नैट-तटस्थता पर खतरा

प्रबीर पुरकायस्थ
मार्क जुकरबर्ग और फेसबुक द्वारा पेश किए गए मुफ्त बेसिक्स के प्रस्ताव को इसी फरवरी में दूरसंचार नियामक, ट्राई ने खारिज कर दिया था. लेकिन, ऐसा लगता है कि मुफ्त डॉटा (सेवा) पर ट्राई के 19 मई के नये परामर्श परिपत्र के साथ, इस प्रस्ताव की वापसी हो गयी है.

बेतुकी पल्टी के संकेत
इस परिपत्र से यह अर्थ निकलता नजर आता है कि मुफ्त बेसिक्स के प्रस्ताव की समस्या यह नहीं थी कि इस तरह फेसबुक को इंटरनैट के चौकीदार के तौर पर स्थापित किया जाना था और इस भूमिका में वह इंटरनैट के माध्यम से कुछ खास सामग्री को आगे बढ़ा रहा होता, जबकि कुछ दूसरी सामग्री को दबा रहा होता. इसके बजाए, इस परिपत्र के अनुसार, फेसबुक की उक्त पेशकश की समस्या यह थी कि उसके लिए उसने एक ही दूरसंचार सेवा प्रदाता (टेल्को), रिलायंस कम्युनिकेशन्स के साथ गठबंधन किया था. यानी अगर फेसबुक अन्य दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के जरिए भी यह सेवा मुहैया कराए, तो किसी तरह से मुफ्त बेसिक्स की व्यवस्था न्यायपूर्ण हो जाएगी.

उम्मीद की जानी चाहिए कि यह महज एक सवाल का मामला है, जो ट्राई ने चर्चा तथा परामर्श के लिए उठाया है. और यह भी कि इस मामले में अंतत: तो उसका फैसला, मुफ्त बेसिक्स के मुद्दे पर उसके इससे पहले के बहु-प्रशंसित निर्णय के ही अनुरूप होगा. ट्राई ने अपने उक्त निर्णय में यह कहा था कि सी प्लेटफार्म के जरिए, ‘‘भिन्नीकृत मूल्य’’ के आधार पर कुछ वैबसाइटों तक पहुंच मुहैया कराया जाना–मुफ्त पहुंच मुहैया कराना, भिन्नीकृत मूल्य का ही चरम रूप है–इंटरनैट की तटस्थता का उल्लंघन है, भेदभावपूर्ण है और उपयोक्ताओं के चुनाव को सीमित करने वाला है.

अब सोचने की बात यह है कि अगर एक दूरसंचार सेवा प्रदाता के साथ गठबंधन करने पर, मुफ्त बेसिक्स की पेशकश भेदभावपूर्ण तथा उपयोक्ताओं के अधिकारों पर अतिक्रमण करने वाली हो, तो अन्य दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को भी इसके दायरे में लाए जाने से, यह पेशकश अचानक स्वीकार्य नहीं हो जाएगी. उल्टे ऐसी पेशकश में अनेक दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के खींचे जाने से तो, नैट-तटस्थता का उल्लंघन और उपयोक्ताओं के अधिकारों पर अतिक्रमण और कई गुना हो जाना चाहिए.

ट्राई ने मुफ्त बेसिक्स पर अपने पिछले आदेश में स्पष्ट रूप से कहा था कि इंटरनैट को द्वारपालों से मुक्त रखा जाना चाहिए. इसके लिए उसने यह तर्क दिया था कि अगर इंटरनैट पर बैठा दिया गया कोई द्वारपाल इसका चयन करने लगता है कि हम कौन सी साइटें देख या सर्फ कर सकते हैं, तो यह व्यवस्था उपयोक्ताओं के चयन को सीमित करने वाली होगी और भेदभावपूर्ण होगी. ऐसे में अगर तमाम दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के जरिए, फेसबुक के माध्यम से मुफ्त बेसिक सेवा तक पहुंच हासिल होती है, ऐसे मामले में फेसबुक वास्तव में द्वारपाल की ही भूमिका अदा कर रही होगी. इसलिए यह समझ पाना मुश्किल है कि ट्राई यह कैसे मान सकती है कि इंटरनैट के चौकीदार की भूमिका कोई दूरसंचार सेवा प्रदाता करे तब तो प्राब्लम है, लेकिन यही काम अनेक दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के जरिए फेसबुक करे, तो कोई समस्या नहीं है.

