तू दाल-दाल, मैं पानी-पानी

संजय पराते
60-65 रूपये किलो की अरहर दाल 200 रूपये पर चल रही है. सवाल है कि किसी भोजनालय को अपना मुनाफा बनाए रखने के लिए दाल में कितना पानी बढ़ाना पड़ेगा? या फिर, पानी में दाल कितनी कम करनी पड़ेगी?? उत्तर भी आसान है — पहले से तीन-चार गुना ज्यादा पानी, या फिर दाल की मात्रा पहले की तिहाई-चौथाई. लेकिन फिर तो पानी में दाल को खोजना पड़ेगा ! लेकिन किसी गृहस्थी में इतनी फुर्सत कहां कि इतना झंझट पाले ! सो. घर की थाली से दाल गायब है और सब्जी के शोरबे से ही काम चलाया जा रहा है या यदि दाल है, तो किसी ‘फीस्ट’ के रूप में हफ्ते में एक बार ! दाल-रोटी अब सब्जी-रोटी में और दाल-भात अब सब्जी-भात में बदल गया है. दाल अब ‘शाही पकवान’ है गरीबों की थाली के लिए.

प्रधानमंत्री मोदी का अर्थशास्त्र भले ही बढ़ती महंगाई को बढ़ती जीडीपी से जोड़ लें, आम आदमी के लिए बढ़ती महंगाई दाल को पतली-और पतली ही करती है तथा थाली में उसके आहार-पोषण में कटौती ही करती है. यही आम आदमी का अर्थशास्त्र है. इस अर्थशास्त्र का आम आदमी के बजट से संबंध समझना हो, तो आप रवीश कुमार का एनडीटीवी में ‘दाल-दाल दिल्ली-दिल्ली’ देखिये. पता चल जायेगा कि मोदी राज में आम आदमी को अपनी पेट की आग को शांत करने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ रहे हैं. वह पचासों किलोमीटर चलकर मिठाई पुल पर सड़ी दाल खरीदने के लिए आ रहा है . यह सड़ी दाल भी इतनी महंगी हो गई है कि खरीदना उसके बस में नहीं रहा. सड़क किनारे के भोजनालय दो किलो दाल सौ लोगों को खिला रहे हैं, भात का माड़ मिलाकर. इससे लोगों का पेट तो भर जाता है, लेकिन पोषण-आहार नहीं मिलता. यदि जीडीपी में वृद्धि दर विकास का मानक है, तो महंगाई के कारण लोगों में बढ़ता कुपोषण, अच्छे खाद्यान्न तक पहुंच से उसकी दूरी विकास के उसके इस दावे की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है. तो फिर यह समझने में कोई देरी नहीं लगेगी कि बढ़ती जीडीपी वास्तव में किसका विकास कर रही है?


दाल के भाव चढ़ने तो अप्रैल से ही शुरू हो गए थे, लेकिन सितम्बर-अक्टूबर में तो वह सर चढ़कर बोलने लगे. अप्रैल में सोई सरकार अक्टूबर में ही हरकत में आई. लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी. इन छः महीनों में सट्टाबाज़ार को जितना खेलना था, खेल चुकी थी. बाज़ार आम जनता को जितना निचोड़ सकता था, उसने निचोड़ लिया. जनता के लुटने-पिटने के बाद सरकार के अर्ध-जागरण का कोई अर्थ नहीं था. जिनकी तिजोरियां भरनी थी, भर चुकी थी. अब छापा मारो या दाल आयात करो, जमाखोरों की सेहत पर न कोई फर्क पड़ना था, न पड़ा. 80000 टन दाल बाहर निकल आई, लेकिन कोई जमाखोर गिरफ्तार नहीं ! 5000 टन दाल आयात हो गई, लेकिन चढ़े दाल के भाव न नीचे उतरने थे, न उतरे. सरकार ने ही आउटलेट्स खोल दिए दाल बेचने के लिए 140 रूपये किलो के भाव से, तो फिर बाज़ार में 200 रूपये से नीचे क्योंकर उतरे? बेचारी मोदी सरकार इससे ज्यादा कर भी क्या सकती थी? अनाज के वायदा व्यापार पर रोक लगाना तो उसके बस की बात नहीं, सो ‘बेचारी सरकार’ से इसकी मांग न की जाएं, तो ही अच्छा. आखिर कार्पोरेट घरानों को वायदा व्यापार से रोकना देश की प्रगति में ग्रहण लगाना ही होगा !! यदि कारपोरेटों का ही विकास नहीं होगा, तो ‘सबका साथ, सबका विकास’ कैसे होगा?

