उप सभापति का विपक्षी उम्मीदवार

अनिल चमड़िया
राज्यसभा के अब तक 12 उप सभापति हुए हैं और इनमें पांच बार चुनाव भी हुए हैं. इन पांच बार में तीन बार बकायदा मतदान हुए और दो बार सदस्यों ने हाथ उठाकर अपनी पसंद के उम्मीदवार के पक्ष में मत किया. लेकिन 13वें उप सभापति का चुनाव कुछ घंटों के लिए दूसरे चुनावों की तरह के वातावरण के बीच हुआ.

राजनीति में जो संस्कृति तेजी से विकसित हुई है कि देश में हर वक्त चुनाव का माहौल लगता है. फिर जब किसी स्तर पर चुनाव होता है तो वह देश स्तर के चुनाव में दिखाये जाने लगता है. हाल के दौर में स्थानीय निकायों के चुनाव भी इसी नई राजनीतिक संस्कृति के रंग में दिखाया गया है. इसकी एक वजह तो सूचना तकनीकि का समाज में हस्तक्षेप का तेजी से विस्तार होना है. दूसरा राजनीतिक स्थितियों में आया बदलाव है. देश की राजनीति में पुराने सारे मूल्य, परंपराएं और सपने बिखराव के दौर में हैं और नई संरचना को लेकर उथल-पुथल मचा हुआ है. इसीलिए यह भी निश्चितपूर्वक नहीं कहा जा सकता है कि सत्ता पक्ष कौन है और सत्ता का विपक्ष कौन है.


राज्यसभा के उप सभापति के चुनाव में भी राजनीतिक उथल-पुथल के सारे चिन्ह देखने को मिलते हैं. राज्य सभा में इस बार सर्वसम्मति से उप सभापति के चुनाव के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं दिखाई दिया. केन्द्र में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी और उसके नेतृत्व में चलने वाला गठबंधन लगातार राज्य सभा में अपना बहुमत कायम करने की कोशिश में लगा रहा है क्य़ोंकि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव में पहली बार भाजपा बहुमत से ज्यादा सीटों को जीतने में कामयाब हुई लेकिन उसके अपने राजनीतिक उद्देश्यों के अबाध गति को राज्यसभा में रुकते देखा गया क्योंकि वहां सबसे बड़ी पार्टी के रुप में कांग्रेस बनी रही है और समय-समय पर विभिन्न पार्टियों के मिलने से बनने वाले विपक्ष का बहुमत रहा है.

सभापति देश के उपराष्ट्रपति होते हैं लेकिन उसके बाद उप सभापति संसद के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं. कांग्रेस के पी जे कुरियन के कार्यकाल के खत्म होने के बाद राज्य सभा के नये उपसभापति के बारे में यह कहना बेहद मुश्किल था कि कौन सा पक्ष इस पद को हासिल करेगा. चुनावी भाषा में कहें तो जिस दृष्टि से भी विश्लेषण करें, कांटे का टक्कर दिखाई दे रहा था. इसीलिए नामांकन के पहले तक यह कहना मुश्किल हो रहा था कि कौन उम्मीदवार होगा.

भारतीय जनता पार्टी अपना उम्मीदवार खड़ा करने के बजाय अपने सहयोगी दल जनता दल यूनाईटेड को यह पद देने पर राजी हो गई है, यह बात बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह के बीच अगामी लोकसभा चुनाव के लिए हुई कुछ महत्वपूर्ण सहमतियों में एक है. नीतिश कुमार के सामने एक नाम कहकशां परवीन का था, जो कि राज्यसभा को संचालित करने वाले पैनल में भी नाम था और वे लगातार राज्य सभा की कार्यवाहियों का संचालन कर रही थीं. लेकिन नीतिश कुमार ने अपने बेहद भरोसे के पूर्व पत्रकार हरिवंश नारायण सिंह को मैदान में उतारने का फैसला किया. लेकिन इनके मुकाबले में उम्मीदवार उतारने का फैसला गैर भाजपा गठबंधन के दलों को लेने में काफी मशक्कत करनी पड़ी.

राज्य सभा में कांग्रेस का वर्चस्व रहा है और अब तक जो उप सभापति हुए हैं उनमें 1969 से 1977 के बीच केवल दो उप सभापति गैर कांग्रेसी हुए हैं. 1969 में पहली बार आर पी आई के बी डी खोब्रागड़े उप सभापति चुने गए थे. हरिवंश तीसरे ऐसे उम्मीदवार बने, जो कि गैर कांग्रेस उम्मीदवार माने जा सकते हैं.

