शिक्षा कब तक निजी विद्यालयों के चंगुल में रहेगी

संदीप पांडेय
मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 में 25 प्रतिशत अलाभित एवं दुर्बल वर्ग के बच्चों के लिए अपने पड़ोस के किसी भी विद्यालय में कक्षा 1 से 8 तक निःशुल्क पढ़ने का अधिकार है.शैक्षणिक सत्र 2015-16 में लखनऊ के जिलाधिकारी ने 31 बच्चों के दाखिले का आदेश शहर के जाने-माने सिटी मांटेसरी स्कूल की इंदिरा नगर की शाखा में किया. उच्च न्यायालय में महीनों चली लड़ाई के बाद उन 13 बच्चों के दाखिले का आदेश हुआ जिनका घर विद्यालय से 1 किलोमीटर के दायरे में था.

वह तो सर्वोच्च न्यायालय के कारण ये बच्चे अभी सिटी मांटेसरी स्कूल में टिके हुए हैं नहीं तो इसके संस्थापक-प्रबंधक जगदीश गांधी और उनकी शिक्षाविद् पुत्री गीता गांधी किंग्डन ने इन्हें अपने यहां से निकालने की पूरी कोशिश की.


शैक्षणिक सत्र 2016-17 में सिटी मांटेसरी की विभिन्न शाखाओं में 55 बच्चों के दाखिले का आदेश हुआ लेकिन फिर जगदीश गांधी ने अड़ंगा लगाया और एक भी दाखिला नहीं लिया. सिटी मांटेसरी का देखा-देखी भाजपा नेता सुधीर हलवासिया ने अपने विद्यालय नवयुग रेडियंस में 25 बच्चों का, जगदीश गांधी की दूसरी पुत्री सुनीता गांधी ने अपने विद्यालय सिटी इण्टरनेशनल में 12 बच्चों का, डॉ. विरेन्द्र स्वरूप पब्लिक स्कूल, महानगर ने 2 बच्चों का व सेण्ट मेरी इण्टरमीडिएट कालेज की दो शाखाओं में 11 बच्चों का दाखिला नहीं लिया.

कुल मिला कर 105 बच्चों को दाखिला न देकर उपर्युक्त विद्यालयों ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम का उल्लंघन किया.

शैक्षणिक सत्र 2017-18 में भी उपर्युक्त विद्यालय दाखिला नहीं ले रहे. कानपुर शहर में डॉ. विरेन्द्र स्वरूप, चिंटल पब्लिक व स्टेपिंग स्टोन पब्लिक स्कूल जैसे विद्यालय इस वर्ष दाखिला नहीं ले रहे. इस तरह शिक्षा के अधिकार अधिनियम की धारा 12(1)(ग) के तहत दाखिला न लेने वाले विद्यालयों की संख्या बढ़ती जा रही है और इन्होंने मिलकर राष्ट्रीय कानून का मजाक बना कर रख दिया है. इन विद्यालयों की मान्यता रद्द होनी चाहिए और इनके संचालकों के खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिए.

इस मामले में सबसे बड़े दोषी जगदीश गांधी हैं जिन्होंने कानून की अवहेलना शुरू की. जगदीश गांधी के खिलाफ कोई कार्यवाही करने को तैयार नहीं क्योंकि जगदीश गांधी सभी प्रभावशाली लोगों को अपने पक्ष में करने के लिए या तो उनके बच्चों के शुल्क को माफ कर देते हैं अथवा भारी छूट देते हैं. जो जितना बड़ा या प्रभावशाली अधिकारी, नेता या न्यायाधीश होता है उसे उतनी ही ज्यादा छूट मिलती है.

