छत्तीसगढ़: पोलावरम बांध से नुकसान

रायपुर | समाचार डेस्क: पोलावरम बांध को लेकर अब छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूचाल आने के आसार दिख रहे हैं. छत्तीसगढ़ विधानसभा में इस बांध की ऊंचाई कम करने संबंधी अशासकीय संकल्प सर्वसम्मति से पारित किया जा चुका है. अब यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जाएगा.

इधर, बस्तर के बांध प्रभावितों को साथ लेकर सड़क की लड़ाई शुरू करने की तैयारी की जा रही है. दिलचस्प यह है कि बांध के मौजूदा स्वरूप के पक्ष में केंद्र सरकार और भाजपा भी है, साथ ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी बांध के पक्ष में हैं.

भाजपा के राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ जनजातीय नेता नंदकुमार साय ने कहा है कि वह बांध की ऊंचाई 150 फीट से ज्यादा किए जाने के खिलाफ हैं. उनका कहना है, “हमें ऐसा बांध नहीं चाहिए, जिसकी वजह से आदिवासी समाज के लोग प्रभावित हों और छत्तीसगढ़ की भूमि डूबान में आए.”

पोलावरम बांध को लेकर जहां एक तरफ भाजपा और कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की एक राय है, लेकिन राज्य के हितों को लेकर छत्तीसगढ़ भाजपा और कांग्रेस से जुड़े नेता एक अलग लड़ाई की तैयारी में हैं.

इस मसले को लेकर कांग्रेस से निष्कासित विधायक अमित जोगी ने 18 मार्च को विधानसभा में एक अशासकीय संकल्प पेश किया, जिसमें बांध की प्रस्तावित ऊंचाई 177 फीट की जगह 150 फीट रखने की बात कही गई है. इस प्रस्ताव पर राज्य विधानसभा ने सर्वसम्मति जताई है.

क्या है पोलावरम परियोजना?

पोलावरम बांध की ज्यादा ऊंचाई से सुकमा जिले के कोंटा क्षेत्र के डूबान में आने की आशंका जताई जा रही है. कुछ अन्य लोगों का कहना है कि इससे सीधे तौर पर असर नहीं होगा. लेकिन गोदावरी नदी से मिलने वाली सबरी नदी और सहायक नालों में बांध का पानी आने से वाले बैक वॉटर से एक बड़ा भू-भाग के डूबने की आंशका बनी रहेगी.

परियोजना का निर्माण छत्तीसगढ़ के कोटा क्षेत्र में डूबान का अधिकतम स्तर आरएल प्लस 150 फीट यानी 45.75 मीटर रखने पर पूर्व में सहमति हुई थी. वर्तमान स्थिति में आरएल 177 तक पहुंचने की बात कही जा रही है और यदि ऐसी स्थिति बनती है तो सुकमा जिले के अठारह बसाहट क्षेत्र के डूबने का खतरा बताया जा रहा है.

प्रदेश सरकार ने बांध की ऊंचाई समझौते के अनुरूप आरएल 150 फीट रखने की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर रखी है. दूसरी ओर सुकमा के डूबान क्षेत्र में आने वाले बसाहट क्षेत्र के लोग विस्थापन को लेकर परेशान हैं और परियोजना के डुबान से क्षेत्र को बाहर रखने की मांग कर रहे हैं.

समझौते की शर्तो में बदलाव :

अगस्त 1978 को हुए अंतर्राज्यीय समझौते में परियोजना का छत्तीसगढ़ में डूबान का अधिकतम स्तर बैक वॉटर प्रभाव सहित आरएल 150 रखने का जिक्र है. तत्कालीन आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश व ओड़िशा के बीच 2 अप्रैल 1980 को हुए समझौते के अनुसार, यदि आरएल 150 फीट से अधिक जाने की स्थिति बनती है, जैसी की संभावना है तो आंध्रप्रदेश शासन आवश्यक सुरक्षात्मक तटबंध का निर्माण एवं रखरखाव करेगा और जल निकासी की भी व्यवस्था करेगा.

कई गांव डूब जाएंगे :

जानकारों के मुताबिक, बांध की ऊंचाई 45.75 मीटर से अधिक होने पर सुकमा जिले के 18 बसाहट क्षेत्र, राष्ट्रीय राजमार्ग का एर्राबोर से कोंटा के बीच 13 किलोमीटर का हिस्सा, पांच हजार हेक्टेयर से अधिक जमीन डूब जाएगी.

डूबने वाले गांवों में कोंटा और वेंकटपुरम के अलावा ढोढरा, सुन्नमगुड़, चिंताकोंटा, मंगलगुड़ा, इंजरम, फंदीगुड़ा, इरपागुड़ा, आसीरगुड़ा, पेदाकिसोली, बोजरायगुड़ा, जगावरम, बंजामगुड़ा, मेटागुड़ा, राजपेंटा, दरभागुड़ा शामिल हैं.

ये 18 गांव पांच ग्राम पंचायत और एक नगरपंचायत के तहत हैं. तहसीलदार कोंटा की राज्य शासन को भेजी गई रिपोर्ट के अनुसार, परियोजना के डूबान से दोरला जनजाति के विलुप्त होने का खतरा है और ऐसा होने पर दोरला संस्कृति भी नष्ट हो जाएगी.

बांध की ऊंचाई समझौते से अधिक होने पर कोंटा क्षेत्र में मिलने वाले कई बहुमूल्य खनिजों के भंडार हमेशा-हमेशा के लिए जलसमाधि में चले जाएंगे. ग्रेनाइट, क्वाट्र्ज, टिन आदि मुख्य खनिजों का बड़ा भंडार इस इलाके में है.

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