इस जन और गण का मन

सुदेशना रुहान
हाँ, वे जवाहरलाल नेहरू के विश्वसनीय थे.

एक सूर्योदय और दो देश. नयी दिल्ली से मीलों दूर लंदन में अब तक कोहरा छँटा नहीं था. वहाँ जश्न जैसी कोई बात नहीं थी, मगर राजनीतिक गलियारों में हलचल ज़रूर थी. इंडिया हॉउस के ख़चाख़च भरे कमरे में ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त, वीके कृष्ण मेनन पहुँच चुके थे.


अंग्रेज़ी नौकरशाही एक बड़ा तबका उन्हें नापसंद करता था, और दूसरा उनसे डरता था. लेकिन मेनन नेहरू के बेहद करीबी थे. आज के दिन के लिए प्रधानमंत्री ने स्वयं उनकी नियुक्ति लंदन में करवाई थी. एक अभूतपूर्व संदेश लिए भारत का राजपत्र उनके हाथों में इंतज़ार करने लगा.

26 जनवरी 1950 की सुबह, उस भारतीय उच्चायुक्त ने अंग्रेज़ी शासन को संबोधित करते हुए कहा-“एक लंबी प्रतीक्षा की घड़ी आज समाप्त होती है और एक प्रतिज्ञा के साथ, आज हर भारतीय एक नयी पद्वी से सम्मानित होता है कि वह एक गणतंत्र देश का नागरिक है. यह प्रत्येक व्यक्ति के स्वतंत्रता के अधिकार को सुनिश्चित करती है.”

और इसके साथ ही ब्रिटिश राज का आखिरी स्तंभ ध्वस्त हो गया. उनकी कल्पना के विरुद्ध, सूरज हिंदुस्तान में चमक रहा था. कहते हैं, उस सर्द दोपहर को लंदन में सूर्य हमेशा के लिए अस्त हो गया.

हिन्दुस्तान के लिए, हिन्दुस्तान के बिना

भारत की आज़ादी और गणतंत्रता की नींव 1920 के दशक से ही पड़ने लगी थी. यह साफ़ था कि अब अंग्रेजी शासन और राजतंत्र समाप्त होना चाहिए. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेज़ मज़बूत पक्ष में थे. शासन और निष्ठुर हो उठा. मगर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी छवि साफ़ रखने हेतु 1928 में देश में साइमन कमीशन बिठाया गया. हैरानी की बात ये कि भारत के संवैधानिक सुधार के लिए बने इस कमीशन में किसी भारतीय के लिए कोई जगह नहीं थी. सात सदस्य वाली इस कमिटी में सभी अंग्रेज़ थे.

महात्मा गाँधी, चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरु शुरू से ही भारत के लिए एक अलग संविधान की मांग करते आये थे. एक ऐसा संविधान, जो भारत की जनता के लिए उनके जन प्रतिनिधियों द्वारा बनाया गया हो! मगर यह सब कुछ इतना आसान नहीं था. देश उस वक़्त कई भौगोलिक और राजनीतिक खेमे में बंटा हुआ था. लोकशाही और राजशाही की मांग करने वालों में भी. दलित और सवर्ण, हिन्दू और मुसलमान में भी.

मगर दूसरे विश्वयुद्ध के अंत में ब्रिटेन आर्थिक रूप से धराशायी हो गया. युद्ध में लिया गया क़र्ज़ इतना अधिक था (लगभग 80 करोड़ यूरो) कि इंग्लैंड दो साल से अधिक कहीं भी अपना राज बरक़रार नहीं रख सकता था. इससे भारत में स्वराज और स्थानीय संविधान का रास्ता साफ़ हो गया. और अंततः 1945 में हुए ‘शिमला समझौते’ में लॉर्ड वेवल ने इस योजना पर अपनी मुहर लगा दी.

