ऐ देश ! ठीक से लुटते क्यों नहीं?

कनक तिवारी | फेसबुक:हिंदुस्तान स्थायी महान देश कहलाता है. यहां वे जरूर पैदा होते हैं जिनके हाथ घुटने तक लंबे होते हैं. फिर शाबासी के लिए अपनी पीठ खुद ठोंकते हैं. सुनते हैं महात्मा गांधी आजानबाहु थे. उन्होंने अपने हाथों अपनी पीठ ठोंकने के बदले देश को अपनी मोहब्बत के आगोश में ले लिया. गुजरात के पोरबंदर में जन्मे गांधी ने नया पाठ पढ़ाया था. देश के हर व्यक्ति की जरूरत के लिए कुदरत ने बहुत कुछ दिया है. किसी एक व्यक्ति की लालच के लिए लेकिन नहीं. गांधी को नहीं मालूम था कि उनके ही प्रदेश के अर्थशास्त्री उनके कहे की उलटबासी कर देंगे. उनके बुजुर्ग वाक्य का संशोधन हुआ. अमीरजादों के जमावड़े ने तय किया इस देश में उन सबकी लालच के लिए बहुत कुछ है लेकिन एक भी व्यक्ति की जरूरत के लिए भी कुछ नहीं छोड़ा जाए.

भारतीयों को गुमान बल्कि मुगालता है वे दुनिया में सबसे महान हैं. विद्यार्थियों को रटाया जाता है भारत इकलौता आध्यात्मिक देश है. उसे भौतिक लालच से कुछ नहीं लेना देना. उनके जेहन में यह बात बिठाई जाती है जिससे वयस्क नागरिक बनकर लगातार अपने गरीब रहने का ऐतिहासिक अधिकार याद रखें. उनमें दौलत कमाने की इच्छा के भ्रूण की स्कूल में ही पूंजीवादी पाठ्यक्रम हत्या कर देता है. देश हाथी या अजगर की तरह विशाल है. लालचखोर लुटेरे चीटियों की तरह सरकारी भ्रष्टाचार के बिल में घुस जाते हैं. जानते हैं चीटी हाथी की सूंड़ में घुसकर काटे तो हाथी की मौत होती है. स्टेट बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, स्टाॅक एक्सचेंज, टू जी स्पेक्ट्रम, काॅमनवेल्थ घोटाला, सृजन घोटाला, विदेशी काला धन, कोयला आवंटन घोटाला देश के घाव चीटियों की ही हरकतों के ठनगन हैं. चीटियों ने हाथी की मौत सुनिश्चित समझ हमला जारी रखा है.


आजादी के दौर में इक शायर इकबाल भी हुए. जोश में लिख गए, ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी. सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा.‘ शायर, कवि, दार्शनिक, सूफी, संत, विचारक अब पूंजीवादी हाथीखोर चीटियों को उपदेश देने के काम आ रहे हैं. दौलतमंद चीटियों ने नानक, कबीर, दादू, मेहर बाबा, साईं बाबा, महावीर और बुद्ध वगैरह फक्कड़ तबीयत के रूहानी लोगों के नहीं रहने के कारण अपनी तिकड़म फैक्टरी में ढोंगी साधु संतों और बाबाओं का उत्पादन किया. नामकरण आसाराम बापू, गुरमीत राम रहीम, रामपाल वगैरह हुआ. श्रीश्री रविशंकर, बाबा रामदेव, मुरारी बापू नामधारे उपदेशक भी सत्तापरक षड़यंत्रकारियों के लिए सुरक्षा का छाता मौके पर तान देते हैं. देश के इतिहास, संस्कार, धर्म और परंपराओं के बावजूद कुछ नियामक सिद्धांत यूरोपीय आधुनिकता की सीख पर रचे गए थे. नए नीतिशास्त्र ग्रंथ को संविधान कहा गया. लिखने वाले तीन सौ से अधिक देशभक्तों के मन में खोट नहीं थी. उन्होंने नया प्रयोग किया था.

