सोन चिड़िया क्या बता पायेगी मान सिंह की कहानी

मुंबई | संवाददाता : फूलन देवी और पान सिंह तोमर के बाद अब डाकू मान सिंह का जादू सिनेमा के परदे पर चलेगा. 1 मार्च को रिलिज हो रही ‘सोन चिड़िया’ फिल्म में मान सिंह का किरदार मनोज बाजपेयी ने निभाया है.

सोन चिड़िया का निर्माण यह बताता है कि चंबल के बागी अब भले किस्से-कहानियों भर में बचे हों लेकिन इन बागियों को लेकर अब भी हिंदी फ़िल्म के दर्शकों के मन में एक जिज्ञासा बची और बनी हुई है.


पिछले 50 साल में दो ऐसी पीढ़ियां तैयार हो गई हैं, जिसे इस बागी समस्या का कुछ भी नहीं पता. फिर भी इसे जानने-समझने की उनकी इच्छा चकित करने वाली है.

डाकू समस्या को लेकर पिछले 70 सालों में कई फ़िल्में बनी हैं. लेकिन डाकूओं की असली ज़िंदगी पर बनी फ़िल्मों में बैंडिट क्वीन को जो सराहना मिली, उसका कोई मुकाबला नहीं है. यूं भी फूलन देवी की ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव दर्शकों को बांधे रखने के लिये पर्याप्त थे.

इसके बाद बनी पानसिंह तोमर की कहानी में भी वह सब कुछ था, जिसकी जरुरत हिंदी फ़िल्म जगत को होती है.

मान सिंह

इन दोनों फ़िल्मों के पहले भी डाकू सुल्तान सिंह तोमर, पुतली बाई, मान सिंह, तहसीलदार सिंह, मोहर सिंह या माधो सिंह जैसों की ज़िंदगी को छूने की कोशिश करती हुई गंभीर फिल्में बनी हैं.

1967 में डाकू समस्या पर मंजू डे ने शंभू भट्टाचार्या, शेखर चटर्जी को लेकर अभिशप्त चंबल बनाई थी.

डाकू मान सिंह पर 1971 में भी बाबू भाई मिस्त्री ने दारा सिंह, शेख मुख्तार जैसे कलाकारों को लेकर फिल्म बनाई थी. टाईम लाइफ फिल्म की प्रोड्यूज़ की गई इस फिल्म में मान सिंह की ज़िंदगी को दिखाने की कोशिश की गई थी.

लेकिन जिन लोगों ने जया भादुड़ी के पिता और भोपाल में स्टेट्समैन के पत्रकार तरुण कुमार भादुड़ी की किताब अभिशप्त चंबल / बीहड़ बागी बंदूक पढ़ी हो या जिनका आलोक तोमर की भिंड के डाकूओं पर लिखी किताब पढ़ी है, उन्हें शायद ही ये फिल्में भाएं.

खास तौर पर डाकू मान सिंह की कहानी को जो विस्तार बड़े पर्दे पर मिलना था, वह इन फिल्मों में संभव नहीं हो सका. तब की तकनीक के दिन और दूसरी सुविधायें शायद बड़ा कारण रही होंगी.

अब अभिषेक चौबे के निर्देशन में बनी सोन चिड़िया ने इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की है.

डाकू मान सिंह की ज़िंदगी पर बनी इस फ़िल्म में मनोज बाजपेयी की महत्वपूर्ण भूमिका है. स्वाभाविक रुप से अभिनय के लिये पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना चुके मनोज बाजपेयी बिहार के उस चंपारण इलाके से आते हैं, जहां बरसों तक डाकू समस्या ने अपनी जड़ें जमा कर रखी थीं.

हालांकि चंपारण की तबीयत चंबल घाटी की तरह की नहीं है लेकिन बागी होने की एक झलक की तरह का अनुमान तो लगाया ही जा सकता है.

दूसरा ये भी कि मनोज बाजपेयी जिस पृष्ठभूमि से आते हैं और जिस ज़मीन पर अब भी खड़े हैं, वहां मुद्दों को समझने में उन्हें कोई बड़ी मुश्किल नहीं होती है. यही कारण है कि सोन चिड़िया को लेकर उनसे बड़ी उम्मीदें बनी हुई हैं.

मनोज वाजपेयी के अलावा इस फिल्म में भूमि पेंडारकर और सुशांत वाजपेयी भी हैं, जिनसे स्वाभाविक ही दर्शकों को काफी अपेक्षा रहती है.

बेशक अब चंबल का इलाका ‘जिनके बैरी जिंदा बैठे उनके लरकन को धिक्कार’ के ज़माने का चंबल नहीं रहा. अब चंबल के जवान देश दुनिया में अपनी बहादुरी के लिये नाम कमा रहे हैं. सेना में भर्ती हो कर चंबल के हज़ारों जवान मातृभूमि की रक्षा में जुटे हुये हैं.

लेकिन रॉबिनहुड जैसी छवि वाले बागी मान सिंह अपनी मौत के 65 साल बाद अब भी इस चंबल की पहचान बने हुये हैं. खेड़ा राठौर में बना हुआ मान सिंह का मंदिर आज भी बागी समस्या में दिलचस्पी रखने वालों के लिये आकर्षण का केंद्र है.

डाकू मान सिंह पर 1935 से 1955 के बीच तकरीबन 1,112 डकैती और 182 हत्याओं के आरोप थे. लेकिन मान सिंह इस बात के लिये मशहूर थे कि उन्हें जो भी धन हासिल किया, उसे गरीबों में बांट दिया. 1955 में सेना के जवानों ने मान सिंह और उनके बेटे सूबेदार सिंह को एक मुठभेड़ में मार डाला.

मान सिंह के जीवन के कई पहलू हैं और सोन चिड़िया अपनी सीमा में, इनमें से कितने पहलू को छू पाती है; इसके लिये तो एक मार्च की प्रतीक्षा करनी होगी.

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