मीडिया के औजार भी मंडी में

सुनील कुमार
एक बड़ी दिलचस्प खबर यह है कि फेसबुक के कर्मचारियों ने अपने मुखिया मार्क जुकरबर्ग से पूछा है कि वे अमरीकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने की कोशिश कर रहे नफरतजीवी डोनाल्ड ट्रम्प को राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए क्या कर सकते हैं? कर्मचारियों की तरफ से यह सवाल फेसबुक के एक भीतरी सर्वे में पूछा गया कि कंपनी के मुखिया से हफ्तावार सवाल-जवाब में क्या पूछा जाए?

मार्क जुकरबर्ग ने पहले डोनाल्ड ट्रम्प की आलोचना की थी कि वे लोगों के बीच दीवारें खड़ी करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन दूसरी तरफ उनकी कंपनी, फेसबुक, की यह नीति है कि वह लोगों के वोट देने की सोच को प्रभावित नहीं करती है. हालांकि फेसबुक ने एक वक्त यह प्रयोग कर देखा था कि क्या लोगों के वोटों का रूझान किसी तरफ मोड़ा जा सकता है?

और बात सिर्फ फेसबुक की नहीं है. दुनिया में आज मीडिया के इतने बड़े-बड़े कारोबार हो गए हैं कि वे जनमत को मोड़ने और तोड़ने की ताकत बढ़ाते चल रहे हैं. हिंदुस्तान में भी एक-एक अखबार के दर्जनों संस्करण आम बात हो गई है, और कई अखबार ऐसे हैं जो आधा-एक दर्जन राज्यों के दर्जनों शहरों से निकल रहे हैं, और करोड़ों पाठकों तक पहुंच रहे हैं. भारतीय लोकतंत्र में मीडिया एक स्वतंत्र कारोबार है और यहां पर ऐसी कोई रोक भी नहीं है कि एक मीडिया मालिक कितने राज्यों तक सीमित रहे, या कितनी भाषाओं से अधिक में उसके अखबार न निकलें, या अखबार के साथ-साथ टीवी और रेडियो पर भी उसका कब्जा न हो, या इन सबके अलावा शहरों के केबल टीवी नेटवर्क पर भी उनका मालिकाना हक न हो.

एक वक्त ऐसा था जब अमरीका में मीडिया पर एकाधिकार के खिलाफ ऐसे कानून थे जो मीडिया के एक सीमा से अधिक बड़े होने को रोकते थे, अब पता नहीं वहां भी ये कानून बाकी है या नहीं, लेकिन हिंदुस्तान में कभी ऐसे कानून के लिए कोई चर्चा भी नहीं हुई. और आज फेसबुक पर जो सवाल खड़ा है, वह यही पूछ रहा है कि इस अकेली सोशल मीडिया ताकत का इस्तेमाल असहमति के लिए, वोटरों को प्रभावित करने के लिए किया जाए, या नहीं.

इंटरनेट, कम्प्यूटर, फोन, और सोशल मीडिया ने मिलकर जनमत को प्रभावित करने की इतनी बड़ी ताकत हासिल कर ली है कि झूठ और अफवाह दुनिया के इतिहास में कभी इतने ताकतवर और असरदार नहीं थे जितने कि आज हैं. और अमरीका में जिस तरह रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति-प्रत्याशी बनने की कोशिश में लगे डोनाल्ड ट्रम्प साम्प्रदायिक नफरत और हिंसा फैला रहे हैं, उस तरह की नफरत और हिंसा हिंदुस्तान में भी कुछ लोग फैला रहे हैं, और ऐसे लोग सोशल मीडिया पर अमनपसंद लोगों के मुकाबले हजार गुना अधिक सक्रिय हैं.

कम्प्यूटर तकनीक की मेहरबानी से लोग झूठी तस्वीरें और झूठे वीडियो भी गढ़ ले रहे हैं, और झूठे आंकड़ों के साथ नफरत फैलाना कई लोगों का सबसे पसंदीदा शगल हो गया है. भारत के सोशल मीडिया पर अगर देखें तो आधे लोग मोदी से नफरत करते उन्हें फेंकू लिखते हैं, और आधे लोग राहुल गांधी को पप्पू लिखकर उनकी अपरिपक्वता पर हमला करते हैं. इस बीच दिग्विजय सिंह जैसे लोगों के लिए डॉगविजय सिंह से लेकर पिगविजय सिंह तक गालियां गढ़कर फैलाई जाती हैं.

लेकिन सोशल मीडिया तो एक अलग किस्म की आजादी वाला लोकतंत्र है जिसमें हर किस्म के जुर्म, हिंसा, और नफरत की जगह है, गुंजाइश है. लेकिन दूसरी तरफ अगर फेसबुक या ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के मालिक किसी विचारधारा के समर्थन या विरोध का फैसला ले लें, तो बिना घोषित किए हुए वे अपने कम्प्यूटरों में बहुत मामूली सी छेडख़ानी करके यह इंतजाम कर सकते हैं कि किसी विचारधारा की बातें हर किसी के सामने अधिक पहुंचें, और किसी दूसरी विचारधारा की बातें दबी-छुपी रह जाएं.

यह एक किस्म की ब्रेनवॉशिंग होगी जिसमें लोगों की सोच को मोड़ दिया जाए. पहले, बहुत पहले, जब कम्प्यूटर-इंटरनेट और सोशल मीडिया महज विज्ञान कथाओं की कल्पना थे, शायद कल्पना में भी नहीं थे, तब ऐसी विज्ञान कथाएं लिखी जा चुकी हैं जिनमें जनता की सोच को बदलने की साजिश और जुर्म की बातें थीं. आज अखबारों और टीवी वाले मीडिया की दखल और पहुंच इंटरनेट के डिजिटल मीडिया तक भी अच्छी खासी है, और हर किस्म के मीडिया पर एकाधिकार पर कोई रोक भी नहीं है.

मीडिया चाहे वह मूलधारा का मेनस्ट्रीम मीडिया हो, या कि सोशल मीडिया, जब वह बड़े आकार से बढ़कर बहुत बड़े आकार का हो जाता है, तो उसमें कारोबारी पूंजी भी बहुत अधिक से बढ़कर विकराल हो जाती है. और वैसे में कारोबारी प्राथमिकताओं के सामने किसी तरह के कोई लोकतांत्रिक, सामाजिक, या मानवीय सरोकारों की कोई गुंजाइश नहीं बचती है. ऐसे में अगर दुनिया के इतिहास में जगह-जगह तानाशाह बनने वाले लोगों की तरह अगर मीडिया मालिक, सोशल मीडिया मालिक, दुनिया के रूख को अपनी मर्जी का करना तय करे, तो संवाद और संचार के ये औजार दुनिया के सबसे घातक हथियार बन जाएंगे.

आज वैसे भी भारत जैसे देश में लोकतांत्रिक चुनाव कई किस्म के गैरलोकतांत्रिक प्रभावों के असर में है, और निष्पक्ष चुनाव, खरीदे जाने वाले एक सामान की तरह के रह गए हैं. अब अगर मीडिया-सोशल मीडिया के औजार भी हथियारों की मंडी में बिकने लगे हैं, तो लोकतंत्र सबसे ताकतवर खरीददार के पांव की जूती जैसा ही नहीं रह जाएगा?

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