फरिश्ते से बेहतर है…

कनक तिवारी
24 तथा 25 अगस्त 2014 को छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री के गृहनगर कवर्धा में द्वारकापीठ के शंकराचार्य के बुलावे पर कथित धर्म संसद का आयोजन हुआ. कुछ साधु, संतों तथा धार्मिक अखाड़ों के सरगनाओं ने सर्वसम्मति से ऐलान किया कि शिरडी के संत साईंबाबा को संत, गुरु या भगवान कहकर उनकी पूजा करना प्रतिबंधित हो. वह सनातन धर्म की व्यवस्थाओं के विपरीत है. स्वरूपानन्द सरस्वती अरसे से यह मुहिम छेड़े हुए हैं.

साईं बाबा के भक्तों और साईं ट्रस्ट के विरोध के मुखर होते ही शंकराचार्य ने धर्म संसद का हथियार चलाने में गुरेज़ नहीं किया. साईं भक्तों ने भी धार्मिक उन्माद पैदा करने का आरोप लगाकर शंकराचार्य के विरुद्ध मुकदमे भी दर्ज कराए. साईं बाबा टीले पर बैठते थे, शंकराचार्य सिंहासन पर बैठते हैं.


मैं एक मुख्यमंत्री और दो केन्द्रीय मंत्रियों के बहुत करीब रह चुका हूं. वे शंकराचार्य तो दूर, चंद्रास्वामी के चरणों में बिछ जाते थे. तमाशबीनों और निर्दोष कस्बा निवासियों की एकत्रित की गई भीड़ के सामने सौ पचास साधुओं के मंचीय उद्बोधन के मुकाबले साईं मंदिरों में स्वतः स्फूर्त उमड़ती श्रद्धा का सैलाब पूरी कहानी खुद ब खुद कह देता है.

शिरडी के साईं बाबा धर्म संसद के अनुसार मुसलमान थे. उन्हें हिन्दू अनुयायी भगवान का दर्ज़ा देकर पूजा करते हैं. मुसलमान उन्हें भगवान का दर्जा नहीं देते. विवेकानन्द ने कहा था कि मुसलमानों ने ही हिन्दुओं को भाईचारा सिखाया है. जिस दिन इस्लामी देह में वेदांत का उदय होगा-वह दिन धर्म का होगा. क्या यह बात साईं की कथा पर लागू नहीं होती?

साईं बाबा के भक्त गैर हिन्दू भी हैं. वे लगभग सर्वसम्मति से उन्हें भगवान मानने लग गए हैं. यह शंकराचार्य को नागवार गुजरता रहा है. वे नहीं चाहते कि कोई मुसलमान हिन्दुओं द्वारा भगवान के रूप में पूजा जाए जिससे हिन्दू धर्म की मान्यताएं खंडित, दूषित हों. इस्लाम में तो पूजा करने का रिवाज़ ही नहीं है. साईं भक्त शंकराचार्य की अनसुनी करते रहे हैं. धर्म संसद बुलाने का मध्यकालीन शोशा जिस शहर में छोड़ा गया है, उसका नाम छत्तीसगढ़ सरकार ने पहले ही कबीरनगर कर दिया है. जुलाहे कवि कबीर की वैश्विक अपील के नगर में धर्म संसद के हिन्दू हुक्म का क्या अर्थ है?

शंकराचार्य प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी सलाह दे रहे हैं कि वे शिरडी नहीं जाएं क्योंकि वे साईं की नहीं बाबा विश्वनाथ की कृपा से चुनाव जीते हैं. प्रधानमंत्री के एक नागरिक के रूप में मौलिक अधिकारों पर धार्मिक प्रतिबंध या समझाइश के साथ यह कैसे माना जाए कि ईश्वर या संतों के कारण चुनाव जीता गया. कारपोरेट घराने नाराज नहीं हो जाएंगे?

शिरडी के साईं बाबा को कुछ लोग देवता मानने पर आमादा हैं तो ऐतराज़ क्यों होना चाहिए. भारत अफवाहों, किंवदंतियों, रूढ़ियों, विश्वासों, आस्थाओं, कहानियों वगैरह का देश है. कोलकाता में फिल्म कलाकार अमिताभ बच्चन और क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को भगवान कहते हुए उनकी मूर्तियां भी स्थापित की गई हैं. हिन्दू स्त्रियों से पति को परमेश्वर साधु संत ही कहलाते हैं. गुरु को ईश्वर से बड़ा दर्ज़ा दिया गया है. माता और जन्मभूमि को स्वर्ग से भी बड़ा और महान बताया गया है.

