इंसान को बांटा जा रहा है

सुभाषिनी सहगल अली
हिंसा की घटनाएं, अत्याचार की घटनाएं, नागरिकों पर पुलिस और अर्द्धसैनिक बल के लोगों द्वारा किए गए हमले-इन सबकी खबरें हमें रोज परेशान करती हैं. हर घटना के बाद हम सिर हिलाते हुए एक दूसरे से कहते हैं, बहुत बुरा हुआ. आखिर मरने वाले, घायल होने वाले या परेशान किए जाने वाले हमारी-तुम्हारी तरह इंसान थे. या फिर यह कहा जाए कि शायद ऐसा हम सोचा और कहा करते थे.

अब भी हम ऐसा सोचते और कहते हैं, लेकिन बहुत कम. या फिर, ऐसा कई लोग कहते और सोचते हैं, लेकिन ऐसा बहुत सारे लोग नहीं सोचते-कहते. वे पहले इस बात का पता लगाते हैं कि मरने वाले कौन थे और मारने वाले कौन. उसके बाद ही वे फैसले करते हैं कि मरने वालों के साथ उनकी हमदर्दी है कि मारने वालों के साथ.

एक पखवाड़ा पहले बांग्लादेश के एक कैफे में तमाम राष्ट्रीयताओं के महिला-पुरुष खाना खा रहे थे. उस कैफे की विदेशियों में काफी लोकप्रियता थी. अचानक शाम घिरते ही वहां आतंकवादियों का एक गिरोह पहुंचा और उसने उन लोगों को मुस्लिम-गैर मुस्लिम में बांटना शुरू कर दिया. उन्होंने वहां मौजूद लोगों से कुरान की आयतें सुनाने के लिए कहा.

जाहिर है कि गैरमुस्लिम उनके निशाने पर थे, हालांकि कुछ मुस्लिम भी मारे गए. उनमें एक गैरमुस्लिम लड़की हमारे ही देश की थी. उसकी तस्वीर, उसका मुस्कराता चेहरा, अंतिम संस्कार के समय उसकी मां का असीम दुखों से भरा चेहरा-इन सबने हमें अंदर से हिलाकर रख दिया.

पिछले दो-चार दिनों से हमारे देश के एक हिस्से यानी कश्मीर में लोग मारे जा रहे हैं. वहां के अस्पतालों में सैकड़ों जख्मी दाखिल हैं. उनकी संख्या बढ़ती ही जाती है. इनमें से कुछ के पेट में गोली लगी, कुछ की आंखों में गोली या लाठी के जख्म थे, कुछ मरीजों की पीठ में गोली लोगी थी, तो अनेक मरीजों की कमर के ऊपर गोली लगी थी.

इतना ही नहीं, अस्पताल के अंदर भी आंसू गैस के गोले दागे गए थे. एक पुलिस अधिकारी ने इस बात की शिकायत की है कि अर्द्धसैनिक बल के जवानों ने एंबुलेंस से लोगों को बाहर निकालकर उनकी भी पिटाई की.

अस्पतालों में दाखिल होने वाले ये लोग बांग्लादेश या अफ्रीका या कहीं और के नहीं, हमारे ही देश के नागरिक हैं. हममें से कई ऐसे हैं, जो अखबार के पन्ने टटोलकर पहले यह देखते हैं कि मरने वाले कौन हैं, मारने वाले कौन हैं. जब हमें पता चलता है कि मरने वाले कश्मीरी हैं और मारने वाले ‘हमारे’ जवान हैं, तो हमारी संवेदना बंटने लगती है. उस जवान की मौत पर दुख और आक्रोश का एहसास तो होता है, और होना भी चाहिए, जिसे प्रदर्शनकारियों ने जीप समेत नदी में डुबोकर मार दिया, लेकिन मारे गए लोगों में से कितनों के प्रति हममें से बहुतों के दिलों के दरवाजे खुलने के लिए तैयार ही नहीं होते.

अपनी बंदूकों के घेरे में कैद लोगों को धर्म के आधार पर बांटकर यह तय करने वालों को, कि किसकी जान बचेगी और किसकी जान बेरहमी से ली जाएगी, हम आतंकवादी कहते हैं, और सही कहते हैं. ऐसे भी लोग होते हैं, जो बेगुनाह लाशों को धर्म के आधार पर बांटने के बाद तय करते हैं कि किसकी मौत पर आंसू बहाएंगे और किसकी मौत के प्रति अपने दिल को पत्थर बना देंगे.

आखिर उन्हें क्या कहकर संबोधित किया जाए? सच यह है कि इंसान को तो बांटा ही जा रहा है, यही प्रक्रिया इंसानियत को भी बांट रही है.

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