सरकारी विश्वविद्यालयों का जीवन-मरण

सरकारी विश्वविद्यालयों पर हमले करके सरकार अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों की अवहेलना कर रही है. मध्यकालीन दौर के इतिहासकार मिनहाज-ए-सिराज ने लिखा है कि 12वीं सदी के अंत तक पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों पर कब्जा जमाने वाले बख्तियार खिलजी ने बिहार के किले पर हमला किया. किले को कब्जे में लेने के बाद उसे पता चला कि यहां बड़ी संख्या में ब्राह्मण रहते हैं और यहां काफी किताबें हैं. इसके बाद उसे पता चला कि उसने सिर्फ किला नहीं जीता बल्कि एक विश्वविद्यालय पर कब्जा किया है.

दक्षिणपंथी विचारक तबाकत-ए-नसीरी के इस वाकये की व्याख्या गलत ढंग से करते हैं. वे इसे प्राचीन विश्वविद्यालय के विध्वंश के तौर पर देखते हैं. मौजूदा सरकार और उसके समर्थन कई विश्वविद्यालयों को राष्ट्र विरोध का केंद्र के तौर पर देखते हैं. पिछले साल जब जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में करगिल विजय दिवस पर कार्यक्रम आयोजित हुए तो सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी जीडी बख्शी ने कहा कि जेएनयू पर कब्जा जमाने के बाद अब सरकार को हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय और जादवपुर विश्वविद्यालय को काबू में करना चाहिए. पिछले दिनों केंद्र सरकार ने अपने मंसूबे छात्रों पर पुलिस से लाठियों की बरसात कराके जाहिर कर दिए. ये छात्र यौन शोषण के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे. भारतीय विश्वविद्यालयों में सरकारी हस्तक्षेप कोई नया नहीं है लेकिन अभी जिस तरह से विश्वविद्यालयों पर हमले हो रहे हैं, वैसा पहले कभी नहीं हुआ.


सरकारी विश्वविद्यालयों के मूलतः दो काम हैं. पहला यह कि ज्ञान की मौजूदा सीमाओं का विस्तार करना. इसके तहत मौजूदा ज्ञान और सत्ता प्रतिष्ठानों को संशय की दृष्टि से देखना स्वाभाविक है. दूसरा काम यह है कि यहां से जो नागरिक निकलें वे चिंतन करें और जिम्मेदार रहें. इसका मतलब यह हुआ कि छात्रों को सवाल उठाने का प्रशिक्षण दिया जाना अनिवार्य है. ऐसे में सरकारी विश्वविद्यालयों के मूल मध्यस्थ आम जनता है न कि सरकार.

कई बार विश्वविद्यालय उस समय की सरकार की विचारधारा की वाहक लगने लगती हैं लेकिन इनका मूल काम यह है कि सरकारों के हर निर्णय की आलोचनात्मक आकलन हो. इससे सत्ता में बैठे लोगों की सतत निगरानी होती है. जिन चीजों को यह सरकार ‘राष्ट्र विरोधी’ कहती है वह विश्वविद्यालयों की मूल जिम्मेदारी है. अगर सरकार पर सवाल उठाने के लिए किसी विश्वविद्यालय को राष्ट्र विरोधी कहा जा रहा है तो उसे इसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए. इसे तो नैशनल एसेसमेंट ऐंड एक्रीडिशन काउंसिल द्वारा दिए गए अंकों से भी अधिक महत्व देना चाहिए.

लोकतंत्र में विश्वविद्यालयों और सरकार का अन्योनाश्रय संबंध है. विश्वविद्यालयों का काम ऐसे ज्ञान का सृजन है जिसके आधार पर सरकार जन कल्याण के लिए नीतियां बना सके. सरकारी विश्वविद्यालयों का काम यह भी है कि वे भविष्य के जन सेवकों को प्रशिक्षित करें. लेकिन मौजूदा सरकार विश्विद्यालयों को तहस-नहस करने में लगी हुई है.

यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह विश्वविद्यालयों का बगैस किसी भय के ठीक से काम करना सुनिश्चित करे. कोई भी सरकार विश्वविद्यालयों को स्वायत्ता देकर उस पर अहसान नहीं करती. यह लोकतंत्र की रक्षा करने की सरकार की जिम्मेदारी का हिस्सा है. स्वायत्ता बढ़ाने के क्रम में नियमन होता है लेकिन पाठयक्रम और शोध एजेंडा थोपना इसका हिस्सा नहीं है. न ही सत्ताधारी पार्टी के लोगों को विश्वविद्यालय में प्रमुख पदों पर बैठाना इसका हिस्सा है. सरकार की यह जिम्मेदारी है कि विश्विद्यालयों को पर्याप्त फंड मुहैया कराए ताकि ये विश्वविद्यालय बाजार की ताकतों के गुलाम न बन सकें. इसके अलावा सरकार की जिम्मेदारी यह भी है कि वह हर वर्ग के लोगों में विश्वविद्यालयों में जगह देकर सामाजिक न्याय सुनिश्चित करे. ताकि विश्वविद्यालय प्रभावशाली वर्ग का केंद्र बनकर न रहें.

अभी स्वायत्ता देने के नाम पर जो हो रहा है, वह इस भावना के खिलाफ है. यह नागरिकों के प्रति हर जिम्मेदारी से भागने जैसा है. ग्रेडेड स्वायत्ता देने की जो घोषणा मानव संसाधन विकास मंत्री ने की है, वह शिक्षा क्षेत्र पर सरकारी खर्च को बंद करने का माध्यम है. इसका मतलब यह हुआ कि आर्थिक तौर स्वावलंबी होने के लिए विश्वविद्यालयों की बाजार की मांग के हिसाब से चलना होगा. यह न सिर्फ सरकारी विश्वविद्यालयों पर हमला है बल्कि एक लोकतांत्रिक सरकार और समाज के बीच के सामाजिक अनुबंध की भी अवहेलना है.

कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को जलाने में तीन महीने लगे थे. अभी भी देश के सरकारी विश्वविद्यालय एक दिन में ध्वस्त नहीं होंगे. छात्र और शिक्षक इन कोशिशों के खिलाफ लड़ रहे हैं. लेकिन सरकार की मंशा के प्रति कोई संदेह नहीं है. अगर सरकार यह सोचती है कि ऐसा करके वह मतदाताओं को बेवकूफ बना देगी तो भी उसे इतिहास में तिरस्कार की नजर से ही देखा जाएगा.
1966 से प्रकाशित इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली के नये अंक का संपादकीय

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