मरने का हक जायज

सुनील कुमार
जैन समाज में भूखे रहकर अपनी मर्जी से जान दे देने की एक धार्मिक प्रथा, संथारा, के खिलाफ अभी राजस्थान हाईकोर्ट ने एक फैसला दिया, और इसे आत्महत्या के दर्जे में रखकर इसे गैरकानूनी करार दिया. यह मामला अदालत में कई बरस से चल रहा था, और दूसरी तरफ अदालत में यह मामला भी चल रहा था कि आत्महत्या की कोशिश में नाकामयाब रहने वाले लोगों पर क्या बाद में और मुकदमा चलाना चाहिए? आज भारत में कानून आत्महत्या की कोशिश को जुर्म करार देता है और उस पर सजा है. अगर जान चली गई तब तो ठीक है, और अगर जान बच गई तो इस नाकामयाबी के लिए कैद काटनी होगी.
ये दो अलग-अलग नौबतें हैं, एक में किसी धार्मिक संस्कार के तहत सोच-समझकर, और आमतौर पर जिंदगी के आखिरी दौर में लोग अपनी मर्जी से खाना-पीना छोड़कर जिंदगी को छोड़ देते हैं. इसमें समाज के लोग उनके आसपास रहते हैं, और उनके फैसले के साथ रहते हैं. दूसरी तरफ आत्महत्या करने वाले लोग अमूमन अकेले रह जाते हैं, किसी से अपनी तकलीफ बांटने की गुंजाइश नहीं बचती है, और जिंदगी से थक-हारकर वे एकदम अकेले यह फैसला लेते हैं कि उन्हें खुदकुशी करनी है, और उनके ऐसे फैसले को कोई सामाजिक मान्यता भी नहीं रहती.

इन दो अलग-अलग तरह से जान दे देने पर अलग-अलग अदालतों के फैसले हैं, लेकिन इन दोनों में एक बात एक सरीखी है कि लोग अपनी मर्जी से अपनी जान देते हैं. अब अगर खुदकुशी करने वालों को देखें, तो वे जिंदगी की तकलीफों, या नाकामयाबी, या किसी तरह का धोखा खाकर, या कोई जुर्म करके उसके अपराधबोध के नीचे दबे हुए, ऐसी किसी एक या अधिक वजह से जान देते हैं. इनमें से बहुत सी वजहें ऐसी रहती हैं, जिनमें सरकार या समाज ऐसे लोगों की कोई मदद नहीं कर पाते. परिवार मदद करना चाहे, तो भी खुदकुशी करने वाले गरीब किसान के परिवार की तरह, वे कोई मदद करने के लायक रहते नहीं. नतीजा यह होता है कि एकदम अकेला पड़कर, या एकदम असहाय होकर लोग खुदकुशी करते हैं. सरकार, समाज, या किसी और के पास उनकी मदद के लिए कुछ नहीं होता.


अब ऐसे में किसी के लिए जीना अगर मुश्किल हो जाए, और इतना मुश्किल हो जाए कि उस जीने के मुकाबले मरना आरामदेह लगे, तो ऐसी खुदकुशी को जुर्म क्यों मानना चाहिए? लोग कहते हैं कि लोग अपने आपको जिंदगी दे नहीं सकते, तो वे जिंदगी छीनने के हकदार कैसे हो सकते हैं? अब इसी तर्क का एक दूसरा पहलू यह है कि जो समाज जिंदा रहने में मदद नहीं कर सकता, नहीं करता, उसे किसी के मरने को रोकने का क्या हक है?

मेरा यह मानना है कि जिंदा रहना, या मरना, हर किसी का निजी हक होना चाहिए, और खुदकुशी को जुर्म बनाना उसी समाज के लिए जायज हो सकता है जो कि लोगों के जिंदा रहने में मदद करने के लिए जिम्मेदार हो सके. जो मर जाते हैं, उनको तो सजा देना मुमकिन नहीं होता, लेकिन जो खुदकुशी की कोशिश में नाकामयाब रहते हैं, वे सजा पा जाते हैं जो कि एक तकलीफजदा पर और तकलीफ थोपने का कानूनी इंतजाम है.

