नहीं रहे रेशमलाल जांगड़े

रायपुर | संवाददाता: देश की पहली संसद के सदस्य रेशमलाल जांगड़े नहीं रहे. भारत की पहली संसद के तीन जीवित सदस्यों में से एक रेशमलाल जांगड़े ने सोमवार तड़के छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली.

रेशमलाल जांगड़े पहली बार 1950 में अंतर्कालीन संसद मनोनीत हुए थे.बाद में 1952 में उन्होंने बिलासपुर से चुनाव जीता और देश की पहली लोकसभा के सदस्य बने. 1957 और 1989 में भी वे सांसद के रुप में चुने गए. इस दौरान वे दो बार मध्यप्रदेश विधानसभा के सदस्य भी बने.

जब रेशमलाल जांगड़े राजनीति में आये, उस ज़माने की राजनीति की भी अपनी दुश्वारियां थीं. छत्तीसगढ़ के दलित सतनामी समाज में जन्मे रेशमलाल जांगड़े बरसों तक अस्पृश्यता का भेदभाव झेलते रहे. नागपुर से वकालत की पढ़ाई करके लौटे रेशमलाल जांगड़े अपने समाज के पहले वकील थे और बाद में पहले सांसद भी बने. लेकिन सामाजिक भेदभाव कम नहीं हुआ.

1954 में लोकसभा में पेश किये गए अस्पृश्यता निवारण विधेयक पर जोरदार बहस कर रेशमलाल जांगड़े जब वापस अपने गांव लौटे तो इलाके में बड़ी जातियों की त्योरियां चढ़ी हुई थी.

अंग्रेजों के खिलाफ 1942 के आंदोलन में भाग लेने और जेल की हवा खाने वाले रेशमलाल जांगड़े को इस बात का गहरा दुख था कि आजादी के बाद भी सरकार और व्यवस्था से उन्हें लड़ना पड़ा. लेकिन इन तमाम राजनीतिक उपलब्धियों के बाद भी उन्हें अपने ही शहर में भुला दिया गया.

जिन राजनीतिक पार्टियों में वे लगभग 55 साल से भी अधिक समय तक सक्रिय रहे, उन्होंने भी इनकी सुध नहीं ली. दुख-सुख में कोई पूछने नहीं आया. पिछले सप्ताह अस्पताल में भर्ती होने के बाद राजनेता ज़रुर उन्हें देखने पहुंचे.

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