रमन सिंह की इज्जत कार्ड

छत्तीसगढ़ में भवन निर्माण कार्य में संलग्न मजदूरों के लिये इज्जत कार्ड योजना का शुभारंभ मुख्यमंत्री रमन सिंह ने राजनांदगाँव से किया है. इस इज्जत कार्ड द्वारा भवन निर्माण में लगे मजदूरों को मुफ्त में रेल्वे यात्रा करने की इज्जत बख्शी गयी है. बकौल रमन सिंह, अब मजदूर काम करने के लिये राजनांदगाँव से भाटापारा तथा गोंदिया तक मुफ्त में आ जा सकेंगे.

सरसरी तौर पर देखने से यह योजना कल्याणकारी राज्य का परिचायक है, जिसमें मजदूरों को नि:शुल्क यात्रा करने का अधिकार प्रदान किया गया है. लेकिन इस योजना के निहितार्थ इसके उलट हैं. छत्तीसगढ़ में मजदूरों को तयशुदा न्यूनतम वेतन का भुगतान हो रहा है कि नहीं, यदि यह सुनिश्चित किया गया होता तो बात दूसरी होती. यहाँ पर मजदूरों को सीमित क्षेत्र में रोज-रोज पलायन करने के लिये प्रेरित किया जा रहा है. पलायन के लिये मुफ्त रेल्वे पास मुहैय्या कराया गया है.


राजनांदगाँव का श्रमिक यदि रोजगार की खोज में महाराष्ट्र के गोंदिया तक जाता है तो इससे ज्यादा पीड़ा की बात और क्या हो सकती है? सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो अब छत्तीसगढ़ में रोजगार के अवसर सीमित हैं तथा मजदूरों को काम की तलाश में आस-पास भटकना पड़ेगा, यह शासन द्वारा मान लिया गया है. इज्जत कार्ड के माध्यम से इस पलायन को राज्य शासन की स्वीकृति दी गई है.

कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में हरेक को अपनी योग्यतानुसार काम करने का मौका मिलना चाहिये. यदि काम के अवसर उपल्बध नहीं है तो काहे का कल्याण. यह तो ठेकेदारों का कल्याण हुआ, जिन्हें दूर-दूर से आने वाले मजदूरों की सुविधा उपल्बध करवाई जा रही है, कल्याणकारी राज्य के मुखौटे के नेपथ्य से. जब ठेकेदारों को प्रचुर मात्रा में श्रम उपलब्ध होगा तो वे इस प्रतियोगिता का बेजा फायदा लेने से नहीं चूकेंगे. परिणाम स्वरूप वेतन कम दिया जायेगा तथा अपनी शर्तो पर काम पर रखा जायेगा.

भवन निर्माण गतिविधियों में संलग्न श्रमिकों के कल्याण के लिए राज्य सरकार ने श्रम विभाग के अन्तर्गत छत्तीसगढ़ भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल का गठन किया है और इसके माध्यम से श्रमिकों के लिए कई योजनाओं का संचालन किया जा रहा है. महिला श्रमिकों को निःशुल्क सायकल और सिलाई मशीन तथा पुरूष श्रमिकों को औजार दिए जा रहे हैं. इन श्रमिकों के बच्चों को आई.आई.टी. और शासकीय इंजीनियरिंग तथा मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाने का पूरा खर्च भी कर्मकार कल्याण मंडल द्वारा दिया जाएगा. श्रमिक परिवारों की विवाह योग्य बेटियों की शादी के लिए अब तक दी जा रही दस हजार रूपए की सहायता राशि भी बढ़ाकर 15 हजार रूपए कर दी गयी है.

महिला श्रमिकों को निशुल्क सायकल तथा सिलाई की मशीन देना इसी श्रेणी मे आता है. आवश्यकता है कि इन पर होने वाले शोषण को रोका जाये. बेहतर होता यदि श्रम विभाग में भर्तियों के द्वारा श्रम कानूनों को लागू किया जाता. और भी अच्छा होता जब श्रम निरीक्षक इन असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के कार्य स्थल का निरीक्षण करते. तब पता लगता कि असल में इनकी दशा क्या है. इसके पश्चात् उनमें सुधार की गुंजाइश रहती है. सरसरी तौर पर कुछ सुविधाएं दे देना, उनके वास्तविक जीवन स्तर में कोई बदलाव नहीं लायेगा.

श्रमिकों के बच्चों को मेडिकल तथा इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ाने के लिये धन मुहैय्या करवाना अच्छी बात है पर इसको कौन सुनिश्चित करेगा कि उनके बच्चे बारहवीं तक की पढ़ाई पहले कर लें. इनके अधिकांश बच्चे तो पाठशाला ही नहीं पहुंच पाते हैं. इनके माता-पिता इतना नहीं कमा पाते हैं कि बच्चों को पढ़ाने में ध्यान दें. उनका परिवार तो इसी कोशिश में लगा रहता है कि बच्चे जल्दी कमाई करने लगें, फलतः बाल-श्रमिकों का समाज में जन्म होता है.

तात्पर्य यह कि मजदूरों की वास्तविक उन्नति के लिये प्रयास होना चाहिये. उन्हें इज्जत कार्ड के माध्यम से आवागमन की सुविधा प्रदान करना यथास्थिति को बनाये रखने का एक प्रयास भर है. बावजूद इसके जिस प्रकार से ढ़ोल-नगाड़े बजाकर इस योजना का शुभारंभ किया गया है, उससे चुनावी प्रचार की ज्यादा बू आती है. कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में चुनाव के अलावा भी कल्याण किये जाते हैं. कल्याण भी उसी का होना चाहिये, जिसका नाम लिया जा रहा हो न कि ठेकेदारों का. कुल मिलाकर मुख्यमंत्री की यह घोषणा एक नवउदारवादी एजेंडे के तहत की गई घोषणा ही है, जो कितने दिन तक चल पाएगी, यह फिलहाल तो भविष्य के गर्भ में है.

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