महंगाई चिंता का विषय: राष्ट्रपति

नई दिल्ली | एजेंसी: राष्ट्रपति ने गुरुवार को कहा कि खाद्यान्न की कीमतें अभी भी चिंता का कारण बनी हुई हैं. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने स्वतंत्रता की 67वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा कि हमारा बाह्य सेक्टर सशक्त हुआ है. वित्तीय स्थिति मजबूत करने के उपायों के परिणाम दिखाई देने लगे हैं. कभी-कभार तेजी के बावजूद, महंगाई में कमी आने लगी है. तथापि, खाद्यान्न की कीमतें अभी भी चिंता का कारण बनी हुई हैं.

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गुरुवार को कहा कि पिछले दशक के दौरान हमारी अर्थव्यवस्था में प्रतिवर्ष 7.6 प्रतिशत की औसत दर से वृद्धि हुई. हालांकि पिछले दो वर्षो के दौरान यह वृद्धि 5 प्रतिशत से कम की अल्प दर पर रही परंतु मुझे वातावरण में नवीन ऊर्जा तथा आशावादिता महसूस हो रही है. पुनरुत्थान के संकेत दिखाई देने लगे हैं.

राष्ट्रपति ने कहा कि पिछले वर्ष खाद्यान्न के रिकार्ड उत्पादन से कृषि सेक्टर को 4.7 प्रतिशत की अच्छी दर से बढ़ने में सहायता मिली. पिछले दशक में, रोजगार में लगभग प्रति वर्ष 4 प्रतिशत की औसत दर से वृद्धि हुई. विनिर्माण सेक्टर फिर से उभार पर है.

उन्होंने कहा कि हमारी अर्थव्यवस्था के 7 से 8 प्रतिशत की उच्च विकास दर से बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हो चुका है जो समतापूर्ण विकास के लिए पर्याप्त संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है.

मुखर्जी ने कहा कि अर्थव्यवस्था विकास का भौतिक हिस्सा है. शिक्षा उसका आत्मिक हिस्सा है. ठोस शिक्षा प्रणाली किसी भी प्रबुद्ध समाज का आधार होती है. बारहवीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक हम अस्सी प्रतिशत की साक्षरता दर प्राप्त कर चुके होंगे. परंतु क्या हम यह कह पाएंगे कि हमने अच्छा नागरिक तथा सफल पेशेवर बनने के लिएए अपने बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा कौशल प्रदान किए हैं.

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गुरुवार को कहा कि गरीबी के अभिशाप को समाप्त करना हमारे समय की निर्णायक चुनौती है. अब हमारी नीतियों को गरीबी के उन्मूलन से गरीबी के निर्मूलन की दिशा में केंद्रित होना होगा. यह अंतर केवल शब्दार्थ का नहीं है : उन्मूलन एक प्रक्रिया है जबकि निर्मूलन समयबद्ध लक्ष्य.

मुखर्जी ने स्वतंत्रता की 67वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा कि पिछले छह दशकों में गरीबी का अनुपात 60 प्रतिशत से अधिक की पिछली दर से कम होकर 30 प्रतिशत से नीचे आ चुका है. इसके बावजूद, लगभग एक तिहाई आबादी गरीबी की रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रही है.

उन्होंने कहा कि निर्धनता केवल आंकड़ा नहीं है. निर्धनता का चेहरा होता है और वह तब असहनीय हो जाता है जब यह बच्चे के मन पर अपने निशान छोड़ जाता है. निर्धन अब एक और पीढ़ी तक न तो इस बात का इंतजार कर सकता है लेकिन उसके जीवन के लिए अनिवार्य भोजन, आवास, शिक्षा तथा रोजगार तक उसे पहुंच से वंचित रखा जाए इसका इंतजार नहीं कर सकता. आर्थिक विकास से होने वाले लाभ निर्धन से निर्धनतम व्यक्ति तक पहुंचने चाहिए.

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