यह नहीं भूलना चाहिए कि फेसबुक, भारत के सभी दूरसंचार सेवा प्रदाताओं से कहीं बड़ी इजारेदारी है और उसका सालाना राजस्व, दुनिया के तीन-चौथाई देशों के सालाना सकल घरेलू उत्पाद से कहीं ज्यादा है. इसका मतलब यह हुआ कि उपयोक्ताओं की स्वतंत्रता के लिए उससे जितना बड़ा खतरा है, उतना बड़ा खतरा भारत के किसी दूरसंचार सेवा प्रदाता से नहीं होगा.

विचित्र रुख
ऐसा लगता है कि नियमनों के प्रति भारतीय एजेंसियों का रुख बड़ा विचित्र है. होना तो यह चाहिए कि पहले बुनियादी सिद्धांत तय कर दिया जाए और उसके बाद उसके निहितार्थों के आधार पर विभिन्न मुद्दों पर फैसले लिए जाएं. लेकिन, इसके बजाए ट्राई ने तीन अलग-अलग परामर्श शुरू किए हैं और तीनों नैट-तटस्थता से संबंधित हैं. और नैट तटस्थता के सिद्धांतों को उसने चौथे तथा अंतिम परामर्श के लिए छोड़ दिया है. पहला परामर्श था, ट्राई के ओवर द टॉप (ओटीटी) सेवाओं के परामर्श परिपत्र पर. यह परिपत्र पिछले साल मार्च में जारी किया गया था. उम्मीद की जाती है कि उसे अब दफ्न किया जा चुका होगा, जिसके कि वह काबिल था.

इसके बाद दूसरा परामर्श परिपत्र पिछले साल दिसंबर में जारी किया गया था, जो भिन्नीकृत मूल्य व्यवस्था या मुफ्त बेसिक्स के मुद्दे पर था. तीसरा परामर्श परिपत्र मुफ्त डॉटा सेवा और इसके रास्ते संभवत: चोर दरवाजे से मुफ्त बेसिक्स के लिए इजाजत दिए जाने पर है. और अब चौथा परामर्श आया है, जिसे नैट तटस्थता पर पूर्व-परामर्श परिपत्र का नाम दिया गया है.

भारत के फ्री सॉफ्टवेयर आंदोलन के हिस्से के तौर पर हमने यह तर्क रखा था कि नैट तटस्थता के सिद्धांतों को पहले तय किया जाना चाहिए और नैट तटस्थता के ठोस पहलुओं जैसे ओवर द टॉप सर्विसेज, जीरो रेटिंग सेवाओं जैसे फ्री बेसिक्स या फ्री डॉटा को बाद में लिया जाना चाहिए. इसके बजाए, ट्राई के विभिन्न आदेशों में टुकड़ों-टुकड़ों में चीजों को लिया जा रहा है, जबकि नैट तटस्थता के सिद्धांतों पर निर्णय को, जिसे इन निर्णयों का आधार बनाया जाना चाहिए था, लटकाए रखा जा रहा है.