संविधान की हिदायतों में बिल्कुल तय है. देश की दौलत सभी नागरिकों की जागीर है. सबके अधिकार बराबर हैं. संविधान का दोहन इस तरह हो जिससे सार्वजनिक बटवारा हो सके. देश, आध्यात्म की तोतारटंत वाले विद्यार्थी, गांधी और इकबाल नहीं जानते थे कि सत्ता नाम की संस्था में ज़हर भी होता है. उसकी शीशी पर हालांकि दवा लिखा होता है. आईन के आर्किटेक्ट जवाहरलाल नेहरू और डा. अम्बेडकर आकाश मार्ग से आए आलिम फाजिल नजर आते थे. उनके साथ अपना घर फूंकते मादरे वतन में राख की तरह मिल जाने को आतुर जनसेवकों का बड़ा कुनबा था. राजेन्द्र प्रसाद, मौलाना आज़ाद, भगतसिंह अरविंद घोष, खान अब्दुल गफ्फार खान, मदनमोहन मालवीय, राममनोहर लोहिया जैसे हजारों थे. उनके कारण सभ्य और संवेदनशील मनुष्यता का संसार में सबसे बड़ा मानवघर भारत मशहूर था. वे सिखाते अतीत और इतिहास उनके लिए होता है जिन्हें पुरानी लीक पर चलते कुछ नया करने की इच्छा होती है.

इसके बरक्स यूरोप के अन्वेषकों ने सिखाया. सब कुछ पुराना नष्ट करो. नये विचारों से भारत में नया यूरोप, अमेरिका बनाओ. उनसे प्रभावित भारतीयों ने मां बाप को ओल्डहोम में डाला. गांव में खेती करना छोड़ा. शहर के मजदूर बने. ज्यादा पढ़े लिखे फौरन से पेश्तर विदेश भागे. वहां दोयम दर्जे के नागरिक बन गुलामी करते रहे. भारतीय भाषाओं और बोलियों को दकियानूस कहते उन पर थूकने लगे. अंगरेजी पोषाक में बंध गए. यूरो अमेरिकी नग्न संस्कारों में झूमे. इतालवी शराब पी. सस्ता चीनी सामान खरीदा. हथियारों का जखीरा बनाया. पड़ोसी को दुश्मन समझा. देश की अपढ़ जनता को अंगरेजी नारों से भौंचक किया. ‘स्टार्ट अप‘, ‘बुलेट ट्रेन‘, ‘स्मार्ट सिटी‘, मेक इन इंडिया जैसे नये वेद मंत्र गूंजने लगे. विधर्मियों को मारा. जन्नत में हूरें ढूंढ़ने लगे. गाय का गोश्त बेचने की फैक्टरी लगाई. किसी को गाय का कातिल कहते उनका बीफ बना दिया. दोमुही बातें कीं. आधे लोगों ने कहा आग लगाओ. आधे ने कहा फायर बिग्रेड बुलाओ.

बरबादी के सफर का नतीजा सिफर नहीं है. देश की बुनियाद की चूलें हिल रही हैं. सारा कोयला खुद गया है. लौहअयस्क देश पार जा रहा है. जंगल कराह रहे हैं. नदियों का पानी सुखाकर कारखाने लगा रहे हैं. आध्यात्मिक लुटेरे बच्चियों की अस्मत लूटते जेल में बंद हैं. आर्थिक लुटेरों की पौ बारह है. जनता की गाढ़े की कमाई का रुपया बैंकों में डाका डालकर लुटेरों की तिजोरी में है. सरकारें उन्हें दामाद और समधी बनाए हुए हैं. एक एक गिरहकट की लालच के लिए नगरों और गांवों को नेस्तनाबूद किया जा रहा है. लोग पस्तहिम्मत हैं. बदबूदार विचारों की अफीम चटाई जा रही है. लोग पीनक में बड़बड़ाते हैं. भारत एक महान देश है. हम विश्व गुरु बनने वाले हैं. दुनिया में हमारी आर्थिक रफ्तार सबसे तेज है. इस्लाम खतरे में है.

अर्द्धशिक्षित नेता और किताबी विचारक अवाम को मायूसी के दलदल में धकेल चुके हैं. उनमें विरोध करने की आग बुझाने मजहबी विवादों के नाम पर हिंसा के इंजेक्शन लगाकर बुजदिली बढ़ाई जा रही है. भविष्य पतन के रास्ते पर है. देश का कारवां इतिहास में मिथक को ढूंढने अभिशप्त है. वह आईना देखकर चीखता रहता है. विकास हो रहा है. गफलत को अध्यात्म समझने का खतरनाक दौर एक सौ तीस करोड़ मनुष्यों को कुछ सैकड़ा नवाबों की चाकरी करने जहरखुरानी का शिकार बना दिया जा रहा है.

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