पत्रकारों को भी ये दिल खोल कर लाभन्वित करते हैं. यह व्यवस्था सामान्य तौर पर आर्थिक आधार पर शुल्क में छूट देने की उल्टी व्यवस्था है. जिनके बच्चे नहीं होते उनकी पत्नियों को ये अपने यहां शिक्षिका के रूप में रख लेते हैं. नेताओं से कैसे करीबी बढ़ानी है यह भी इन्हें खूब आता है. उ.प्र. की पिछली सरकार के मुख्य मंत्री अखिलेश यादव के ये काफी करीब थे तो अब नई सरकार के केन्द्रीय शिक्षा मंत्री प्रकाश जावडेकर इनके यहां कार्यक्रम में बतौर मुख्य मंत्री शामिल हो चुके हैं.

सिटी मांटेसरी के 72 बच्चे अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर प्रधान मंत्री के साथ दिल्ली के कार्यक्रम में शामिल होंगे. जो व्यक्ति खुले आम राष्ट्रीय कानून की धज्जियां उड़ा रहा हो उस पर राजनीतिक दल और नेता इतना मेहरबान क्यों है यह रहस्य का विषय है.

जिस तरह गुजरात में कानून लाकर प्राथमिक विद्यालयों के लिए रु. 15,000 सालाना, माध्यमिक विद्यालयों के लिए रु. 25,000 व उच्च माध्यमिक विद्यालयों के लिए रु. 27,000 सालाना की सीमा तय की गई है उसी तरह उत्तर प्रदेश में भी निजी विद्यालयों द्वारा लिए जाने वाले शुल्क की सीमा तय होनी चाहिए. इस कानून को पारित कराते समय गुजरात के मुख्य मंत्री भूपेन्द्रसिंह चुडासमा ने कहा कि शिक्षा सेवा का कार्य है कोई व्यवसाय नहीं. उन्होंने यहां तक कहा कि जिन्हें पैसा कमाना है वे कोई कारखाना लगाएं अथवा व्यापार करें.

निजी विद्यालयों के मनमाने तरीके से काम करने पर अंकुश लगाने हेतु एक शिक्षा आयोग का गठन होना चाहिए. जो निजी विद्यालय सरकार के नियम कानून मानने को तैयार नहीं उनका संचालन सरकार को अपने हाथों में ले लेना चाहिए.

यह देखते हुए कि निजी विद्यालयों की मनमानी के सामने सरकार व प्रशासन लाचार है यह बेहतर होगा कि 18 अगस्त 2015 के उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल के फैसले कि सरकारी वेतन पाने वालों के बच्चे सरकारी विद्यालयों मे अनिवार्य रूप से पढ़ें को लागू किया जाए.

हमारा मानना है कि जब न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल का फैसला लागू होगा और अधिकारियों, जन प्रतिनिधियों व न्यायाधीशों के बच्चे सरकारी विद्यालयों में पढे़ंगे तब जाकर सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता सुधरेगी. जब सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता सुधरेगी तब लोग अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में भेजना शुरु करेंग,े तभी निजी विद्यालयों के आतंक से माता-पिता को छुटकारा मिलेगा.

इस देश में मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू है और सभी बच्चों को यह सुविधा सिर्फ सरकारी व्यवस्था में ही मिल सकती है. जब न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल का फैसला लागू होगा तक हम समान शिक्षा प्रणाली की ओर बढ़ेंगे यानी हरेक बच्चे के लिए एक जैसी शिक्षा व्यवस्था. समान शिक्षा प्रणाली को लागू करना 1968 के कोठारी आयोग की सिफारिश है किंतु भारत की किसी भी केन्द्र सरकार ने इसे लागू नहीं किया है.

चूंकि दो वर्ष होने को आए हैं और उत्तर प्रदेश सरकार ने इस विषय में अभी तक कुछ नहीं किया है, 19 जून, 2017 से इस मांग के समर्थन में गांधी प्रतिमा, हजरतगंज, लखनऊ पर एक अनिश्चितकालीन अनशन शुरु करने का निर्णय लिया गया है.