सवाल पूछा जा सकता है कि इंटरनैट की तटस्थता, इंटरनैट के लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? आज इंटरनैट के जो 3.5 अरब उपयोगकर्ता हैं, उनमें से करीब 1 अरब लोग ऐसे हैं जो इस पर दिखाई देने वाली सामग्री में अपनी ओर से कुछ न कुछ जोड़ते हैं. दूसरे शब्दों में इंटरनैट का उपयोग करने वालों में से करीब एक-तिहाई ही हैं जो इसकी सामग्री का उपभोग भी करते हैं और इस पर सामग्री जोड़ते भी हैं. लेकिन, यह तभी तक संभव है जब तक इसकी सामग्री का उपभोग करने वाले तथा इस पर सामग्री डालने वाले, दोनों पक्षों को इंटरनैट तक बेरोक-टोक पहुंच हासिल हो. जब तक यह समीकरण बना हुआ है, कोई भी इंटरनैट पर किसी भी साइट तक पहुंच सकता है.

ऐसे हालात में इंटरनैट सेवा प्रदाताओं को, जो आम तौर पर दूरसंचार सेवा प्रदाता ही होते हैं, इंटरनैट के द्वारपाल नहीं बनने दिया जा सकता है, नहीं बनने दिया जाना चाहिए और यह तय करने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए कि उनकी सेवा के ग्राहक किस सेवा या किस साइट तक पहुंच सकते हैं. लेकिन, मुफ्त बेसिक्स के प्लेटफार्म की असली समस्या ही यह है कि इसके जरिए फेसबुक को, चाहे दूरसंचार सेवा प्रदाताओं से गठबंधन कर के हो या उसके बिना ही, लोगों की इंटरनैट तक पहुंच के द्वारपाल बनने का मौका मिल जाएगा.

नैट तटस्थता क्यों जरूरी है?
यहां हमने इंटरनैट पर उपलब्ध जिस सामग्री की बात की है उसमें सिर्फ वैब पेज ही नहीं आते हैं बल्कि एप्लीकेशन्स और इंटरनैट के जरिए मिलने वाली सेवाएं भी शामिल हैं. कोलंबिया विश्वविद्यालय के कानून के प्रोफेसर टिम वू, जिन्होंने वास्तव में नैट तटस्थता की संज्ञा को गढ़ा था, यह रेखांकित करते हैं कि इंटरनैट पर सामग्री मुहैया कराने वालों तथा सामग्री का उपभोग करने वालों, दोनों के ही पहलू से इंटरनैट के दरबानों की अनुपस्थिति के चलते ही, इंटरनैट पर सर्जनात्मकता तथा नवोन्मेषीपन का जबर्दस्त विस्फोट संभव हुआ है. एक बार जब द्वारपाल आ जाएंगे, उसके पीछे-पीछे इजारेदाराना कीमतों और इजारेदाराना भाड़ा वसूली का आना भी तय है.

डॉट कॉम के बुलबुले के उभार के दौर में टिम वू सिलिकॉन वैली के स्टार्ट अप्स के साथ काम कर रहे थे. लेकिन, इस दौर में वह यह देख-देखकर पूरी तरह से पक गए कि किस तरह कंपनियां, इंटरनैट पर ट्रैफिक को रोकने या धीमा करने के ही तरह-तरह के उपाय बेचने में लगी हुई थीं. न्यूयार्क टाइम्स के साथ एक साक्षात्कार में (मुक्त इंटरनैट की हिमायत में, जैफ सोम्मर, 10 मई 2014) वू ने कहा था: ‘यह विचार एक मिथक भर है कि निजी क्षेत्र के पास, मुक्त बाजार के पास अपने आप में हर चीज के सामाधान हैं…जब पैसे का सवाल आता है, कोई मूल्य नहीं रहते हैं.’ वू ने अंतत: सिलिकॉन वैली छोड़ दी, पढ़ाने के पेशे में आ गए और अपने पुराने प्रोफेसर, लॉरेंस लेस्सिग के साथ जुड़ गए, जिन्होंने क्रिएटिव कॉमन्स की स्थापना की थी. इसी तरह, इंटरनैट के नियमन के सिद्धांत के रूप में, नैट तटस्थता की अवधारणा का जन्म हुआ.

