्त पदों के काबिल तो हैं. दूसरी तरफ सरकार उलटबांसी करती हुई सुप्रीम कोर्ट के काॅलेजियम को चिट्ठी लिखती है कि (ईसाई) जस्टिस जोसेफ की प्रोन्नति से सरकार का इत्तफाक नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के जजों में आरक्षित वर्ग के लोगों को भी भेजने की पहल होनी चाहिए.

डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा और अरविंद नेताम की अगुवाई में कुछ बरस पहले बस्तर में संविधान की पांचवीं अनुसूची के बदले पूर्वोंत्तर राज्यों में लागू छठवीं अनुसूची को अमल में लाए जाने की पहल की गई थी. उसे वैश्य वृत्ति, सरकार और फाइव स्टार आदिवासी नेताओं ने मिलकर कुचला. तय ही नहीं होता कि प्रथम मुख्यमंत्री अब भी आदिवासी हैं कि नहीं. सरकारी पदों की बंदरबांट से अलग हटकर सामासिक और सामाजिक एकता के लायक आदिवासी वर्ग के साथ केवल मजहब के आधार पर विचार निर्धारित नहीं हो सकते. दलित बौद्ध धर्म में जाएं और आदिवासी ईसाई बनें. तो आग पड़ोसी के घर में लगी- ऐसा नहीं कहा जा सकता. विवेकानंद का ‘भगवा रंग‘ वस्त्रों में और ‘गर्व से कहो मैं हिन्दू हूं’ का अधूरा वाक्य माथे पर लीप लेने के बावजूद जानना जरूरी है कि रामकृष्ण मिशन ने खुद को हिन्दू धर्म का अनुयायी होना नहीं कहा. मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया. सुप्रीम कोर्ट ने अलबत्ता माना कि रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा हिन्दू धर्म के तहत ही है.

तकनीकी तौर पर संविधान आदिवासियों को हिन्दू कहता है. हिन्दू धर्म के अधिकांश क्रियाकर्म, पूजापाठ और तीज त्यौहार सहित दैनिक आचरण में आदिवासी औपचारिक हिन्दू धर्म से अलग थलग होते हैं. हजारों लाखों देवताओं के चोचलों से अलग हटकर उनके बड़ा देव याने महादेव होते हैं. बहुत तकनीकी होकर सोचें तो उन्हें शैव कहा जाए. हिन्दू धर्म में तो विष्णु के उपासक अर्थात् वैष्णवों की संख्या वैश्यों से कहीं ज्यादा है. यहां भी आदिवासी अल्पसंख्यक हो गए. जनविद्रोह या क्रांति का दूध गर्म होता है तो उसे ठंडा कर मलाई को गड़प करने की वृत्ति को ठीक नहीं समझा जाता है. जनविरोधी समझा जाता है. आदिवासी वर्ग में भी कई पुश्तैनी आरक्षण प्राप्त और सेवानिवृत्त होते अधिकारी हैं. उन्होंने समस्याओं का दूध तो गर्म नहीं किया है लेकिन उनकी निगाह और आदतें सबकी नजर में हैं.

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