प्रफुल्ल बिदवई का निधन

नई दिल्ली | संवाददाता : देश के जाने-माने पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता और समाज विज्ञानी प्रफुल्ल बिदवई नहीं रहे. 66 वर्षीय प्रफुल्ल बिदवई हॉलैंड के एम्सटर्डम में थे, जहां दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया. भारत में परमाणु कार्यक्रमों और युद्द जैसे विषयों के अलावा वैश्विक न्याय, पर्यावरण, सांप्रदायिकता, मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर दुनिया के कई अखबारों में नियमित लिखा करते थे.

1949 में जन्मे बिदवई ने आईआईटी बांबे से विज्ञान और प्रौद्योगिकी, दर्शनशास्त्र और अर्थशास्त्र की पढ़ाई की थी. उसके बाद उन्होंने स्वतंत्र पत्रकारिता शुरु की. 1972 में इकॉनामिक एंड पालिटिकल विकली में लिखे जाने वाले उनके स्तंभ के कारण उनकी पहचान स्थापित हुई. 1981 से 1993 के बीच उन्होंने बिजनेस इंडिया, फाइनेंसियल एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया में भी काम किया. उनकी कई किताबें दुनिया भर में बहुचर्चित हुईं.


इंडियन काउंसिल फॉर सोशल साइंस रिसर्च, सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑन एजुकेशन और नेशनल बुक ट्रस्ट के सदस्य रहे प्रफुल्ल बिदवई की गिनती दुनिया के उन चुनिंदा लोगों में होती थी, जो विश्वशांति के लिये लगातार संघर्षरत थे.

उनकी कुछ चुनिंदा किताबों में An India That Can Say Yes: A Climate-Responsible Development Agenda for Copenhagen and Beyond, South Asia on a Short Fuse. Nuclear Politics and the Future of Global Disarmament, with Achin Vanaik, Testing Times. The Global Stake in a Nuclear Test Ban, with Achin Vanaik, Religion, Religiosity and Communalism, with Harbans Mukhia and Achin Vanaik और India Under Siege. Challenges Within and Without, with Muchkund Dubey, Anuradha Chenoy and Arun Ghosh शामिल हैं.

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