पहले नैट तटस्थता के लिए खतरा उन दूरसंचार तथा केबल कंपनियों से था, जिनका ब्राडबैंड इंटरनैट के बुनियादी ढांचे पर नियंत्रण था. आज यह खतरा खुद इंटरनैट के भीमकाय खिलाडिय़ों से है, जो इजारेदारी के फायदों को पहचान रहे हैं. आज स्थिति यह है कि गूगल तथा फेसबुक जैसी इंटरनैट कंपनियां इंटरनैट प्लेटफार्म के रूप में अपनी इजारेदारी का सहारा लेकर, इंटरनैट के द्वारपालों की भूमिका संभाल सकती हैं.

मुफ्त बेसिक सेवा का खेल
आखिर, फेसबुक क्यों अपने मुफ्त बेसिक के मंच के जरिए, कुछ वैबसाइटें या सेवाएं मुफ्त मुहैया कराने की पेशकश कर रहा है? जैसाकि भारत के फ्री सॉफ्टवेयर आंदोलन ने और दूसरों ने भी बार-बार रेखांकित किया है, फेसबुक के अपनी पेशकश को फ्री (मुफ्त) बेसिक्स का नाम देने से ही, उसे न तो मुफ्त मान लिया जाना चाहिए और न बेसिक इंटरनैट सेवा. फ्री बेसिक्स का संबंध में वास्तव में फेसबुक तथा उसके साझीदारों द्वारा मुहैया करायी जाने वाली करीब सौ सेवाओं से है, जो इंटरनैट पर उपलब्ध करीब एक अरब सेवाओं/ सामग्री का नगण्य सा हिस्सा भर हैं. इतनी सी सेवा भी मुफ्त नहीं है क्योंकि उपयोक्ताओं को अपने निजी डॉटा के बदले में यह सेवा मुहैया करायी जाती है. इंटरनैट के मामले में तो यह कहावत ही है कि अगर तुमसे पैसा नहीं लिया जा रहा है, तो इसका मतलब यह है कि तुम खुद ही बिकाऊ उत्पाद हो.

फेसबुक को पता है कि फ्री बेसिक्स जैसे उसके मंचों के जरिए इंटरनैट तक पहुंच हासिल करने वालों में से विशाल संख्या ऐसे लोगों की होगी जो यह मानने लगेंगे कि वाकई यही इंटरनैट है और उन्हें बस इतने की ही जरूरत है. भारत, जहां इंटरनैट के 12.5 करोड़ उपयोक्ता हैं, फेसबुक के लिए अमरीका के बाद दूसरा सबसे बड़ा बाजार तो पहले ही बन चुका है. अगले दस साल में 50 करोड़ और लोगों के इंटरनैट से जुडऩे की संभावना को देखते हुए, भारत फेसबुक का सबसे बड़ा निशाना है. उसके निशाने के तौर पर भारत का महत्व इसलिए और भी ज्यादा हो जाता है कि चीन के बढ़ते हुए बाजार में, उसे घुसने की इजाजत नहीं है.

यह भी याद रखना चाहिए कि विश्व आर्थिक मंच ने निजी डॉटा के माल बना दिए जाने को, ‘21 वीं सदी का तेल’ करार दिया है. इसलिए, नैट तटस्थता के पक्ष में तथा मुफ्त बेसिक्स जैसे मंचों के खिलाफ लड़ाई, हमारी डिजिटल स्वायत्तता के लिए और इसकी लड़ाई भी है कि हमारे निजी डॉटा का नियंत्रण किस के हाथ में रहेगा.