*लेखक मैगसेसे से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

आलेख पर सिटी मोन्टेसरी स्कूल का पक्ष
(1) श्री संदीप पाण्डेय जी ने अपने लेख में लिखा है कि शैक्षणिक सत्र 2015-16 में लखनऊ के जिलाधिकारी ने 31 बच्चों के दाखिले का आदेश शहर के जाने-माने सिटी मोन्टेसरी स्कूल की इंदिरा नगर की शाखा में किया. उच्च न्यायालय में महीनों चली लड़ाई के बाद उन 13 बच्चों के दाखिले का आदेश हुआ जिनका घर विद्यालय से 1 किलोमीटर के दायरे में था.

हमारा पक्ष
हम आपके संज्ञान में इस बात को लाना चाहते हैं कि श्री संदीप पाण्डेय जी के द्वारा कही गई बात सही नहीं है. सिटी मोन्टेसरी स्कूल की इन्दिरा नगर शाखा में प्रवेश हेतु भेजे गये 31 अपात्र बच्चों के चयन के विरूद्ध सिटी मोन्टेसरी स्कूल द्वारा माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद की लखनऊ खण्डपीठ में वाद दायर किया गया था. श्री पाण्डेय जी के कथन से यह स्वयं सिद्ध है कि माननीय न्यायालय ने सिटी मोन्टेसरी स्कूल में शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के तहत चयनित करके भेजे गये 31 में से 18 बच्चे अयोग्य पाये. इसके साथ ही अन्तरिम आदेश देते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय ने कहा कि आखिर जिला प्रशासन द्वारा इन 18 बच्चों का चयन पात्रता की शर्तों के विपरीत क्यो किया गया? यह भी विचारणीय विषय रहा है. सिटी मोन्टेसरी स्कूल ने माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के विरूद्ध माननीय उच्चतम न्यायालय में अपील की क्योंकि बाकी बचे 13 बच्चे भी शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत उ0प्र0 सरकार द्वारा जारी किये गये पात्रता की शर्तों को तब भी पूरा नहीं कर रहें थे. जिसमें सुनवाई करते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने अन्तरिम आदेश में कहा कि ‘चूंकि शैक्षिणक सत्र को शुरू हुए काफी समय बीत चुका है ऐसे में बच्चों को पढ़ाई का ध्यान में रखते हुए इन 13 बच्चों को सिटी मोन्टेसरी स्कूल में फिलहाल प्रवेश दे दिया जाये, परन्तु इसके साथ ही माननीय उच्चतम न्यायालय ने प्रदेश सरकार से इस संबंध में जवाब भी तलब किया और अपने अन्तरिम आदेश में यह भी कहा कि जाँच के बाद जरूरत पड़ने पर इन बच्चों को आस-पास के स्कूलों में स्थानान्तिरित करने का आदेश दिया जा सकता है और इसकी जाँच का निर्देश बेसिक शिक्षा अधिकारी को दिया. इस अन्तरिम आदेश का पालन करते हुए सिटी मोन्टेसरी स्कूल ने बच्चों के हित में अपने इन्दिरा नगर शाखा में 13 बच्चों को तुरन्त प्रवेश दे दिया था. यह मामला अभी भी माननीय उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है.

(2) श्री संदीप पाण्डेय जी ने लिखा है कि-इस मामले में सबसे बड़े दोषी जगदीश गांधी हैं जिन्होंने कानून की अवहेलना शुरू की. जगदीश गाँधी के खिलाफ कोई कार्यवाही करने को तैयार नहीं क्योंकि जगदीश गाँधी प्रभावशाली लोगों को अपने पक्ष में करने के लिए या तो उनके बच्चों के शुल्क को माफ कर देते हैं अथवा भारी छूट देते हैं, जो जितना बड़ा या प्रभावशाली अधिकारी, नेता या न्यायाधीश होता है उसे उतनी ही ज्यादा छूट मिलती है.