वे लोग तो ‘अकल के अंधे’ ही हो सकते हैं, जो दाल की चढ़ती जवानी को देश के बढ़ते विकास में न समझें. यदि देश विकास कर रहा है, तो लोगों की आय भी बढ़ेगी. इस देश का दुर्भाग्य यह है कि दुनिया के सबसे ज्यादा ‘भुक्खड़’ लोग इसी देश में है. सो आय बढ़ी नहीं कि दौड़ पड़े आलू-प्याज-दाल के लिए. यह नहीं कि कुछ पैसे सट्टाबजार में इन्वेस्ट कर दे, ताकि सटोरियों की भी आय बढ़ें. तो पहले आलू-प्याज उछली. इस उछल-कूद पर ले-देकर सरकार ने कुछ काबू पाया, तो दाल चढ़ने लगी. चढ़ती दाल को रोकने की कोशिश कर रहे हैं कि आलू-प्याज ने फिर हाथ-पैर पटकने शुरू कर दिए हैं. आलू-प्याज-दाल को देखकर बाकी भी क्यों चुप बैठे भला ! त्यौहार का सीजन है, सो चावल-गेंहू-तेल-सब्जी भी दम दिखा रहे हैं. अकेली सरकार क्या-क्या करें? इन सब का दम देखकर बेचारी ‘बेदम’ हुई जा रही है. घोषणा तो छापेमारी की थी, लेकिन जमाखोरों ने दो-तीन दिनों में ही नानी याद दिला दी. आलू-प्याज के बाद अब दालों ने भी कह दिया कि हम जमाखोरों के साथ. चावल-गेहूं-तेल भी उनके गोदामों से बाहर आने को तैयार नहीं. एक को बाहर लाओ, तो दूसरा अंदर. ले-देकर दूसरे को बाहर निकालो, तो बाकी सब फिर अंदर !

तो मित्रों, सरकार की कोशिश तो चल रही हैं. लेकिन ये जनता !? जिस जनता के लिए ये बेचारी सरकार बेदम हो रही है, वही जनता सरकार को कोस रही है. वह जनता सरकार को कोस रही है, जो मांग बढाने के लिए जिम्मेदार है. भला बताईये, आलू-प्याज-दाल खाना जरूरी है !! जनता ही भाव नहीं देगी, तो ये सब गोदाम में पड़े सड़ते थोड़े रहेंगे !! निकलेंगे बाहर, हाथ जोड़कर कहेंगे, माई-बाप ले लो हमें, अपने घर की सैर कराओ, अपनी थाली में हमें सजाओ. हाथ जोड़कर कहेंगे कि हे देशवासियों, हमारी धृष्टता पर हमें माफ़ करो और हमें उदरस्थ करो. तब देखना, इन जमाखोरों के कस-बल कैसे ढीले होते हैं.

लेकिन नहीं ! इस जनता को तो आलू-प्याज-दाल के साथ चावल-गेहूं-तेल भी चाहिए. अरे ये देश ऋषि-मुनियों का है. लेकिन इस देश के आध्यात्मवाद पर अब तो भौतिकवाद हावी हो चुका हैं. कहां तो ऋषि-मुनि कंद-मूल खाकर या निर्जला उपवास रखकर सालों कठिन तपस्या करते थे. कहां यह भुक्खड़ जनता कि काम करने के लिए उसे चावल-गेहूं-तेल-दाल ही चाहिए. कंद-मूल का तो वह नाम भी नहीं लेना चाहती. कंद-मूलों ने इस ‘मनस्वी’ देश को आध्यात्मवाद की बहार दी, तो गेहूं-चावल-दाल ने इस देश को भौतिकवाद का रोग ही दिया. तो इस देश की रूग्ण जनता को खाने-पीने के सिवा कुछ दिखता नहीं, वर्ना बात-बात पर वह आत्महत्या करने की धमकी देने लगती है. पिछले ढाई दशक में तीन लाख से ज्यादा लोगों ने ऐसा करके भी दिखा दिया.

तो नागरिक बंधुओं, इस देश की गौरवशाली संस्कृति, सनातनी परंपरा और वैदिक सभ्यता को याद रखो. याद रखो कि हमारा उन्नयन इसी में निहित है. हमारी सरकार इसी संस्कृति, परंपरा और सभ्यता को आगे बढाने में लगी है. इसलिए हे आर्यपुत्रो, महंगाई का रोना छोड़ो — देखो कि कौन गौ-मांस खा रहा है? हे आर्यपुत्रों, केवल हिन्दू धर्म को याद रखो — देखो कि कौन-सा विदेशी धर्म इस पवित्र भूमि को अपनी जनसंख्या बढ़ाकर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहा है. हे आर्यपुत्रों, धर्मनिरपेक्षता को छोड़ो — देखो कि कहां दंगे किये-फैलाए जा सकते हैं? हे आर्यपुत्रों, केवल ब्राह्मणों की पूजा करो — म्लेच्छों का या तो संहार करो या फिर उन्हें ब्राह्मणों की सेवा में लगाओं !!

हे हिन्दूराष्ट्र के ध्वजवाहकों, अपने अध्यात्मवाद को जगाओ. अरे यार, इतना भी दाल-दाल न चिल्लाओ कि हमारी हिन्दू सरकार को शर्म से पानी-पानी होना पड़े.

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