भाजपा अपने गठबंधन के सदस्य जनता दल यूनाईटेड को तो उम्मीदवार बनाने पर सहमति जाहिर कर दी लेकिन कांग्रेस के लिए यह तय करने में मुश्किलें होती रही कि वह अपने उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारे या सत्ता पक्ष के विरोध में खड़ी पार्टियों में से किसी क्षेत्र राज्य विशेष में सक्रिय राष्ट्रीय पार्टी के उम्मीदवार को मैदान में उतारे.

हरिवंश का नाम आने के साथ एन सी पी डी एम के और बीजू जनता दल के किसी सदस्य को उम्मीदवार बनाने की चर्चाएं सुनाई दी लेकिन आखिरकार कांग्रेस ने अपने सदस्य बी के हरिप्रसाद को उम्मीदवार घोषित कर दिया और नतीजे के रुप में कांग्रेस के उम्मीदवार को जहां 101 मत मिले, वहीं सत्तारुढ़ पक्ष को 125 मत हासिल हो गए. यानी 245 सदस्यों में केवल 226 सदस्यों के बीच ही यह चुनाव हुआ.

स्थानीय निकाय के चुनावों में यह आमतौर पर देखने को मिला है कि आखिर नगरपालिका का चैयरमैन कौन हो सकता है, यह अनुमान ही लगाया जा सकता हैं. क्योंकि वार्ड कमीश्नर किस उम्मीदवार के पक्ष में किस तरह के आकर्षण या किस बात के दबाव या किस तरह के इरादों को लेकर अपना रुख जाहिर करेगा, यह केवल हरेक वार्ड कमीश्नर को ही पता हो सकता है. लगभग यही स्थिति भारतीय राजनीति में देखने को मिल रही है. जहां व्हीप के उल्लंधन की वजह से सदस्यता जा सकती है, यह डर जब तक नहीं होता है तब तक संसद सदस्यों के रुख के बारे में भी कहना मुश्किल होता है.

राज्य सभा के उप सभापति के चुनाव में सदस्यों और दलों के बीच ऐसा ही अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई थी. यदि इसके कुछ उदाहरणों को देखना हो तो बीजू जनता दल के फैसले को देखा जा सकता है जो कि जनता दल यूनाईटेड के उम्मीदवार के पक्ष में यह बताकर मत करने पर सहमति दे दी कि वह भी 1974 के जय प्रकाश नारायण के आंदोलन से पार्टी निकली है. तेलंगाना की सत्तारुढ पार्टी कल तक तीसरा मोर्चा बनाने के लिए आवाज लगा रही थी वह सत्तारुढ़ गठबंधन के पक्ष में मत देने पर राजी हो गई. जो शिव सेना लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर मत के दौरान सदन से बाहर हो गई, वह सत्तारुढ़ गठबंधन के उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने में सक्रिय हो गई. यहां तक कि कश्मीर में पीडीपी जो भाजपा के साथ राज्य सरकार में बनी हुई थी और भाजपा ने अचानक अपना समर्थन वापस लेकर कश्मीर में उसकी सरकार गिरा दी थी, उस पीडीपी ने भी उपसभापति के लिए हुए मतदान से खुद को बाहर रखने का फैसला किया. समाजवादी पार्टी के जो सदस्य चाहते थे, वे भी विरोध में मतदान करने से बेहतर खुद को मतदान से बाहर रखकर सत्तारुढ़ उम्मीदवार की मदद कर दी.

राजनीति इस मुकाम पर पहुंच गई है जहां यह स्थायी नहीं है कि कौन सत्ता पक्ष हैं और कौन विपक्ष है. राज्य सभा के उप सभापति के चुनाव में दलों और सदस्यों की जो स्थिति थी, उसमें ये कहा जा सकता है कि सत्तारुढ़ खुद को संगठित रखने और अपने सामने खड़ी पार्टियों में से ज्यादातर पार्टियों के बीच सेंध लगाने में कामयाब होने का भरोसा रखती हैं. दूसरी तरफ सत्तारुढ़ दलों के मुकाबले खड़ी पार्टियों के बीच एक मजबूत केन्द्र बिंदू नहीं है. इन पार्टियों में ज्यादातर के लिए कांग्रेस प्रतिद्वंदी भी है और वह सहयोगी भी बन सकती है. यह दुविधा विपक्ष की कोई साफ तस्वीर नहीं बनने दे रहा है.

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