आज दुनिया के कई देशों में मरीजों की हालत एक सीमा से गुजर जाने के बाद उनको डॉक्टरी मदद से मर जाने का हक देने की चर्चा चल रही है. स्विटजरलैंड शायद ऐसा अकेला देश है जिसमें ऐसी आत्महत्या की जा सकती है, और इसके लिए वहां एक-दो डॉक्टर मदद भी करते हैं. लेकिन इसके पहले बहुत सी कानूनी कार्रवाई, बहुत सी मेडिकल जांच के नियम भी हैं.

भारत में समाज और अदालत शायद ही ऐसे किसी हक के साथ खड़े हों, क्योंकि यहां पर लोगों को रोक लगाकर अधिकार महसूस करना, और उसका मजा लेना अच्छा लगता है. जिस तरह किताबों पर रोक, फिल्मों पर रोक, धर्म की आलोचना पर रोक, वेबसाइटों पर रोक लगाई जाती है, उसी तरह लोगों के बिना शादी साथ रहने पर रोक, प्रेम-विवाह पर रोक, समलैंगिक रिश्तों पर रोक में हिन्दुस्तानी समाज और उसी से बना हुआ कानून बड़ा मजा पाता है. ऐसे में खुदकुशी का हक देना, हिन्दुस्तानियों को रोकने का अपना हक छोड़ देने जैसा लगेगा. इसलिए यहां पर लोग जिंदगी से थक चुके लोगों पर जिंदगी को उसी तरह थोपकर रखना चाहेंगे, जिस तरह भूखों मरते हुए जिंदगी से थकी हुई गाय को हिन्दू समाज जिंदा रखना चाहता है. उसे खाने के लिए सिर्फ घूरे का पॉलीथीन मुहैया कराएगा, लेकिन उसे मरने नहीं देगा. यह नौबत कुछ उसी तरह की है कि घर में बूढ़ी और तिरस्कृत मां को पेटभर खाना नहीं दिया जाएगा, प्रेम के दो शब्द नहीं दिए जाएंगे, इलाज नहीं दिया जाएगा, इज्जत नहीं दी जाएगी, लेकिन फिर भी उसे मरने की छूट नहीं दी जाएगी, और वह वक्त के हाथों मर जाए, तो सिर मुंडाकर उसका अंतिम संस्कार किया जाएगा.

जो समाज जिंदा रहने की बुनियादी जरूरतों का हक नहीं दे सकता, उस समाज को किसी को मरने से रोकने का कोई हक नहीं हो सकता.

अभी कुछ बरस पहले की असल जिंदगी की एक कहानी है जिसमें मेरे ही शहर में एक कॉलोनी में पड़ोसियों की शिकायत पर एक महिला को देह बेचने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया. उसने पुलिस को बताया कि उसका पति कैंसर की वजह से बिस्तर पर है, और इलाज मुश्किल और महंगा है. दो या तीन बच्चे हैं, और वह खुद कुछ खास पढ़ी हुई नहीं है. नौकरी ढूंढने की कोशिश की, तो कुछ हजार की नौकरी के साथ भूखे मालिक भी जुड़े हुए मिले. ऐसे में जब तनख्वाह के लिए काम के साथ-साथ देह भी देने की मजबूरी हो, तो फिर उसने देह बेचकर ही घर चलाने का फैसला लिया. और इसके बिना कोई दूसरा चारा भी नहीं था.
अब जो समाज एक मरीज को इलाज नहीं दे सकता, उसके बच्चों को खाना और पढ़ाई नहीं दे सकता, काम चाहने वाली एक महिला को काम नहीं दे सकता, वह उसके देह बेचने के खिलाफ एक कानून बनाकर, हाथ में पत्थर लिए चारों तरफ घेरकर खड़ा जरूर रह सकता है.

