बस्तर में सींगबाजा

रायपुर | एजेंसी: छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में इन दिनों ओडिशा का सींगबाजा धूम मचा रहा है. इस बाजे को बजाने कि लिए वादक का शरीर जिमनास्ट की तरह लचीला होना जरूरी है. लचीले बदन के सहारे सींगबाजा बजाने की परंपरा को जीवित रखने वालों को पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में भी सम्मान मिल रहा है. उन्हें महोत्सवों में जरूर बुलाया जाता है. ओडिशा के मलकानगिरी जिले के कोडिंगा में सींगबाजा बजाने वालों की बस्ती है, वहीं से आकर ये कलाकार दंतेवाड़ा के फागुन मंडई से लेकर विश्व विख्यात बस्तर दशहरा तक में अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं.

10 सदस्यीय वादक दल में सबसे आगे दो वादक नगाड़ा बजाते चलते हैं. इस जोड़ी को सिंगलिया कहा जाता है. नगाड़े में सींग के आकार के लोहे की दो-दो छड़ें लगी रहती हैं. इसी के चलते इस वाद्ययंत्र का नाम सींगबाजा पड़ गया. सिंगलिया ही वादक दल के मुख्य आकर्षण होते हैं. आकर्षक भाव-भंगिमा और कुशल नट के करतब दिखाते सिंगलिया जमीन पर रखे नोट को भी उसी अंदाज में झुककर मुंह से उठा लेते हैं.


जिमनास्ट की तरह लचीले बदन से करतब करते हुए वे लोगों को मुग्ध कर देते हैं. एक-दूसरे के शरीर से गुंथकर जमीन पर रोल करना हो, या फिर पिरामिड बनाना, सभी में कलात्मकता दिखती है. शहनाई की तरह का वाद्य मोहरी, ढोल, तोसा व तुडूम की जोड़ियों से जो संगत मिलती है, उस पर सभी लोग थिरकने को मजबूर हो जाते हैं.

बारसूर महोत्सव में पहुंचे सींगबाजा दल के मोहरिया यानी मोहरी वादक धन साय व ढोलिया यानी ढोल वादक प्रह्लाद की मानें तो अधिकांश सदस्य हर फन मौला यानी एक से ज्यादा वाद्ययंत्र पर हाथ आजमाने में माहिर होते हैं, ताकि किसी एक की गैर मौजूदगी या बीमार पड़ने पर दल का काम प्रभावित न हो सके.

हां, इनके दल में कोई भी महिला सदस्य नहीं होती है. महिलाओं को दल का सदस्य क्यों नहीं बनाया जाता है, इसकी वजह कोई नहीं बता सका. सींगबाजा कलाकारों को अपने हुनर से ही रोजी का जुगाड़ हो जाता है. कार्यक्रम के हिसाब से रोजाना 10 हजार रुपये तक का सौदा होता है. बारिश के सीजन में खेती-बाड़ी या दीगर मजदूरी के काम करते हैं. छत्तीसगढ़ के बस्तर में ये लोगों का खूब मनोरंजन कर रहे हैं.

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