गरीब से ही पूछिये परिभाषा

जाने माने अर्थशास्त्री समीर घोष का कहना है कि गरीबी की परिभाषा गरीबों को तय करने दें. विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र और योजना आयोग से जुड़े रहे जाने माने अर्थशास्त्री समीर घोष ने बिहार, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे कई राज्यों की नीतियां बनाने में योगदान दिया है. सामाजिक समावेशन को लेकर उनका नजरिया स्पष्ट है कि जब तक वंचितों के बीच जाकर काम नहीं किया जाएगा, उनकी समस्याओं को नहीं समझा जा सकता. वह मानते हैं कि वंचितों के बीच भी कई तरह के वर्ग हैं और उनमें प्रतिस्पर्धा है, जिसमें सर्वाधिक वंचित पीछे रह जाते हैं. उनसे इन्हीं मुद्दों पर सुदीप ठाकुर ने बात कीः

सामाजिक समावेश की काफी बातें होती हैं, पर जमीनी स्तर पर अपेक्षित नतीजे नहीं दिखते. इसके आर्थिक प्रभाव के बारे में आपकी क्या राय है?


पहली बात यह कि हर चीज अर्थव्यवस्था के पलड़े पर रखकर नहीं देखी जा सकती. वंचित तबका अर्थव्यवस्था में योगदान करने में सक्षम नहीं होता, लिहाजा उन्हें बोझ माना जाता है. दूसरी बात अधिकार से संबंधित है. जब हम कोई नीति बनाते हैं, तो कहते हैं कि पहली प्राथमिकता सर्वाधिक वंचित लोगों को ध्यान में रखने की होगी. पर जब कोई परियोजना बनती है, तो हम देखते हैं कि इसी तबके की उन तक सबसे कम पहुंच है. सामाजिक संरचना में पावर गेम अहम भूमिका निभाता है. इसमें सर्वाधिक वंचित सबसे पीछे रह जाते हैं. मध्य प्रदेश के गुना जिले के आदिवासी ब्लॉक ममोरी में मैंने पहली बार देखा कि आदिवासियों के बीच भी किस तरह का वर्ग विभाजन है. वहां मेरी मुलाकात कालबेलिया जनजाति के लोगों से हुई. उन्होंने बताया कि उनके गांव से सिर्फ आधा किमी दूर स्थित स्कूल में उनके बच्चों को कोई दाखिला देने को तैयार नहीं था, क्योंकि दूसरे आदिवासी इन्हें खुद से अलग मानते हैं.

जो वर्ग सामाजिक रूप से पिछड़े हैं, अक्सर वही आर्थिक रूप से भी पिछड़े हैं. यह सिर्फ नीयत का मामला है या नीति का भी?

यह नीयत, नजरिया और अमल में लाने की मशीनरी, तीनों का मामला है. हम अपने कंफर्ट जोन से बाहर नहीं निकलना चाहते. सामाजिक क्रम में ऊपर के लोग निचले तबके को वंचित रखे हुए हैं. सरकार के ग्राम सेवक को हर चीज की जानकारी होती है, पर वह भी समुदाय की आड़ लेकर अपना काम नहीं करता. इस तरह गरीब नीति के नजरिये से भी पीछे रह जाते हैं. इसलिए सामाजिक समावेशन की ओर ध्यान देने की जरूरत है.

गरीबी को लेकर हम देखते हैं कि तमाम योजनाओं के बावजूद कोई खास तब्दीली नहीं दिखती. जो पिछड़े हैं, वे वैसे ही नजर आते हैं. क्या सामाजिक समावेशन में संबंधित तबके के राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका होती है?

समाज की बुनियाद को कोई चीज बदल सकती है, तो वह पॉलिटिकल सोशियोलॉजी ही है. हम और आप बाहर के लोग हो जाते हैं, कार्यक्रम बाहरी होते हैं. अंदरूनी जागरूकता की जरूरत है. जागरूकता कहने से मेरा आशय यह नहीं है कि आप छह पोस्टर और चार माइक लेकर वंचित तबके के बीच चले जाएं. किसी न किसी को तो उस समाज के भीतर से प्रेरित करना होगा.

गरीबी को लेकर कई परिभाषाएं गढ़ी जाती हैं. इसे लेकर किस तरह का मजाक बना है, वह हम देख चुके हैं. गरीबी की परिभाषा क्या होनी चाहिए?

जब तक गरीबी को महसूस करते हुए गरीबों से नहीं पूछेंगे, तब तक आप गरीबी को ठीक से परिभाषित नहीं कर सकते. अर्थशास्त्री या समाजशास्त्री बाहर से बैठकर गरीबी की सही परिभाषा नहीं बता सकते. सिर्फ भोजन का अभाव ही गरीबी नहीं होती. गरीबी बहुकोणीय होती है, जिसमें दैनिक खर्च के अलावा बीमारियों और पढ़ाई पर होने वाला खर्च भी शामिल है.

हम एक ओर तो दो अंकों में विकास दर की बात करते हैं, दूसरी ओर आज भी एक तिहाई से अधिक लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं. यदि हम अगले पच्चीस वर्ष की बात करें, तो आपको स्थितियां कुछ बदलती हुई दिखती हैं क्या?

मैंने इस नजरिये से अध्ययन नहीं किया है. पर यह कह सकता हूं कि एक ओर आप भारत को कृषि प्रधान देश मानते हैं, पर कृषि को अलाभकारी कहते हैं. सेवा क्षेत्र को अधिक महत्व दिया जा रहा है, पर विनिर्माण क्षेत्र में प्रगति नहीं होगी, तो सेवा क्षेत्र कमजोर हो जाएगा. इन क्षेत्रों के विकास के लिए जरूरी है कि अधिक से अधिक लोग उपभोक्ता बनें और इसके लिए जरूरी है कि अधिक से अधिक लोग गरीबी से ऊपर आएं. मुझे नहीं लगता कि अगले दस वर्ष में गरीबी घटकर दस फीसदी हो जाएगी, पर इसमें चार-पांच फीसदी की कमी जरूर आ सकती है.

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