इससे मंटो की एक कहानी याद पड़ती है कि एक तांगेवाले की मौत के बाद उसकी बीवी ने म्युनिसिपल से तांगा चलाने का लाइसेंस मांगा. उसकी अर्जी पर बार-बार उसे लौटा दिया गया कि एक औरत को तांगा चलाने का लाइसेंस नहीं मिल सकता. थक-हारकर उसने चकले पर बैठना तय किया, और म्युनिसिपल ने उसे पल भर में देह बेचने का लाइसेंस दे दिया क्योंकि देह बेचना एक औरत के लिए कानूनी काम था, और म्युनिसिपल के नियमों में उसका इंतजाम था.

लेकिन अगर कैंसर के मरीज की बीवी, या तांगेवाले की बीवी आज खुदकुशी की इजाजत मांगें, तो भारत या पाकिस्तान के कानूनों में इसकी इजाजत नहीं है. कोई सड़क किनारे फुटपाथ पर भूख से मर जाए, तो उसे बचाने के लिए कोई कानून नहीं है, लेकिन कोई यह मुनादी कर दे कि वह जान देने वाला है, या जान देने वाली है, तो सरकार उसे उठाकर अस्पताल ले जाकर उसे जबर्दस्ती दवा और खाने पर जिंदा रखेगी. मणिपुर में एक आंदोलनकारी शर्मिला शायद दस बरस से अधिक से अस्पताल में ऐसे ही अनशन पर जिंदा रखी गई है. लेकिन अगर कोई यह मुनादी करे कि उसके पास खाने को नहीं है, और वह भूख से ही मर जाएगा, या उसकी बीमारी के इलाज की गुंजाइश नहीं है, और वह बिना इलाज मर जाएगी, तो ऐसे लोगों को जिंदा रखने का न कानून है, न ही किसी की कानूनी जिम्मेदारी है.

जिंदा रखने का बोझ खासा बड़ा होता है, खासा भारी-भरकम होता है. लेकिन मौत की बात आ जाए, तो यही समाज मौत का हक नहीं देना चाहता, वह लाठी लेकर खड़े हो जाता है कि हमारे रहते तुम मरने वाले कौन हो? और यह समाज खाना या दवा लेकर खड़ा नहीं होता कि हमारे रहते हम तुमको मरने नहीं देंगे. खुदकुशी की नौबत वाले लोगों के लिए भी सरकार और समाज के पास कानून है, मदद नहीं है. यह तो जब कोई औपचारिक मुनादी कर दें कि वे जान देने वाले हैं, तो सरकार की मजबूरी हो जाती है कि उन्हें ताकत का इस्तेमाल करके जिंदा रखे.

जान देने का हक एक बुनियादी हक होना चाहिए. हिन्दुस्तान जैसे देश में जहां पर खुदकुशी करने वाले लोग आमतौर पर मानसिक तनाव से गुजरने वाले लोग भी होते हैं, उनमें से अधिकतर की किसी मनोचिकित्सक तक कोई पहुंच नहीं होती, क्योंकि ऐसे विशेषज्ञ हिन्दुस्तान में आबादी की जरूरत के अनुपात में न के बराबर हैं. तो यह समाज किसी परेशान को मानसिक राहत देने की हालत में भी नहीं है, लेकिन उसे मौत का हक देने के खिलाफ है.

हर किसी को आत्मसम्मान के साथ जीने का हक होना चाहिए. और जब ऐसा मुमकिन न हो तो बचे-खुचे आत्मसम्मान के साथ मरने का हक होना चाहिए. इस तर्क का जैन धर्म के किसी रिवाज से लेना-देना नहीं है, लेकिन अगर जिंदगी की पूरी संतुष्टि के साथ में अगर कोई अपने आखिरी दिनों में खाना-पीना छोड़कर जान देना चाहते हैं, तो उनको भी इसी तर्क के तहत मरने की इजाजत मिलनी चाहिए. यह एक अलग बात है कि जैन धर्म के ऐसे लोगों के सामने जिंदा रहने की दिक्कत नहीं होती, लेकिन अगर वे चाहते हैं कि वे जिंदा न रहें, तो उन्हें उनकी सोच के मुताबिक मरने का हक मिलना चाहिए.

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