अराजकता शासन का विकल्प नहीं-राष्ट्रपति

नई दिल्ली | संवाददाता: भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि लोकलुभावन अराजकता शासन का विकल्प नहीं हो सकती. नेताओं को जनता से वही वादे करने चाहिए जो वो पूरे कर सकें.

गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर प्रणव मुखर्जी ने राष्ट्र के नाम संदेश में कहा कि सरकार कोई परोपकारी निकाय नहीं है. लोकलुभावन अराजकता शासन का विकल्प नहीं हो सकती. झूठे वादों की परिणीति मोहभंग में होती हैं. जिससे गुस्सा पैदा होता है और गुस्से का एक ही लक्ष्य होता है, वो जो सत्ता में हैं.


उन्होंने कहा कि जनता का गुस्सा तभी कम होगा जब सरकारें वो करेंगी जो करने के लिए उन्हें चुना गया है: सामाजिक और आर्थिक तरक्की, घोंघे की रफ़्तार से नहीं बल्कि रेस के घोड़े की तरह. प्रणव मुखर्जी ने कहा कि अगले चुनाव कौन जीतता है, यह कम महत्वपूर्ण है. लेकिन भारत की एकता और अखंडता के प्रति ज़्यादा जवाबदेह कौन है यह ज़्यादा महत्वपूर्ण है.

राष्ट्रपति ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में पाखंड का बढ़ना भी खतरनाक है. चुनाव किसी व्यक्ति को भ्रांतिपूर्ण अवधारणाओं को आजमाने की अनुमति नहीं देते हैं. जो लोग मतदाताओं का भरोसा चाहते हैं, उन्हें केवल वही वादा करना चाहिए जो संभव है. सरकार कोई परोपकारी निकाय नहीं है. लोकलुभावन अराजकता, शासन का विकल्प नहीं हो सकती. झूठे वायदों की परिणति मोहभंग में होती है, जिससे क्रोध भड़कता है तथा इस क्रोध का एक ही स्वाभाविक निशाना होता है- सत्ताधारी वर्ग.

राष्ट्रपति ने कहा कि यह क्रोध केवल तभी शांत होगा जब सरकारें वह परिणाम देंगी जिनके लिए उन्हें चुना गया था : अर्थात् सामाजिक और आर्थिक प्रगति, और कछुए की चाल से नहीं बल्कि घुड़दौड़ के घोड़े की गति से. महत्वाकांक्षी भारतीय युवा उसके भविष्य से विश्वासघात को क्षमा नहीं करेंगे. जो लोग सत्ता में हैं, उन्हें अपने और लोगों के बीच भरोसे में कमी को दूर करना होगा. जो लोग राजनीति में हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि हर एक चुनाव के साथ एक चेतावनी जुड़ी होती है- परिणाम दो अथवा बाहर हो जाओ.

राष्ट्रपति ने कहा कि भ्रष्टाचार एक कैंसर है जो लोकतंत्र को धीरे-धीरे नष्ट करता है और देश की बुनियाद कमज़ोर करता है. लोग गुस्से में हैं क्योंकि वे भ्रष्टाचार देख रहे हैं. अगर सरकारें ये कमियां दूर नहीं करतीं तो मतदाता सरकारों को हटा देंगे. उन्होंने कहा कि ऐसे बड़बोले लोग जो हमारी रक्षा सेनाओं पर शक करते हों गैरज़िम्मेदार हैं और उनका सार्वजनिक जीवन में कोई स्थान नहीं है.

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