भाषा और संविधान

395 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियों के साथ भारत का संविधान दुनिया के सबसे लम्बे संविधानों में से एक है. दिसंबर (1946-1949) के मध्य- तीन साल की अवधि में, 11 सत्रों और 165 दिनों के कार्यकाल और इस दौरान अनेक कमिटियों की बैठक के बीच इसका निर्माण हुआ.

संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को दिल्ली में हुयी थी, जिसमें लगभग हर सामाजिक तबके को शामिल करने की कोशिश रही. नेहरू और पटेल की अगुवाई में इसमें छात्र संगठन, अधिकारी, दलित वर्ग, रियासतों के प्रतिनिधि और धार्मिक समूहों ने अपना पक्ष रखा. इस दौरान दो नाम प्रबलता से उपर आते हैं, एक- आदिवासी नेता जयपाल सिंह, जिन्होंने बिहार से अलग आदिवासियों के लिए झारखंड राज्य की मांग रखी, और दूसरी बेग़म ऐज़ाज़ रसूल- जो कि अल्पसंख्यक और महिलाओं के अधिकारों की पक्षधर थीं.

संवैधानिक मसौदे में बी आर अंबेडकर की भागीदारी भी बेहद उल्लेखनीय है. ड्राफ्टिंग कमिटी के अध्यक्ष होने के नाते देश में दलित, महिलायें और अल्पसंख्यक समुदाय को बराबर अधिकार दिलवाने का श्रेय इन्हीं को जाता है.

अंत में अब प्रश्न राष्ट्रभाषा का था. महात्मा गाँधी का मानना था कि इसे केवल हिंदी या उर्दू न होते हुए ‘हिन्दुस्तानी’ होना चाहिए. मगर देश के बंटवारे के बाद यह उम्मीद धूमिल हो गयी और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का दबाव बढ़ने लगा. कुछ आपत्तियों के बावजूद (ख़ासकर दक्षिण भारत से) ‘हिंदी’ को केंद्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर चुन लिया गया- इस समझौते के साथ कि 1965 तक केंद्र, सदन और नौकरशाही का सम्पूर्ण कामकाज अंग्रेज़ी में होगा.

एक तार, दो देश

दिसंबर 1949 में संविधान के पूरे होते ही हिन्दुस्तान के गणतंत्र बनने का रास्ता साफ़ हो गया. इसे देश भर में लागू करने के लिए 26 जनवरी का दिन चुना गया. 1930 में ये वही दिन था, जब भारत ने पहली बार अंग्रेज़ी शासन से ‘पूर्ण स्वराज’ माँगा था. अब गवर्नर जनरल की परंपरा भी समाप्त हो रही थी.

इसकी जगह राष्ट्रपति लेने वाले थे. हालांकि, पंडित नेहरू ने इस पद का आश्वासन सी.राजगोपालाचारी को दे रखा था जो उस वक़्त भारत के आखिरी गवर्नर जनरल के रूप में पदस्थ थे. मगर ऐसा हो न सका और सरदार पटेल के करीबी- डॉ. राजेंद्र प्रसाद इस पद के लिए चुन लिए गए.

26 जनवरी 1950 को देश एक नए उत्साह में सराबोर हो गया. और तभी राष्ट्रपति भवन में ब्रिटेन के महाराज एक संदेश पहुंचा. लिखा था “भारत के गणतंत्र बनने पर मैं आप सभी को अपनी शुभकामनाएं देता हूँ. और मैं आशा करता हूँ कि आने वाले समय में हमारे रिश्ते और सढृढ़ होंगे.” ये पढ़कर डॉ राजेंद्र प्रसाद मुस्कुरा दिए.

उस सुबह आकाश में देर तक भारतीय वायु सेना के जहाज़ उड़ते रहे. ज़मीन अब आज़ाद थी, आसमान भी. भारत अपनी तमाम उम्मीदों के साथ जीत गया. और ये इसके फिर से जन्मने की दास्तान है.

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