प्रवीरचन्द्र भंजदेव: हिंदी हैं हम…

राजीव रंजन प्रसाद

प्रवीरचन्द्र भंजदेव: एक विवादित मसीहा
इस समय प्रवीर शासित (यद्यपि उन्हें शासनाधिकार ब्रिटिश शासन द्वारा प्रदान नहीं किये गये थे) जगदलपुर, बस्तर रियासत की एक जागृत राजधानी थी तथा यहाँ तत्कालीन क्रांतिकारी गतिविधियों एवं ब्रिटिश खिलाफत के आंदोलन का नेतृत्व श्री पी. सी नायडू कर रहे थे। स्वतंत्रता सेनानी श्री नायडू की एक सोडा फैक्ट्री थी, जो क्रांतिकारियों का सम्मिलन स्थल तथा रणनीति बनाने का अड्डा बनी हुई थी। यहाँ भी भारत छोडो के स्वर को मुखर करने की योजना तैयार हुई।


भारत की इस उपेक्षिततम रियासत की आवाज़ को सहजता से नहीं सुना जा सकता था तथा जिन्दाबाद-मुर्दाबाद के नारे सागौन के दरख्तों द्वारा ही सोख लिये जाते। ऐसे में क्रांतिकारियों ने बहरों को सुनाने और अपनी उपस्थिति सही प्रकार से महसूस कराने की योजना पर कार्य आरंभ किया।

स्वतंत्रता आन्दोलन की भीतर अलख जलाये मोहसिन नाम का एक उत्साही युवक इस कार्य के लिये चुना गया। तत्कालीन बस्तर के एक मात्र हाईस्कूल के मैदान में यूनियन जैक फहराया जाता था। मोहसिन ने दु:स्साहसपूर्ण कार्यवाही को अंजाम देते हुए यूनियन जैक को फ्लैग-पोस्ट सहित जला कर राख कर दिया था।

बस्तर अंचल में पहली बार “अंग्रेजों भारत छोडो” के तीव्र और स्पष्ट स्वर ने आकार लिया था। निश्चित ही विरोध की अनेकों ऐसी घटनायें रही होंगी लेकिन उनका दस्तावेजीकरण अंग्रेजों ने नहीं होने दिया। बाद में श्री सी पी नायडू के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड कर स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने की जानकारी मिलती है। इन घटनाओं के छोटे होने का मायना यह नहीं कि इसने प्रवीर का राजनीतिक भविष्य तय करने में अपनी भूमिका अदा नहीं की। अंग्रेजों को हर चिंगारी के मायने निकालने आते थे।

वर्ष-1947 से ही रियासतों के शासक तरह-तरह की सौदेबाजियों और लाभ हानि के मूल्यांकनों में लगे हुए थे। प्रवीर 18 वर्ष के हुए और जुलाई 1947 में उन्हें पूर्ण राज्याधिकार दे दिये गये। वहीं बैलाडिला का जिन्न भी बोतल से बाहर आ गया; बैलाडिला में प्रचुर तथा बहुत अच्छी श्रेणी के लोहे के पहाड़ों की श्रृंखला पाये जाने की सूचना अपना एक स्वतंत्र देश चाह रहे हैदराबाद के निजाम को थी। निजाम के प्रतिनिधियों ने प्रवीर के सामने प्रस्तावों-प्रलोभनों की झड़ी लगा दी।

बस्तर राज्य का भूतपूर्व अंग्रेज प्रशासक ग्रिबसन निजाम के वार्ताकारों और महाराजा बस्तर के बीच मध्यस्थता कर रहा था। महाराजा प्रवीर को विलयन का डर दिखा कर बहुत मोटी रकम दिये जाने का लोभ दिया गया। प्रवीर बैलाडिला क्षेत्र अथवा बस्तर राज्य का विलय निजाम के राज्य में करने के लिये तमाम तरह के दबावों के बाद भी सहमत नहीं हुए। बैलाडिला लौह खनन के लिये वे कुछ क्षेत्रों को सशर्त लीज पर देने के लिये अवश्य सहमत हो गये थे। यह व्यवस्था परिवर्तन का भी दौर था, नये इतिहास के बनने का समय।

