लोकपाल चयन में नेता विपक्ष अहम

नई दिल्ली| समाचार डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से चार हफ्तों में जवाब मांगा है. लोकपाल की नियुक्ति में देर होने के संबंध में एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी से शुक्रवार को पूछा कि सरकार लोकपाल कानून को किस तरह से लागू करने जा रही है? लोकपाल के पैनल की नियुक्ति के लिए मौजूदा कानून के तहत नेता विपक्ष का होना जरूरी है. अगर नेता विपक्ष नहीं है तो ऐसी स्थिति में वो किस तरह से आगे बढ़ने की तैयारी कर रही है.

गौरतलब है कि वर्तमान लोकसभा में कांग्रेस के पास केवल 44 सांसद हैं तथा मावलंकर नियमों के अनुसार कुल सांसदों के 10 फीसदी अर्थात् 55 सांसदों की जरूरत है. इसी आधार पर लोकसभा की स्पीकर सुमित्रा महाजन ने कांग्रेस को नेता विपक्ष का पद नहीं दिया है. इस कारण से वर्तमान लोकसभा में कोई भी नेता विपक्ष नहीं है.

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि नेता विपक्ष लोकतंत्र का एक अहम हिस्सा है. संविधान में अलग से इस पर कुछ नहीं कहा गया है क्योंकि उस वक्त किसी ने ये नहीं सोचा होगा कि ऐसी स्थिति भी आएगी. कोर्ट ने कहा कि अगर लोकपाल का चयन बिना नेता विपक्ष के होगा तो उस चयन की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा हो सकता है. कोर्ट ने ये इशारा किया है कि लोकतंत्र में कई चीजें परंपरा के आधार पर होती हैं. वो परंपरा जो लोकतंत्र को मजबूत करे, ना कि उसे कमजोर करे.

जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट के इस टिप्पणी के बाद नेता विपक्ष के पद को लेकर फिर से राजनीतिक गलियारों में बहस शुरु हो गई है कि भाजपा इस मुद्दे पर क्या जवाब देती है. भाजपा के जवाब पर ही लोकसभा में नेता विपक्ष के पद का फैसला होगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोकपाल की चयन प्रक्रिया में नेता विपक्ष का पद अहम है, इसलिए सरकार को नेता विपक्ष पर विचार करना चाहिए. अगर सरकार नेता विपक्ष के विवाद को सुलझाने में नाकाम रहती है, तो वो निर्णायक फैसला सुना सकती है.

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