श्री रामकृष्णदेव को भी तो मन्दिर में स्थापित कर भगवान का दर्जा दिया जाता है. उन्होंने तो इस्लाम, ईसाई, बौद्ध आदि कई धर्मों में खुद को एक के बाद एक अंतरित कर लिया था. लाखों हिन्दू खुदा की इबादत करते हैं और लाखों मुसलमान राम राम कहते हैं. कबीर, रहीम, रसखान, जायसी जैसे मुसलमानों से ज्यादा इन अवतारों का गायन किसने किया है? स्कूलों, कॉलेजों में गीता, रामायण, महाभारत पढ़ाई जाए का धर्म संसद का सुझाव सिक्ख, बौद्ध, जैन, इस्लाम, ईसाई आदि धर्मों की पवित्र पुस्तकों से परहेज़ क्यों करता है?

शंकराचार्यत्व को लेकर दावेदार सिविल न्यायालयों से डिक्री लेकर सत्ता पर भी काबिज़ हुए हैं. धर्माचार्यों की भूमिका दहेज़ प्रथा, बलात्कार, उत्तराधिकार वगैरह को लेकर महिलाओं के पक्ष में मुखर नहीं होती. खाप पंचायतों के खिलाफ नहीं बोलते. समान नागरिक संहिता को लेकर मुस्लिम महिलाओं का समर्थन नहीं करते. ईसाई स्त्रियों के न्यून पारिवारिक अधिकारों को लेकर मुंह नहीं खोलते. वर्णाश्रम और जाति प्रथा को महिमामंडित करते हैं. शारीरिक परिश्रम नहीं करते. उनकी देहों से पसीना और आंख से आंसू अकिंचनों के लिए नहीं निकलता. विवेकानन्द, गांधी, दयानन्द, राममोहन रॉय जैसा सामाजिक सुधार नहीं करते.
नागरिकों के सिर को अपने चरणों में झुकाने के करतब को धर्म समझते हैं. साईं बाबा ने तो यह सब नहीं किया था. उन्होंने कब कहा था कि उन्हें भगवान बनाया जाए. संविधान के लागू होने के बाद शंकराचार्य नामक पारम्परिक संस्था की हिन्दू धर्म में कोई वैधानिक स्थिति है? शंकराचार्य भी दोनों बड़ी पार्टियों के राजनीतिक उम्मीदवारों के स्थायी और कारगर संरक्षक होते हैं. कुलीन वर्गों के पांच सितारा घरों में आतिथ्य स्वीकारते हैं, झोपड़ियों में नहीं. उनके नाम का इस्तेमाल करते लूट खसोट वाली निजी शिक्षण, चिकित्सा तथा धर्मादा संस्थाएं बनी चली जा रही हैं.

धर्म गहरे आत्मविश्वास की निजी अनुभूति है. उसका रहस्यात्मक अहसास किसी दूसरे से नियंत्रित नहीं होता. हिन्दू धार्मिक विश्वास ने शिलाखंडों, पशुओं, पक्षियों, सांपों, नदियों, पहाड़ों आदि में भी ईश्वर का उद्घाटन किया है. साईं बाबा तो फिर भी मनुष्य थे. कई मजहबों में मांस मदिरा का धार्मिक प्रयोजनों में सेवन होता है. श्मशान की भस्मि से अभिषेक होता है. पशुओं की बलि को शास्त्रसम्मत बताया जाता है. दलितों और आदिवासियों को दोयम दर्ज़े का नागरिक बनाते हुए ब्राह्मणीय व्यवस्था में उन्हें सर्वोच्च पुरोहित तो क्या बराबरी तक का मानने की परंपराएं अब तक नहीं उग रही हैं. कई मंदिरों में दलित, स्त्रियां और बच्चे प्रवेश नहीं कर सकते. हिन्दू पुरुष भी उत्तरीय पहनकर नहीं जा सकते. उन्हें धोती बांधनी पड़ती है.

उत्तर भारत के कई धार्मिक स्थलों में साधु संत व्यभिचार में पकड़े जाते रहे हैं. एक राजनीतिक संत छत्तीसगढ़ आकर सोनिया गांधी के खिलाफ अश्लील भाषा के आरोपी बने अब भी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं. कई तो फिल्मी तारिकाओं के साथ पकड़े गए. कवर्धा आए साधु संतों को राजकीय अतिथि बनाने का क्या तुक है? धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के बावजूद सरकार ने यह क्या किया? सत्तापरक संत साधु क्यों हैं?

साईं बाबा को जनविश्वास ने राष्ट्र संत कहा है. साईं बाबा उस अर्थ में भगवान नहीं हैं कि उन्होंने सृष्टि का उद्भव नहीं किया. उन्होंने करोड़ों व्यक्तियों को अच्छी राह पर चलने की प्रेरणा दी. ईश्वर ने भी बार बार धरती पर आकर इससे ज्यादा और किया ही क्या है. ‘फरिश्ते से बेहतर है इन्सान बनना, मगर इसमें पड़ती है मुश्किल जियादा.’

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