15.12.1947 को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने मध्यप्रांत की राजधानी नागपुर में छत्तीसगढ़ की सभी चौदह रियासतों के शासकों को भारतीय संघ में सम्मिलित होने के आग्रह के साथ आमंत्रित किया। महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव ने अपनी रियासत के विलयन की स्वीकृति देते हुए स्टेटमेंट ऑफ सबसेशन पर हस्ताक्षर कर दिये। बस्तर रियासत को इसके साथ ही भारतीय संघ का हिस्सा बनाये जाने की स्वीकृति हो गयी।

15.08.1947 को भारत स्वतंत्र हुआ तथा 01.01.1948 को बस्तर रियासत का भारतीय संघ में औपचारिक विलय हो गया। 09.01.1948 को यह क्षेत्र मध्यप्रांत में मिला लिया गया। बस्तर तथा कांकेर की रियासत के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों को मिला कर एक वृहत बस्तर जिले को अस्तित्व मिला।

यह स्वाभाविक था कि सत्ता छिन जाने तथा महाराजा से प्रजा हो जाने की पीड़ा उनकी वृत्तियों से झांकती रही तथा इसकी खीझ वे एश्वर्य प्रदर्शनों, लोगों में पैसे बाटने जैसे कार्यों से निकालते भी रहे। तथापि उम्र के साथ आती परिपक्वता तथा राजनीति के थपेडों ने उन्हें एक संघर्षशील इंसान भी बनाया तथा धीरे धीरे वे अंचल में आदिम समाज के वास्तविक स्वर और प्रतिनिधि बन कर भी उभरे।

यह प्रवीर की लोकप्रियता थी कि जब तक वे जीवित रहे, वे ही इस अंचल की राजनीति का पर्याय बने रहे तथा उनके उम्मीदवारों ने ही तत्कालीन मध्यप्रदेश की विधानसभा में अपनी सीटें सुरक्षित रखीं।

प्रवीर के सार्वजनिक जीवन की पहली झलक मिलती है 1950 ई को जगदलपुर राजमहल परिसर में आयोजित मध्यप्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन में जिसमें उन्होंने आदिवासी समाज, उसकी शिक्षा और विकास को ले कर अपनी अवधारणा स्पष्ट तरीके से सामने रखी थीं।

उनके भाषण के कुछ महत्वपूर्ण अंश का यहाँ उल्लेख इस लिये आवश्यक है क्योंकि इससे प्रवीर के विचार और दृष्टिकोण का पता चलता है-
“मुझे इस हिन्दी साहित्य सम्मेलन तथा हिन्दी भाषा को न बोल सकने वाले आदिवासियों में परस्पर कोई सम्बन्ध ही नहीं दिखता था। किंतु स्वागत समिति के माननीय अध्यक्ष तथा श्री सुन्दरलाल त्रिपाठी ने जब राष्ट्रभाषा का प्रसार करने वाली समिति तथा हिन्दी न बोल सकने वाली पिछडी हुई जातियों के पारस्परिक सम्बन्ध की ओर इशारा किया तो मेरी झिझक मिट गयी।…..अंग्रेजों की नीति आदिवासियों को शेष भारत से पृथक रखने की थी, किंतु मेरा मत इससे विरुद्ध है क्योंकि मुझे विश्वास है कि पृथक रखने से आदिवासियों की उन्नति कभी नहीं हो सकती। सभ्यता भाषा तथा जातियों को शून्य में यानी गतिविहीन नहीं रख सकते।…..आदिवासियों को सभ्य बनाने के प्रयत्न में यह परम आवश्यक है कि संक्रांति काल में इन्हें राष्ट्र भाषा सिखा दी जाये, पर इस बात का ध्यान रखा जाये कि इन आदिवासियों के विषय मंन पूरी जानकारी कर लेवें और इस बात का निश्चय कर लेवें कि किस पद्धति का अनुसरण करने से आदिवासियों को सभ्यता ग्रहण करने में रुचि पैदा होगी।“

