कोयले की कमी से बिजली संकट गहराया

नई दिल्ली | संवाददाता: अगर आप सोच रहे होंगे कि केवल दिल्ली या उत्तरप्रदेश में बिजली संकट में हैं तो आप गलत हैं. आपके शहर की भी बिजली गुल हो सकती है. कोयला संकट झेल रहा बिजली उद्योग चाहता है कि ऐन तेज़ गरमी के समय कोयले की कमी को लोकर ऐसा माहौल बनाया जाये कि देश में कोल खदानों के लिये रास्ता बन जाये. जनता के बीच भी ऐसा संदेश जाये कि अगर जंगलों को काट कर भी कोयला निकालना पड़े तो वह ज़रुरी है.

देश का ऊर्जा मंत्रालय दावा कर रहा है कि देश के 21 पावर प्रोजेक्ट्स के पास चार दिन से भी कम का कोल स्टॉक रह गया है, जबकि करीब 15 प्रोजेक्ट्स ऐसे हैं, जहां हफ्ते दिन का भी कोल स्टॉक नहीं बचा.

ऊर्जा मंत्रालय का कहना है कि जहां कोयले की कमी है, उनमे एनटीपीसी के वो छह पावर प्रोजेक्ट्स भी हैं, जिनसे दिल्ली समेत उत्तर भारत को बिजली सप्लाई होती है. इन पावर प्लांट्स में करीब 55 हजार मेगावाट बिजली पैदा होती है जो कुल बिजली उत्पादन का करीब 20 फीसदी है. दो साल पहले अगस्त 2012 में भी ऐसे ही हालात बने थे जब नॉर्दर्न ग्रिड के फेल हो जाने की वजह से पूरा उत्तर और पूर्वी भारत करीब 24 घंटों के लिए अंधेरे में डूब गया था.

पिछले कुछ सालों में जिस तरीके से बिजली का इस्तेमाल हो रहा है, बड़े-बड़े मॉल, दफ्तरों में तेज़ रोशनी, पूरी तरह से सेंट्रल एयरकुल्ड भवन और बिजली से अय्याशी के सैकड़ों तरीकों ने देश में बिजली की खपत बढ़ा दी है. इसके अलावा निजी कंपनियों में बिजली पैदा करने और अधिक से अधिक कीमत पर पीक आवर का बहाना बना कर बेचने की होड़ लगी हुई है.

इसमें सबसे बड़ा रोड़ा उन जंगलों का है, जहां निजी कंपनियां खुदाई करना चाहती हैं. जंगल और वन जीवों की कीमत पर होने वाली इस खुदाई में स्थानीय निवासी सबसे बड़ा रोड़ा है. ऐसे में ताजा माहौल में यह संभव है कि कोल खदानों को लेकर सरकार कोई नया कानून बनाये और कोयला खनन की राह के सारे अवरोधकों को दूर कर दे.

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