नैट इजारेदारी और चौतरफा नियंत्रण की ताकत
अब जबकि ज्यादा से ज्यादा सेवाएं इंटरनैट की ओर जा रही हैं, मिसाल के तौर पर अखबार कागज पर छपाई बंद कर के डिजिटल संस्करणों की ओर जा रहे हैं, इंटरनैट इजारेदारियों की ताकत में बेहिसाब बढ़ोतरी हो रही है. फेसबुक के 160 करोड़ उपयोक्ता हैं. गूगल के सर्च इंजन तथा मुफ्त ई-मेल सेवा को, 350 करोड़ इंटरनैट उपयोक्ताओं के बीच लगभग इजारेदारी हासिल है. यह इतनी बड़ी ताकत है जिसके बल पर वे सिर्फ अपनी सर्च सुविधा में रेंकिंग बदलने के जरिए या अपने पेजों पर जगह देने के जरिए, किसी ब्रांड की किस्मत बना या बिगाड़ सकते हैं.

कल को वे प्रमुख राजनीतिक मुद्दों पर जनता की राय को भी तय कर सकते हैं–मिसाल के तौर पर चुनाव में किसे वोट दिया जाए या फिर ब्रक्जिट जैसे किसी जनमत संग्रह में किस तरफ वोट डाला जाए. ऐसा वे अपनी मर्जी के हिसाब से खबरों या रायों की दृश्यता, बढ़ाने-घटाने के जरिए कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें सिर्फ उस सूत्र में जरा सा फेर-बदल की जरूरत होगी, जिससे यह तय होता है कि ऐसे मंचों पर हम क्या देखेंगे और क्या नहीं देखेंगे.

जाहिर है कि यह सब महज खाली दिमाग की अटकलबाजी की बात नहीं है. सचाई यह है कि फेसबुक आए दिन, फिलिस्तीन से संबंधित पेजों को रोकता रहता है. वास्तव में उसके कर्मचारियों की विशाल संख्या को वास्तव में ‘संपादन’ का ही काम सोंपा गया है और वे यह तय करते हैं कि फेसबुक पर क्या ट्रेंड करना चाहिए. यह कोई संयोग ही नहीं है कि जब मिसूरी का फर्गूसन शहर, माइक ब्राउन नाम के एक अफ्रीकी-अमरीकन को पुलिस के गोली मारने पर, गुस्से से फट पड़ा, ट्विटर पर तो यह प्रकरण उसी रोज ट्रेंड कर रहा था, जबकि फेसबुक को इन विरोध कार्रवाइयों को जगह देने में चार दिन लग गए. योरपीय यूनियन ने गूगल पर इसका आरोप लगाया है कि वह अपने सर्च के परिणामों को पूर्वाग्रहित करता है और ऐसी कंपनियों की पेज रेंकिंग बदल देता है जो गूगल से प्रतिस्पर्धा कर रही हों या जिन्होंने गूगल को पैसा दिया हो.

इंटरनैट तक पहुंच का महत्वपूर्ण सवाल
बहरहाल, चोर दरवाजे से कथित मुफ्त बेसिक के प्रवेश का विरोध करते हुए भी, इस महत्वपूर्ण सवाल का जवाब खोजना जरूरी है कि कैसे हमारे देश में इंटरनैट तक पहुंच सस्ती हो और कैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों को इंटरनैट तक पहुंच हासिल हो. इतना तो अब तक स्पष्ट हो ही चुका है कि भारत में इंटरनैट तक पहुंच, सबसे बढक़र मोबाइल इंटरनैट से संचालित होने जा रही है और इस सेवा के लिए पुरानी 2 जी सेवाओं का भी उपयोग हो रहा होगा और अपेक्षाकृत नयी 3 जी तथा 4 जी सेवाओं का भी. सस्ते स्मार्ट फोन हमारे देश में इंटरनैट तक पहुंच के हाल में आए उछाल का इंजन बने रहे हैं और आने वाले समय में यह प्रक्रिया और तेज ही होने जा रही है.