“अमेरिका के रेड़ इंडियनों का समूल नाश गोलियों से नहीं हुआ बल्कि उनको रिजर्व याने कि बाकी संसार से पृथक रखने से हुआ। हमारे देश के आदिवासी यदि पृथक रखे गये तो उनकी जाति ही नष्ट नहीं हो जायेगी पर उनका नैतिक एवं शिक्षा सम्बन्धी विकास भी नहीं हो पावेगा।……। दुर्भाग्य से आदिवासियों के रहन सहन के बाबत शेष संसार को बहुत ही कम ज्ञान है। इन लोगों के विषय में जिनको थोड़ा बहुत भी ज्ञान है उन्हें साधारणत: आदिवासियों के सम्बन्ध में लिखी गयी पुस्तकें हास्यास्पद मालूम होती हैं। अतिश्योक्ति कर के या तो उन्हें वन देवता का रूप दे दिया गया है या फिर उनके दुष्कृत्यों का वर्णन कर के उन्हें राक्षस बना दिया गया है। वास्तव में बात यह है कि वे साधारण मनुष्य हैं और उनमे जो भी बात विशेष कर के पायी जाती है वह उनकी परिस्थिति विशेष का ही फल है।“

“क्या कारण है कि बस्तर में चोरियाँ कम हैं और हत्याएं ज्यादा होती हैं? क्या इसका यह कारण है कि आदिवासी ईमानदार है, पर है क्रूर? नहीं, नहीं आदिवासी प्रारंभ से ही समाजवादी हैं। अबूझमाड़ मे खेती सामूहिक होती है, इकट्ठा बोते हैं और इकट्ठा काटते हैं और पीछे सामूहिक बंटवारा कर लेते हैं। इस कारण यदि कोई चोरी कर लेता है तो व्यक्ति की चोरी नहीं होती, समाज भर की चोरी हो जाती है। और इस लिये समाज की चीज की चोरी बहुत भारी और भयंकर अपराध समझा जाता है। हत्या इस लिये ज्यादा होती है कि जंगल में रहने के कारण मौत कदम कदम पर है। रोग, आदमखोर बाघ, सर्प, नदी, गिरता हुआ झाड़ यह सब चारों ओर सबका जीवन नष्ट करने पर तुले हुए हैं। तो इन परिस्थितियों में रहने वालों के जीवन का क्या मूल्य हो सकता है?”

“आदिवासियों की आवश्यकताएं थोड़ी हैं इस लिये उन्हें व्यर्थ पसीना बहाने की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है। मैं एक उदाहरण दूंगा। इसी जिले में एक छोटा सा रास्ता मैं तैयार करना चाहता था, पर उस काम को करने के लिये कुली-रेजा नहीं मिलते थे। आसपास के रहने वालों को पैसा कमाने की जरूरत नहीं प्रतीत होती थी। मैंने कपड़ा और नमक की दूकान वहाँ खुलवा दी और नगदी से बिक्री शुरु की। उनकी आवश्यकता थी कपड़ा और नमक, वह मिलता था नगदी से, और पैसा मिलता था काम करने से और इसी लिये रास्ता बनाने वाले मजदूर धडाधड़ आने लगे।”

“मैं आपलोगों के समक्ष सुझाव रखता हूँ कि प्राथमिक तथा अन्य समस्त प्रकार की शिक्षा हिन्दी माध्यम के द्वारा होनी चाहिये। जब तक ऐसा नहीं होता आदिवासी हिन्दी नहीं सीख सकते और जब तक हिन्दी नहीं सीखते उनकी आगे की शिक्षा असम्भव है। सब अध्यापकों को स्थानीय भाषा का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिये, जिससे जब विद्यार्थियों को हिन्दी पढ़ने में कठिनाई होगी तो वह आसानी से दूर की जा सकेगी।…. हिन्दी में पढ़ाने के लिये हमारी प्रारंभिक पाठ्य पुस्तकें बेकार हैं, इनमें हमें चित्रों की भी आवश्यकता है। प्रत्येक अक्षर को एक जानवर की तस्वीर लगा कर समझाया जाये और उस जानवर का नाम हिन्दी, हल्बी और गोंडी में लिखा जाये।”

प्रवीर की कथा जारी रहेगी…

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