रोहिंग्याओं को शरणार्थी मानें

प्रकाश करात
मोदी सरकार ने म्यांमार से आकर भारत में शरण लेने वाले रोहिंग्याओं को वापस भेजने का जो फैसला लिया है, एक अनुचित कदम है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक एफिडेविट दिया है, जिसमें यह कहा गया है कि रोहिंग्या प्रवासियों के बीच उग्रवादी तत्व हैं, जिनके रिश्ते पाकिस्तानी आईएसआई और तथाकथित इस्लामिक स्टेट के साथ हैं और इसलिए उनसे सुरक्षा के लिए खतरा है. सरकार का कहना है कि चूंकि ये अवैध प्रवासी हैं, उसे उन्हें वापस धकेल देने का अधिकार है.

भारत में करीब 40 हजार रोहिंग्या रह रहे हैं जो पिछले कई वर्षों में यहां आए हैं. वे दिल्ली, फरीदाबाद, जयपुर, जम्मू तथा दूसरी जगहों पर अस्थायी कॉलोनियों तथा कैंपों में, बदहाली में रहते हैं. इन इलाकों के पुलिस रिकार्डों के अनुसार, यहां किसी तरह की आतंकवादी गतिविधियों की या इन कैंपों में रह रहे लोगों से जुड़े गंभीर अपराधों की कोई शिकायतें नहीं हैं. जमीनी सच्चाइयां सरकार के इन अतिरंजित तथा स्वार्थप्रेरित दावों का खंडन करती हैं कि उनसे कोई सुरक्षा खतरा है.


वास्तव में इन असहाय शरणार्थियों के प्रति सरकार का रुख उनके धर्म से तय हो रहा है और वे धर्म से मुसलमान हैं. मोदी सरकार ने साफ कर दिया है कि अवैध अप्रवासियों को हिंदू, सिख या बौद्ध होने की सूरत में ही भारत में रहने दिया जाएगा. वास्तव में नागरिकता (संशोधन) विधेयक उन्हें ही नागरिकता देने का प्रस्ताव करता है, मुस्लिम अप्रवासियों को नहीं.

भारत ने अतीत में तिब्बत, श्रीलंका तथा अफगानिस्तान के शरणार्थियों को पनाह दी है. 1971 में लाखों शरणार्थी पूर्वी-पाकिस्तान से सीमा पार कर भारत में आए थे. हालांकि, भारत ने शरणार्थियों पर संयुक्तराष्टÑ संघ की कन्वेंशन पर दस्तखत नहीं किए हंै, फिर भी उसने सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा पर और नागरिक व राजनीतिक अधिकारों की हिफाजत करने वाली अन्य अंतर्राष्टÑीय कन्वेंशनों पर तो दस्तखत किए हुए हैं.

इन रोहिंग्याओं को निकालकर भेजेंगे कहां? म्यांमार अपने नागरिकों के रूप में उन्हें स्वीकार नहीं करता है. बांग्लादेश में पहले ही शरणार्थियों की बाढ़ आयी हुई है. जनतांत्रिक सिद्धांतों से बंधी एक प्रमुख ताकत होने के नाते, मोदी सरकार अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकती है. उसे रोहिंग्या मुद्दे को समग्रतावादी तथा जनतांत्रिक नजरिए से लेना होगा. म्यांमार में रोहिंग्या समस्या लंबे अर्से से चली आ रही है. फौजी शासन के दशकों में उनका उत्पीड़न किया गया है और उन्हें नागरिकता के अधिकारों से वंचित किया गया है. म्यांमार की सरकार उन्हें बांग्लादेश से आए हुए विदेशी मानती है, जबकि उनमें से अनेक के पुरखे चार-पांच सदी पहले अराकान तट पर पहुंचे थे.

रोहिंग्या शरणार्थियों का ताजा विस्फोट, राखाइन प्रांत में रोहिंग्या अल्पसंख्यकों पर बौद्ध कट्टरपंथियों तथा सेना के मुसलसल हमलों की पृष्ठभूमि में हुआ है. इसके चलते अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (एआरएसए) ने जवाबी हमले किए हैं, जिसका गठन चार साल पहले हुआ था. इस्लामी रैडीकल एआरएसए का नेतृत्व कर रहे बताए जाते हैं. बहरहाल, सुरक्षा बलों के जवाबी हमले की असली झोक आम रोहिंग्या आबादी को झेलनी पड़ी है. उनके गांव जला दिए गए हैं और उन्हें बांग्लादेश के लिए भागने पर मजबूर होना पड़ा है.

पिछले कुछ महीनों के दौरान बांग्लादेश में चार लाख रोहिंग्या- स्त्री, पुरुष तथा बच्चे पहुंचे हैं, जिससे बांग्लादेश सरकार के लिए गंभीर समस्या पैदा हो गयी है, जिसे इन बेघरों की भारी बाढ़ को संभालने के लिए अपना पूरा जोर लगाना पड़ रहा है. इस मानवतावादी संकट से निपटने के लिए भारत को बांग्लादेश को हर तरह की मदद देनी चाहिए.

यह खेदजनक है कि प्रधानमंत्री ने हाल की म्यांमार की अपनी यात्रा का उपयोग एक मानवतावादी संकट के रूप में रोहिंग्या संकट का मुद्दा उठाने के लिए नहीं किया. इसके बजाए उन्होंने बर्मा की सरकार के ही रुख को दोहराया कि यह उसका अंदरूनी सुरक्षा का मुद्दा है. बांग्लादेश के शरणार्थी संकट की विकरालता को पहचानने में देरी करने के बाद, मोदी सरकार को अब तो अपना रुख सही करना चाहिए. भारत सरकार को कूटनीतिक माध्यमों का उपयोग कर म्यांमार सरकार से आग्रह करना चाहिए कि राखाइन प्रांत में हिंसा को रुकवाए और राजनीतिक समाधान के लिए कदम उठाए.

जहां तक भारत में रह रहे रोहिंग्याओं का सवाल है, उन्हें शरणार्थी का दर्जा दिया जाना चाहिए और प्रासंगिक दस्तावेज दिए जाने चाहिए. यही यह भी सुनिश्चित करेगा कि वे स्थानीय आबादी में न मिल जाएं और पहचान के झूठे दस्तावेज हासिल न करें. इससे, म्यांमार में उनके शांति व हिफाजत के साथ रहने के अनुकूल हालात बनने की स्थिति में, उनका म्यांमार वापस भेजा जाना भी आसान हो जाएगा. उन्हें शरणार्थी का दर्जा तथा प्रासंगिक दस्तावेज मुहैया कराना अधिकारियों की इस पर नजर रखने में भी मदद करेगा कि कहीं कोई अतिवादी तत्व तो नहीं हैं जो उनकी दयनीय हालत का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हों.

भारत किस तरह रोहिंग्याओं के साथ सलूक करता है, इससे हमारे संविधान में रोपे हुए जनतांत्रिक तथा धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों की परीक्षा होने जा रही है. उन्हें इस्लाम-भीति का शिकार नहीं बनने दिया जा सकता है.
* लेखक माकपा के वरिष्ठ नेता हैं.

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