अब तक ट्राई का रुख यही रहा है कि वह न तो डॉटा सेवाओं के दाम का नियमन करेगी और न ऐसी सेवाओं की गुणवत्ता का. भारत में इंटरनैट की रफ्तारें बहुत सुस्त हैं और क्रय शक्ति तुल्यता को हिसाब में लेकर तुलना करें तो, इस इंटरनैट तक पहुंच के दाम बहुत ज्यादा हैं. बहरहाल, अब जबकि डॉटा सेवा, दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गयी है, ट्राई को डॉटा सेवाओं का नियमन भी अपने हाथ में लेना होगा. उसे ऐसी सेवाओं की वास्तविक लागतों की पड़ताल करनी चाहिए और डॉटा सेवा की ऐसी दरें तक करनी चाहिए, जो इंटरनैट का थोड़ा उपयोग करने वालों से लिए काफी कम हों और इसमें कुछ मुफ्त डॉटा भी शामिल हो. यह मोबाइल का प्रयोग करने वाले लोगों को ज्यादा से ज्यादा संख्या में इंटरनैट तक पहुंचने के लिए और खासतौर पर सस्ती 2जी तथा 3जी सेवाओं के जरिए इंटरनैट तक पहुंचने के लिए प्रोत्साहित करेगा.

दूरसंचार सेवा प्रदाता काफी अर्से से यह दलील देते आए हैं कि उन्हें सभी नियमनों से मुक्त रखा जाना चाहिए ताकि इंटरनैट के बुनियादी ढांचे में निवेश करने के लिए, वे कहीं ज्यादा पूंजी जुटा सकें. मुफ्त बेसिक के मुद्दे पर उनका रुख यही है कि फेसबुक की जगह उन्हें ही इंटरनैट के द्वारपाल बनने का मौका मिलना चाहिए और अपने ग्राहकों तक पहुंच की अपनी इजारेदारी के सहारे उन्हें ज्यादा राजस्व बटोरने का मौका मिलना चाहिए या फिर अपने ग्राहकों का निजी डॉटा अन्य कंपनियों को बेचने का मौका मिलना चाहिए. सचाई यह है कि ये सेवा प्रदाता अपनी डॉटा सेवाओं से भारी मुनाफे बटोर रहे हैं.

चूंकि ट्राई डॉटा सेवाओं की दरों का निमयम नहीं कर रही है, इन सेवा प्रदाताओं को बेहिसाब कमाई का मौका मिल गया है. इसलिए, जरूरत इसकी है कि डाटा सेवाओं का नियमन किया जाए तथा इसके जरिए इन सेवाओं की दरों को नीचे लाया जाए और सिर्फ प्रतिस्पद्र्घा के नतीजों तथा सेवा प्रदाताओं की सदाकांक्षाओं के ही भरोसे न बैठे रहा जाए. ध्वनि संचार के विपरीत, मोबाइल ब्राडबैंड सेवा या तो इजारेदारी है या ज्यादा से ज्यादा दो खिलाडिय़ों के बीच का खेल है.

बेशक, भारत की जनता को सस्ती दरों पर इंटरनैट मुहैया कराना आज एक महत्वपूर्ण काम है. लेकिन, इसका समाधान मुफ्त बेसिक्स जैसे तथाकथित तुरंता समाधानों में नहीं बल्कि इंटरनैट के नैटवर्क का विस्तार करने और उस तक पहुंच बढ़ाने में ही मिलेगा. और उसके लिए ग्राहकों से वसूल की जाने वाली दरों का नियमन करने में.

मुफ्त बेसिक्स या तथाकथित जीरो रेटिंग सेवाओं पर ट्राई के निर्णय को एक पथनिर्माणकारी निर्णय माना गया था और इसीलिए दुनिया भर में उसकी प्रशंसा हुई थी. हम उम्मीद करते हैं कि ट्राई, अपने इस आदेश को पलटने और मुफ्त डॉटा सेवा के नाम पर, पिछले दरवाजे से मुफ्त बेसिक की इजाजत देने के जरिए, अपनी प्रतिष्ठा को धूमिल नहीं करेगी.

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