हमारा पक्ष
क्या गरीब व पात्र बच्चों का हक मारने वाले इन अपात्र एवं तथाकथित गरीब बच्चों को सिटी मोन्टेसरी स्कूल में प्रवेश न देना कानून की अवहेलना है या कानून का सम्मान? कानून की अवहेलना तो तब होती जब हम शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत निर्धारित शर्तों को पूरा करने वाले पात्र बच्चों का प्रवेश अपने विद्यालय में न लेते. हमने तो माननीय उच्चतम न्यायालय के अन्तरिम आदेश का पालन करते हुए 13 बच्चों का प्रवेश अपने विद्यालय की इंदिरा नगर शाखा में लिया, जबकि माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी यह बात स्वीकार करी थी कि वो 13 बच्चे अपात्र हो सकते हैं, और इस सम्बन्ध में प्रदेश सरकार से जवाब तलब भी किया था. ऐसे में डॉ. जगदीश गाँधी कानून को मानने वाले हैं या कानून की अवहेलना करने वाले, इसका निर्णय आप स्वयं ले सकते हैं.

(3) श्री पाण्डेय जी का यह कहना कि जगदीश गाँधी प्रभावशाली लोगों को अपने पक्ष में करने के लिए या तो उनके बच्चों के शुल्क को माफ कर देते हैं अथवा भारी छूट देते हैं. यह बात पूरी तरह से गलत एवं तथ्यों से परे है. सिटी मोन्टेसरी स्कूल में वर्तमान में 53000 बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और उनमें से लगभग 25 प्रतिशत बच्चों की फीस पूरी या 40 प्रतिशत माफ है और ये वे बच्चें हैं जिनके माता-पिता आर्थिक रूप से कमजोर हैं. अतः श्री पाण्डेय जी का यह आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद एवं असत्य है. श्री पाण्डेय जी का यह कहना भी कि पत्रकारों को भी दिल खोल कर लाभान्वित करते हैं. यह व्यवस्था सामान्य तौर पर आर्थिक आधार पर शुल्क में छूट देने की उल्टी व्यवस्था है. श्री पाण्डेय के अनुसार जिनके बच्चे नहीं होते उनकी पत्नियों को ये अपने यहां शिक्षिका के रूप में रख लेते हैं. नेताओं से कैसे करीबी बढ़ानी है यह भी इन्हें खूब आता है. उ0प्र0 की पिछली सरकार के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के ये काफी करीब थे तो अब नई सरकार के केन्द्रीय शिक्षा मंत्री प्रकाश जावड़ेकर इनके यहां कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हो चुके हैं.

हमार पक्ष
सिटी मोन्टेसरी स्कूल सिर्फ ऐसे व्यक्तियों के बच्चों की फीस में छूट प्रदान करता है जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती या जिनके साथ अचानक कोई ऐसी समस्या आ जाती हैं जिसके कारण वे अपने बच्चों की फीस जमा करने में असमर्थ होते हैं. रही बात किसी पत्रकार बंधु या अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों की पत्नियों को अपने विद्यालय में नौकरी में रखने की तो हम बड़ी ही विनम्रता पूर्वक अपनी बात रखते हुए आपको यह बताना चाहते हैं कि हमारे विद्यालय में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए एक पूरी व्यवस्था बनी हुई है जिसके तहत इस संबंध में बनी हुई कमेटी के द्वारा पहले लिखित परीक्षा आयोजित की जाती है और फिर इस लिखित परीक्षा में सफल होने वाले अभ्यर्थियों का ही साक्षात्कार लिया जाता है. इस प्रकार इन दोनों परीक्षाओं में सफल होने के उपरान्त ही शिक्षकों की नियुक्त हमारे विद्यालय में की जाती हैं.
हम आपको अवगत कराना चाहते हैं कि सिटी मोन्टेसरी स्कूल के बच्चों को समय-समय पर अपना आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए देश के अनेक गणमान्य व्यक्ति मुख्य अतिथि के रूप में आते रहें हैं.

ऋषि खन्ना
जन-सम्पर्क अधिकारी
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

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