सरकार की आलोचना देशद्रोह नहीं- SC

नई दिल्ली | बीबीसी: सरकार की कड़ी आलोचना करना ना तो मानहानि है और ना ही देशद्रोह. सुप्रीम कोर्ट ने 1962 के संवैधानिक पीठ के फ़ैसले का हवाला देते हुए, ये विचार व्यक्त किए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 1962 के केदारनाथ बनाम बिहार सरकार के मामले का हवाला दिया है जब देशद्रोह के कानून पर सर्वोच्च अदालत ने स्थिति स्पष्ट कर दी थी.

अब सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ‘सेडिशन’ यानी देशद्रोह के मामले की सुनवाई करने वाले निचली अदालतों के जजों और मजिस्ट्रेटों के साथ साथ पुलिस अधिकारियों को भी संविधान पीठ के फैसले के बारे में जानकारी रहनी चाहिए.

केदारनाथ बनाम बिहार सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा था कि देशद्रोह की धाराएं तभी लगाई जा सकती हैं जब किसी अभियुक्त ने हिंसा करने के लिए लोगों को उकसाया हो या फिर जनजीवन प्रभावित करने की कोशिश की हो.

एक स्वयंसेवी संस्थान ‘कॉमन कॉज़’ ने इस मामले को लेकर एक जनहित याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट से भारतीय दंड संहिता की धारा 124 (A) को लेकर दिशा निर्देश जारी करने की गुहार की थी. यह याचिका जाने माने वकील प्रशांत भूषण ने दायर की थी.

याचिका में नैशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि वर्ष 2014 में ही देशभर में देशद्रोह के 47 मामले दर्ज किये गए और 58 लोगों को गिरफ्तार किया गया.

याचिका में यह भी कहा गया है कि सिर्फ एक मामले को छोड़कर बाक़ी के सभी मामलों में आरोप ग़लत पाए गए जिसका मतलब है कि ‘यह एकतरफा कार्रवाई’ थी.

पिछले समय में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों- कन्हैया कुमार, अनिर्बान और उमर फ़ारूक़ और पटेल आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल पर भी देशद्रोह के मामले दर्ज हुए और इस मुद्दे पर समाज में ख़ासी बहस जारी है.

‘कॉमन कॉज़’ की याचिका में यह भी कहा गया है कि कुछ दूसरी कुछ हस्तियां भी हैं जिन्हें देशद्रोह के मामले झेलने पड़े जैसे लेखिका अरुन्धाती रॉय, कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी, मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन, तमिल लोक गायक एस कोवन और उत्तर प्रदेश के एक कालेज के 67 कश्मीरी छात्र.

याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस और ‘ट्रायल कोर्ट’ के लिए निर्देश जारी किये हैं कि सभी पक्ष केदारनाथ बनाम बिहार सरकार के मामले में सप्रीम कोर्ट की संविधानपीठ के भारतीय दंड संहिता की धारा 124 (A) को लेकर जारी दिशा निर्देशों का पालन करें.

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपक मिसरा और न्यायमूर्ति उदय यू ललित की खंडपीठ ने कहा, “हम यह कैसे मान कर चलें कि ट्रायल कोर्ट के जज और पुलिस महानिदेशकों को सुप्रीम कोर्ट की संविधानपीठ के दिशा निर्देशों के बारे में कुछ पता नहीं है. मगर हम सबको इसे फिर से याद दिलाना चाहते है.”

केदारनाथ बनाम बिहार सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “किसी भी नागरिक को सरकार के तौर तरीक़ों के बारे में कुछ भी बोलने और लिखने का पूरा अधिकार है जब तक वो लोगों को विधि द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ हिंसा करने के लिए नहीं उकसाता और सामान्य जन जीवन को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करता है.”

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