मौत का सम्मानजनक अधिकार

जब नागरिकों को स्वास्थ्य का अधिकार नहीं मिल रहा तो क्या उन्हें सम्मानजनक मौत का अधिकार देने से मना किया जा सकता है? मुंबई के एक शादीशुदा जोड़े ने इच्छामृत्यु की मांग की है. इससे इच्छामृत्यु का मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है. इस विषय पर प्रस्तावित एक विधेयक के पास होने की संभावना ने भी इस मसले को चर्चा में लाया है.

21 दिसंबर, 2017 को 86 साल के नारायण लवाटे और 79 साल की उनकी पत्नी इरावती ने भारत के राष्ट्रपति से यह मांग की कि उन्हें मेडिकल हस्तक्षेप के जरिए इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए. उन्होंने बताया कि उनकी जिंदगी सुखद रही है, स्वास्थ्य ठीक रहा है और उन पर न कोई निर्भर है और न ही उन पर कोई देनदारी है. इन दोनों ने कहा है कि ऐसे में यह सही नहीं होगा कि उन्हें किसी गंभीर बीमारी का शिकार होकर मरने का इंतजार करना पड़े और इसमें से एक को अकेलापन झेलने के लिए बाध्य होना पड़ेगा.


इसके पहले 1977 में सीए थॉमस मास्टर ने केरल उच्च न्यायालय से अपनी जिंदगी खत्म करने की मांग यह कहते हुए की थी कि उन्होंने अपनी जिंदगी जी ली और अब उनकी और जीने की कोई इच्छा नहीं बची है. 2000 में अदालत ने यह अर्जी खारिज कर दी. 70 साल से अधिक उम्र की करिबासम्मा कर्नाटक की हैं और उन्हें गंभीर तकलीफदेह बीमारी है. वे इंतजार कर रही हैं कि कब उन्हें सम्मानजन मौत की अनुमति मिलेगी. इन तीनों मामलों में सम्मानजनक मौत की मांग समान है.

इच्छामृत्यु भारत में गैरकानूनी है. हालांकि, 2011 में उच्चतम न्यायालय ने अरुणा शॉनबाग मामले में यह आदेश दिया कि अगर मरीज के ठीक होने की संभावना बिल्कुल नहीं हो और स्थाई तौर अचेत अवस्था में हो तो इलाज बंद करके उसे मरने दिया जा सकता है. हालांकि, इसमें सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु में फर्क किया गया है. निष्क्रिय के तहत इलाज बंद करना आता है और सक्रिय के तहत मेडिकल हस्तक्षेप के जरिए मौत देना शामिल है. मौजूदा विधेयक सुप्रीम कोर्ट के इसी आदेश को कानून की शक्ल देने वाला है.

भारत में इच्छामृत्यु की बहस इस बात के आसपास केंद्रित है कि जीवन के अंत करने का अधिकार किसे है. यह बहस चलती रहेगी लेकिन इस बीच इसे भारत के सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़कर देखा जाना चाहिए. सरकार इस चीज के लिए तैयार नहीं है कि कोई आदमी अपनी मौत की सहमति दे. क्योंकि उसे लगता है कि निहित स्वार्थों की वजह रिश्तेदार बुजुर्गों के खिलाफ इस सहमति का दुरुपयोग कर सकते हैं. यह एक विडंबना है कि सरकार इसके दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था नहीं कर सकती.

गंभीर और असाध्य बीमारियों को झेल रहे लोगों के लिए भारत में मौत की स्थिति बेहद मुश्किल है. 2015 में इकॉनोमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ने क्वालिटी ऑफ डेथ इंडेक्स तैयार किया था. 80 देशों के अध्ययन पर आधारित इस इंडेक्स में भारत का स्थान 67वां है. दिसंबर 2017 में विश्व बैंक और विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट ने यह बताया कि स्वास्थ्य सेवाओं पर जेब से होने वाले खर्च की वजह से भारत में हर साल 4.9 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जा रहे हैं. यह पूरी दुनिया की कुल संख्या का तकरीबन आधा है.

भारत के सेंट्रल ब्यूरो ऑफ हेल्थ इंटेलिजेंस का आंकड़ा इससे भी बड़ा है. स्वास्थ्य क्षेत्र पर भारत में सबसे कम खर्च होता है. 2017-18 की आर्थिक समीक्षा कहती है कि भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र पर जीडीपी का सिर्फ 1.4 फीसदी खर्च होता है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में इसे 2.5 फीसदी करने का लक्ष्य रखा गया है.

पैसे वाले लोगों की स्थितियां थोड़ी अच्छी हैं. 90 फीसदी से अधिक आईसीयू निजी क्षेत्र में हैं. पैसे वाले लोग खर्चीली चिकित्सा करा पा रहे हैं. अब भी गंभीर बीमारी के इलाज से संबंधित जागरूकता और प्रशिक्षण की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है. निजी क्षेत्र में मुनाफा कमाने वालों के लिए भी इसकी व्यवस्था करने का कोई प्रोत्साहन नहीं है. ऐसे में असाध्य बीमारियों का इलाज बेहद खर्चीला और पीड़ादायी हो जाता है. इसमें मरीज और उसके परिजनों की समस्याओं का कोई महत्व नहीं रहता.

अगर सरकार बीमार और बुजुर्ग लोगों को सम्मान की जिंदगी नहीं दे सकती है तो फिर उसे सम्माजनक मौत के अधिकार को मना करने का कोई हक नहीं है. लेकिन भारत के कानून जीवन के अधिकार को प्राकृतिक और मौत के अधिकार को अप्राकृतिक मानते हैं. लेकिन यह भूला दिया जा रहा है कि भारत सरकार खास मौकों पर मौत देने को अपना अधिकार मान लेती है. चाहे वह फांसी की सजा का मामला हो या फिर मुठभेड़ का. इसलिए सामान्य नागरिकों की ओर से सम्मानजनक मौत की मांग को सरकारी स्वास्थ्य सेवा तंत्र और निजी अस्पतालों के शोषण से जोड़कर देखा जाना चाहिए. इच्छामृत्यु को लेकर चल रहे मौजूदा बहस को हमारी लचर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए.
1966 से प्रकाशित इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली के ताजा संपादकीय का अनुवाद

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