सलमान पर अंतिम फैसला कब?

मुंबई | मनोरंजन डेस्क: बंबई उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को फिल्म अभिनेता सलमान खान की पांच साल कारावास की सजा निलंबित कर दी. इसके साथ ही उन्हें नियमित जमानत मिलने का रास्ता साफ हो गया है. सलमान खान को मिली अंतरिम जमानत ने उन लोगों को सोचने पर विवश कर दिया जो सजा के ऐलान के बाद सीधे अदालत से न्यायिक हिरासत में यानी सलाखों के पीछे भेज दिए जाते हैं.

यहां यह प्रश्न स्वत: उठ खड़ा हुआ है कि बिना फास्ट ट्रैक अदालत के त्वरित न्याय सबके लिए या सिर्फ कुछ के लिए?


साफ है, यदि सलमान के मामले में पहले से जमानत की तैयारियां नहीं हुई होती तो सजा का ऐलान होने के 3 घंटे के अंदर मुंबई सत्र अदालत की सजा पर बंबई उच्च न्यायालय अंतरिम जमानत नहीं देता. इसका मतलब यह हुआ कि न्याय पाने के लिए भी अग्रिम तैयारियां जरूरी है यानी तेज तैयारी, तेज नतीजा.

लोगों के जेहन में बस यही कौंध रहा है कि ऐसा भी होता है? निश्चित रूप से अंतरिम जमानत तकनीकी आधारों पर मिली है, जिसमें सलमान की ओर से उनके वकीलों ने जो तर्क प्रस्तुत किए, उसमें मुख्य आधार यह था कि उन्हें दोष सिद्धि के आदेश के सिर्फ दो पन्ने उपलब्ध कराए गए हैं. आदेश की पूरी प्रति नहीं.

इस पर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अभय थिप्से ने कहा, “यदि प्रति तैयार नहीं थी तो आदेश नहीं सुनाया जाना था, न्याय हित में यही होगा कि आदेश की प्रति सलमान को उपलब्ध कराई जाने तक उन्हें न्यायिक संरक्षण मिले. इस केस में जल्दबाजी यह है कि उसे हिरासत में लिए जाने की संभावना है.”

अब आगे ऐसी ही परिस्थितियों में दूसरे मामलों में यह नजीर कितनी उपयोगी होगी, यह तो वक्त ही बताएगा.

यकीनन, कानूनी तौर पर सलमान की ओर से उसी दिन उच्च न्यायालय में उठाया गया यह सवाल तकनीकी रूप से पूरी तरह से उचित था. इससे उन लाखों लोगों को अचरज जरूर हुआ होगा जो जमानत के लिए हर रोज अदालतों का चक्कर लगाते हैं और सुनवाई तक नहीं होती.

यहां यह न कहना बेमानी होगा कि न्याय की आस के लिए विश्वास के साथ और बहुत कुछ भी जरूरी है, जो सबके पास नहीं होता. सलमान इस मामले में जरूर खुशनसीब हैं. बस इसी वजह से अब यह चर्चा भारत में हर ओर है कि सहज और त्वरित न्याय पाना आम के लिए आसान या केवल खास के लिए.

कानून की मंशा पर सवाल उठाना गलत होगा. हां, कानून की पेचीदगी को समझना जरूरी होगा. सलमान के मामले में यही हुआ और सलमान की पैरवी के लिए खड़े लोगों की काबिलियत ही है जो उसके खुशनसीब बनने की वजह बनी.

न्याय सबके लिए बराबर होता है, न्याय प्रणाली केवल दलीलों, गवाहों और सबूतों के आधार पर ही काम करती है. निश्चित रूप से हर फरयादी या आरोपी अपनी ओर से ऐसा ही करता होगा. लेकिन सफलता और असफलता उसकी तैयारी तर्को, आधारों और कानूनी जानकारी पर निर्भर है.

बात न्याय प्रणाली की हो रही है तो यह भी सबको पता है कि देशभर की अदालतों में लाखों मामले जजों की कमी के चलते पेंडिंग हैं. सर्वोच्च न्यायल में लगभग 60 हजार, उच्च न्यायालयों में लगभग 44 लाख और निचली अदालतों में लगभग 2 करोड़ 75 लाख मामले लंबित हैं.

ऐसे में हर किसी के लिए त्वरित न्याय की बात सोचना कितना वाजिब है. जमानत के लिए तक हर रोज लाखों लोग न्याय की देहरी पर दस्तक देते हैं और बिना सुनवाई बैरंग लौट जाते हैं.

एक कड़वा सच भी यह है कि ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड’ अर्थात विलंबित न्याय, न्याय का हनन है. इसे दूर करना ही होगा. इसके लिए कई बार कई सुझाव भी आए जिन पर कुछ भी काम नहीं हुआ.

न्याय में देरी से भटकते-भटकते न जाने कितने लोग मानसिक संतुलन खो बैठे, कितने दुनिया से रुखसत हो गए, कितने जवान से बूढ़े गए. लेकिन न्याय नहीं मिला. इस बारे में मंथन होता है कमेटियां बनती हैं पर नतीजा कुछ भी नहीं निकलता.

बात फिर वही कि सलमान का क्या होगा? अंतरिम जमानत के बाद वह नियमित जमानत और सत्र अदालत में दोष सिद्ध आरोपों को चुनौती देने के लिए ऊपरी अदालत जाएंगे. ऊपरी अदालत के फैसले के लिए फिर कितना इंतजार करना होगा, कोई नहीं कह सकता.

सवाल फिर वही और जस का तस है कि अंतिम फैसले का इंतजार आखिर कब तक?

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