राहुल गांधी की री-लांचिग

नई दिल्ली | अन्वेशा गुप्ता: कांग्रेस रविवार को राहुल गांधी को भारतीय राजनीति में री-लांच करने जा रही है. इसे री-लांच इसलिये कहा जा सकता है क्योंकि भारतीय राजनीति में मोदी के उदय के बाद कांग्रेस के उपाध्यक्ष 56 दिनों के अज्ञातवास से वापस आ गये हैं तथा रविवार को दिल्ली में किसान रैली को संबोधित करेंगे. उम्मीद की जा रही है कि नये ऊर्जा से भरे राहुल इस रैली में अपने भविष्य के कार्यक्रमों का खाका पेश करेंगे.

अब तक कयास लगाये जाते रहे हैं कि राहुल गांधी क्या करने जा रहें हैं. राहुल गांधी की किसान रैली ‘जमीन वापसी’ अर्थात् भूमि अधिग्रहण विधेयक के विरोध के रूप में देखा जा रहा है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी 56 दिनों के अवकाश के बाद देश की राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए रविवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ एक जनसभा को संबोधित करेंगे. इस जनसभा में राहुल और सोनिया केंद्र सरकार के ‘किसान विरोधी’ भूमि अधिग्रहण विधेयक और नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार की नीतियों का विरोध करेंगे.

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने भी भूमि अधिग्रहण के लिये कांग्रेस ने 2013 में विधेयक लाया था जिसमें मोदी सरकार ने बदलाव प्रस्तावित किया है. मूलतः कांग्रेस 2013 में लाए गए अपने मूल विधेयक में किसी भी बदलाव का कड़ा विरोध कर रही है और उस प्रावधान को खत्म करने का विशेष तौर पर विरोध कर रही है, जिसमें भूमि अधिग्रहण के लिए 80 फीसदी भूमि मालिकों की अनुमति को अनिवार्य रखा गया था.

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में मायावती के मुख्यमंत्री रहते हुए 2011 में राज्य सरकार के भूमि अधिग्रहण विधेयक के विरोध स्वरूप राहुल ने भट्टा परसौल में पदयात्रा निकाली थी. राहुल एक बार फिर उसी तरह किसानों की इस रैली का नेतृत्व करते नजर आयेंगे.

23 फरवरी को सदन में पेश हुए बजट सत्र के बाद से ही राहुल सार्वजनिक तौर पर नजर नहीं आए हैं. इस बीच वह राजनीति से बिल्कुल अलग-थलग किसी अनजान जगह छुट्टियां बिताकर 16 अप्रैल को वापस लौटे.

20 अप्रैल से शुरू हो रहे मध्यांतर के बाद के बजट सत्र की ठीक पूर्व संध्या पर राहुल राष्ट्रीय राजधानी के रामलीला मैदान में किसानों की इस जनसभा को संबोधित करेंगे.

राहुल ने वापसी के साथ ही शुक्रवार को राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश से आए किसानों के कई प्रतिनिधिमंडलों से मुलाकात की और भूमि अधिग्रहण विधेयक के प्रति और बेमौसम बारिश के कारण फसलों को हुए नुकासन के प्रति उनकी चिंताओं पर उनसे बात की.

राहुल गांधी, मोदी सरकार के द्वारा पेश विधेयक का विरोध कर अपनी जमीन तलाशने में लगे हैं तथा राग दरबारियों के अलावा अंध विरोध करने वालों की नज़र उनकी इस रैली पर लगी हुई है. ऐसा नहीं है कि कांग्रेस ने अपने शासनकाल में किसानों तथा आदिवासियों के हित के लिये काम किया था.

दरअसल, मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते भारत में तथाकथित सुधारों को पूरी शिद्दत से लागू करने की ईमानदार कोशिश की गई थी परन्तु मोदी सरकार के समान स्पष्ट बहुमत न होने के कारण मनमोहन सिंह पर पॉलिसी पैरालाइसिस के आरोप कॉर्पोरेट घराने लगाते रहें हैं.

यह भी सच है कि यूपीए एक और दो में सोनिया गांधी के हस्तक्षेप के चलते मनरेगा, आरटीआई कानून जैसे प्रगतिशील कानून बने परन्तु मनमोहन तथा मोंटेक पिछले दरवाजे से नवउदारवाद को बढ़ावा देते रहें हैं. इस कारण से कई मुद्दों पर उनकी कांग्रएस अध्यक्ष से पटरी नहीं बैठ रही थी.

2014 ते लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के साथ ही एक गुणात्मक परिवर्तन यह हुआ कि कम से कम लोकसभा में भाजपा किसी और दल के समर्थन की मोहताज नहीं रही. हां, राज्यसभा में भाजपा कमजोर है परन्तु अमित शाह को अध्यक्ष बना मोदी इस कोशिश में हैं कि राज्यों में भी सत्ता संतुलन उनके पक्ष में आ जाये.

इस बीच, कांग्रेस अपनी खोई जमीन तलाश रही है. कभी-कभी इसी धुन में कांग्रेसी प्रयंका का राग भी छेड़ देते हैं परन्तु परिवार ने तो राहुल गांधी को देश में राजनीति करने के लिये नियुक्त किया हुआ है.

राहुल गांधी के 56 दिनों के अज्ञातवास से वापसी के बाद क्या कांग्रेस अपने नीतियों में कोई परिवर्तन लाने वाली है यह भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है. वास्तव में, लोकसभा चुनाव में जितने लोगों ने नरेन्द्र मोदी के पक्ष में वोट नहीं दिया उससे ज्यादा लोगों ने कांग्रेस की नीतियों के खिलाफ मतदान किया. राहुल गांधी यदि वाकई में कांग्रेस की खोई जमीन वापस चाहते हैं तो उन्हें नीतियों में परिवर्तन लाना होगा.

अब न कांग्रेस के सामने मनमोहक सिंह की मजबूरी है और न ही खोने के लिये कुछ जमीन है. कांग्रेस के पास पाने के लिये अब भी मौका है कि मोदी सरकार की नीतियों का विरोध कर फिर से पुरानी जमीन तलाशी जाये. उल्लेखनीय है कि चुनावी वादों के अनुसार न तो काला धन लाया गया और न ही हर देशवासियों के बैंक खातों में लाखों रुपये ट्रांसफर हुये. विदेशों से निवेश को आकर्षित करके देश के जीडीपी को बढ़ाने का प्रयास जारी है जिसमें अवाम को कुछ नहीं मिलने वाला है.

इसी के साथ यह उल्लेख करना गैर-वाज़िब न होगा कि हाल की विश्व-बैंक की रिपोर्ट ने एलान किया है कि निवेश बढ़ने के कारण भारत के विकास दर में वृद्धि होगी परन्तु खपत नहीं बढ़ेगी. खपत न बढ़ने का तात्पर्य ही है कि देश के लोगों को घऱ में कुछ आने वाला नहीं है. इसके उलट, विदेशी निवेशक अपना मुनाफा अपने देश में ले जायेंगे. जाहिर है कि तमाम दावों तथा वादों के विपरीत अवाम के बाशिंदों की हालत बद से बदतर होती जायेगी. मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण विधेयक इसी का संकेत अपने में छुपाये हुये है.

कुल मिलाकर, कांग्रेस के पास देश के लिये कुछ कर गुजरने का पूरा मौका है. देखते हैं कि राहुल गांधी केवल अपने को री-लांच करते हैं या वैकल्पिक नीतियां पेश कर उसे लागू करने के लिये जमीनी लड़ाई लड़ते हैं?

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