जायज हक या नाजायज काबू?

सुनील कुमार
इन दिनों ऐसे तमाम लोगों की जिंदगी बिना इंटरनेट नहीं गुजरती जिनके पास किसी तरह की डिजिटल तरकीब है, और जो मुफ्त या तकरीबन मुफ्त मिलने वाले इंटरनेट के ग्राहक हैं.

शहरी आबादी में तो अब मजदूर तक इंटरनेट का इस्तेमाल करते दिखते हैं, और ऐसे में यह सोचना भी नामुमकिन है कि इंटरनेट पर लोगों की दौड़ अगर बंध जाएगी, तो उनकी जिंदगी ऐसी ही चलती रहेगी.


खासकर उन लोगों की जिंदगी जो अपनी पढ़ाई, अपने रिसर्च, अपने कामकाज, इनके लिए इंटरनेट पर जरूरत की तलाश करते हैं.

इस बात पर चर्चा की जरूरत इसलिए आ गई है कि पिछले हफ्ते यूरोपीय संसद ने एक ऐसे नए डिजिटल कॉपीराइट कानून पर चर्चा की है जिसके आने से गूगल, फेसबुक, या यूट्यूब जैसे तमाम प्लेटफॉर्म्स को अपनी कमाई उन तमाम लोगों के साथ बांटनी होगी जहां की खबरें उनके प्लेटफॉर्म पर दिखती हैं, या जिनका लिखा हुआ, गढ़ा हुआ, गाया या बजाया हुआ इन पर सर्च करने पर दिखता है.

यह नया कानून ऐसे तमाम सर्च इंजन और प्लेटफॉर्म को इस बात के लिए जवाबदेह बनाने जा रहा है कि उन पर ढूंढी हुई जो चीजें भी किसी की कॉपीराइट हैं, उन लोगों को भुगतान दिये बिना इनको वहां देखा नहीं जा सकेगा.

इस प्रस्तावित कानून के आलोचकों का यह कहना है कि कानून में सर्च इंजनों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी इतनी बढ़ा दी गई है कि इससे इंटरनेट की एक किस्म से मौत भी हो सकती है. और हो सकता है कि ऐसे कॉपीराइट-फिल्टरों की वजह से आज के आजाद इंटरनेट पर एक सेंसरशिप लागू हो जाएगी.

अब इसके बारे में जरा ध्यान से सोचें, तो आज की इंटरनेट की हालत यह है कि वह एक तरफ तो सड़क किनारे रखे पीकदान जैसा हो गया है, जिसमें आते-जाते कोई भी थूककर चले जा सकते हैं, बिना किसी परेशानी के.

दूसरी तरफ यह इंटरनेट गांव का एक ऐसा तालाब भी हो गया है जिसमें लोग अपना पखाना धोने से लेकर अपने जानवरों को नहलाने तक, और अपने ईश्वरों को विसर्जित करने तक का सारा काम बिना किसी जवाबदेही के कर सकते हैं, और उसके पानी का मनचाहा इस्तेमाल कर सकते हैं, बिना किसी भुगतान के.

किसी सार्वजनिक संपत्ति का कैसा इस्तेमाल हो सकता है, यह अगर देखना हो तो इंटरनेट को देखना ठीक होगा जिसे कम लोग नेक काम के लिए या अपने पेशे के कामकाज के लिए, पढ़ाई और शोध के लिए इस्तेमाल करते हैं, और अधिक लोग उसे फिजूल की बातों के लिए इस्तेमाल करते हैं.

लेकिन यूरोपीय संसद का यह नया प्रस्तावित कानून इन दो किस्म के इस्तेमाल की वजह से नहीं बन रहा है, यह बन रहा है कि जिन लोगों की मेहनत से कोई खबर बनती है, तस्वीर या कार्टून बनते हैं, उपन्यास या कहानी लिखी जाती है, कोई संगीत तैयार होता है, उसका इस्तेमाल होने पर इंटरनेट कंपनियों के मुनाफे में से उनको भी हिस्सा मिले.


आज लोगों को नेट पर सर्च करना तो मुफ्त हासिल है, लेकिन जिन वेबसाइटों के मार्फत वे सर्च करते हैं, उन वेबसाइटों को तो बाजार से, इश्तहार से, ग्राहकों का डेटा बेचकर कमाई होती है. लेकिन इस कमाई का कोई हिस्सा उन लोगों तक नहीं जाता जिन लोगों की मेहनत से वह सामग्री तैयार होती है जिसे ढूंढकर लोग अपनी जरूरत पूरी करते हैं.

इस नजरिए से अगर देखें तो यह नया कानून सेंसरशिप तो नहीं सुझाता, यह महज मुफ्त की कमाई करने वाली इंटरनेट कंपनियों पर इतनी जिम्मेदारी ही लादता है कि ये कंपनियां लोगों के कॉपीराइट वाले कंटेंट के एवज में उनके साथ अपनी कमाई का एक हिस्सा बांटे.

अब चूंकि इंटरनेट और सोशल मीडिया, और तरह-तरह की वेबसाइटों से दुनिया का लोकतंत्र इस तरह जुड़ गया है, कि आज अगर कोई लोगों से यह उम्मीद करे कि वे किसी खबर का लिंक ट्विटर या फेसबुक पर पोस्ट करते हुए, या कहीं और वह लिंक आगे बढ़ाते हुए उसके लिए भुगतान करें, तो इसका एक मतलब यह निकलेगा कि जो लोग ऐसा भुगतान करने की ताकत रखते हैं, महज वही लोग अपनी पसंद के विचार को, अपनी पसंद की सामग्री को आगे बढ़ा सकेंगे, और इससे दुनिया में विचारों पर, सोच पर, एक किस्म का परोक्ष नियंत्रण लद जाएगा क्योंकि आज समाचार-विचार और सामग्री का जो उन्मुक्त आदान-प्रदान मुफ्त में चल रहा है, वह इस कानून के बाद हो सकता है कि भुगतान-आधारित हो जाए.

इसे कुछ और खुलासे से समझें, तो हो सकता है कि गरीबों के बुनियादी मुद्दे आगे बढऩा घट जाए, और रईसों के गैरजरूरी मुद्दे आगे बढ़ते चले जाएं. इससे दुनिया में असल लोकतांत्रिक तस्वीर से परे एक ऐसी तस्वीर बन सकती है जिसके लिए रंग और ब्रश खरीदना अधिक संपन्न के लिए अधिक मुमकिन हो पाएगा.

यह तो एक आशंका की एक नाटकीय कल्पना है, लेकिन यह तय है कि जब टेक्नालॉजी और बाजार मिलकर कुछ करते हैं, तो लोकतंत्र उसका एक बड़ा शिकार हो जाता है, बड़ी रफ्तार से. पहली नजर में यूरोप का यह प्रस्तावित कानून इस मायने में ठीक लगता है कि इससे सामग्री तैयार करने वालों को मेहनताना और मुआवजा मिल सकेगा, लेकिन इसके कुछ दूसरे किस्म के असर भी होंगे, जिनका पूरा अंदाज अभी आसान और मुमकिन नहीं है.

आज इसकी चर्चा जरूरी इसलिए है कि जिंदगी को प्रभावित करने वाली जो बातें कल होने जा रही हैं, उनके बारे में अगर आज सोचा नहीं जाएगा, तो सरकार और कारोबार जिंदगी को इतना बदल सकते हैं कि उसे पहचाना न जा सके.
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शाम के अखबार छत्तीसगढ़ के संपादक हैं.

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