सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ छत्तीसगढ़

रायपुर | बीबीसी: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर के कई स्कूलों में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद सुरक्षा बलों को ठहराने पर विवाद शुरू हो गया है.

कुछ इलाक़ों में चुनाव होने तक स्कूल बंद रखने की घोषणा कर दी गई है, तो कई जगह बच्चे स्कूल खुलने की उम्मीद के साथ रोज़ स्कूल पहुंच रहे हैं मगर स्कूल में सुरक्षा बलों के ‘क़ब्ज़े’ के कारण उन्हें लौटना पड़ रहा है. इस मसले पर छत्तीसगढ़ सरकार के ख़िलाफ़ याचिका दायर करने वाली नंदिनी सुंदर ने इसे ग़ैरकानूनी बताया है. वहीं राज्य के पुलिस महानिदेशक रामनिवास का दावा है कि सब कुछ चुनाव आयोग के निर्देश के अनुसार हो रहा है.

मगर क़ानून के जानकार इसे सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना बता रहे हैं. 18 जनवरी 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राध्यापक नंदिनी सुंदर की याचिका पर सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ सरकार को सुरक्षा बलों को स्कूलों, हॉस्टलों और आश्रमों से हटाने को कहा था.

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा अदालत को गुमराह किए जाने पर फटकार भी लगाई थी. इसी साल 22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को स्कूलों में पुलिस कैंप के मुद्दे पर अवमानना नोटिस भी जारी किया. बस्तर की 12 और राजनांदगांव की 6 विधानसभा सीटों पर 11 नवंबर को मतदान होना है. बस्तर में इस बार 63 फ़ीसदी मतदान केंद्रों को संवेदनशील माना गया है.

हालत यह है कि बीजापुर ज़िले में 243 मतदान केंद्र हैं, जिनमें 104 मतदान केंद्र अतिसंवेदनशील हैं, तो 139 संवेदनशील.

पुलिस सूत्रों के मुताबिक़ बस्तर और राजनांदगांव में चुनाव के लिए राज्य पुलिस के अलावा केंद्रीय और राज्य सशस्त्र बलों की 560 कंपनियां तैनात की जा रही हैं.

इस इलाक़े में पहले से ही सुरक्षाबलों की 33 बटालियन तैनात हैं और सुरक्षा बलों को पहले की ही तरह स्कूलों, छात्रावासों और आश्रमों में ठहराया जा रहा है.बस्तर के सुकमा, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, कांकेर, बीजापुर और जगदलपुर में नक्सली भी ऐसे स्कूलों को निशाना बनाते रहे हैं, जहां सुरक्षा बलों ने अपना कैंप बनाया था.

यही कारण है कि कई इलाक़ों में तो सरकारी निर्देश के बाद भी पक्के स्कूल भवन का निर्माण करने का काम कई महीनों से ठप है.

सुकमा के तोंगपाल, रोकेल और गादीरास जैसे इलाक़ों में चलने वाले 16 पोर्टा केबिन आवासीय स्कूलों को बंद कर दिया गया है.

इनमें रहकर पढ़ने वाले तीन हज़ार बच्चों को छुट्टी दे दी गई है. इन स्कूलों में सुरक्षा बलों के जवान ठहराए गए हैं.

इसी तरह नारायणपुर के 15 स्कूलों में भी बिना पूर्व सूचना के छुट्टी दे दी गई है. स्कूल कब खुलेंगे, इस बारे न तो बच्चों को कोई जानकारी है और न उनके अभिभावकों को. कांकेर के भी कुछ स्कूलों में चुनाव तक छुट्टी कर दी गई है. बस्तर के स्कूलों में सुरक्षा बलों को ठहराने के मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट ले जाने वाली नंदिनी सुंदर का कहना है कि राज्य सरकार का क़दम पूरी तरह ग़ैरक़ानूनी है.

नंदिनी कहती हैं, “राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की भी परवाह नहीं है. दिल्ली में भी चुनाव हो रहे हैं पर क्या यहां सुरक्षाबलों को स्कूलों में ठहराया जा सकता है? सबसे बड़ी बात तो यह है कि सरकार की प्राथमिकता में शिक्षा नहीं है.”

हालांकि नंदिनी सुंदर की आपत्ति ख़ारिज करते हुये राज्य के पुलिस महानिदेशक रामनिवास सब कुछ क़ानून सम्मत बताते हैं.

उनका कहना है, “सुरक्षा बलों को स्कूलों में ठहराने का निर्णय हमने चुनाव आयोग की सहमति के बाद लिया है और इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. हमने केंद्रीय चुनाव आयोग से इसके लिए अनुमति मांगी थी और उनकी सहमति के बाद ही हमने सुरक्षा बलों को स्कूलों में ठहराया है.”

मगर संविधान विशेषज्ञ और वरिष्ठ अधिवक्ता कनक तिवारी ने इसे सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना बताया.

उनका कहना है कि चुनाव आयोग मूल रूप से चुनाव प्रक्रिया को संपन्न करने वाली एक संस्था है और इस तरह की सहमति वह कतई नहीं दे सकती.

कनक तिवारी कहते हैं, “विवाह संपन्न कराने वाला पंडित दहेज की रक़म या रिसेप्शन का स्थान नहीं तय कर सकता. चुनाव आयोग भला सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को कैसे दरकिनार कर सकता है. ऐसा अगर करना भी होगा, तो इसके लिए आयोग को सुप्रीम कोर्ट की सहमति लेनी होगी.”

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