ग्रामीण छत्तीसगढ़ में गरीबी बढ़ी

नई दिल्ली | संवाददाता: छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों की संख्या में इजाफा हुआ है. वर्ष 1993-1994 में गॉवों में 50 फीसदी लोग गरीब थे जो 2011-12 में बढ़कर 65 प्रतिशत का हो गया है. ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जारी 2012-13 के वार्षिक रिपोर्ट से तथ्य उजागार हुआ है.

इस रिपोर्ट की मानें तो छत्तीसगढ़ के केवल 18 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को ही तीन आधारभूत सेवाएं- अपने परिसरों में पेयजल, शौचालय और बिजली की सुविधा उपलब्‍ध है. इनकी 20 प्रतिशत आबादी को तो यह सुविधाएं बिलकुल भी उपलब्‍ध नहीं हैं. साथ ही छत्तीसगढ़ अब तक शिक्षा, बाल और मातृत्‍व स्‍वास्‍थ्‍य तथा चिकित्‍सा सेवाओं के क्षेत्र में भी पिछड़ा हुआ हैं.

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के वर्ग में सर्वाधिक गरीबी व्‍याप्‍त है. वर्ष 2009-10 में ग्रामीण गरीबों में 44 प्रतिशत संख्‍या इन्‍हीं वर्गों की थी.

केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश द्वारा जारी किये गये इस रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ में मनरेगा का बुरा हाल है. इसका कारण गरीबी दूर करने वाले केन्द्र के कार्यक्रमों को समुचित रूप से लागू न किया जा सकना है.

ग्रामीण विकास मंत्रालय के आकड़े बताते हैं कि वर्ष 2012-13 में छत्तीसगढ़ के 22लाख 03हजार 3सौ 44 परिवारों ने मनरेगा के तहत रोजगार मांगा था. जिसमें से 21लाख 97हजार 8सौ 57 परिवारों को औसतन 31 दिनों का रोजगार मिल पाया.

100 दिनों का रोजगार तो केवल 44हजार 9सौ 33 परिवारों को ही मिल पाया है जो कि 2.04 फीसदी है. जब छत्तीसगढ़ में रोजगार मुहैया करवाने वाली योजनाओं को ठीक से लागू ही नही किया गया है तो गरीबी कैसे दूर होगी.

जहां तक मनरेगा की बात है तो इसके माध्यम से 9.80 फीसदी रोजगार अनुसूचित जातियों, 33.23 फीसदी अनुसूचित जनजातियों को तथा 47.20 फीसदी महिलाओं को मिला है. यदि रोजगार पाने में समाज के पिछड़े वर्ग पिछड़ते गये तो राज्य का विकास भला कैसे होगा.

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