छत्तीसगढ़ की धूम सूरजकुंड शिल्प मेले में

रायपुर | संवाददाता: सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय शिल्म मेले में छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों की धूम रही. एक तरफ तीजन बाई ने अपने पंडवानी से लोगों का मन मोह लिया तो दूसरी तरफ आलोकरंजन के बस्तर बैंड ने हजारों का दिल जीत लिया. पंडवानी कलाकार तीजन बाई की गायन शैली और आलोकरंजन पाण्डेय के नेतृत्व में बस्तर बैंड के कलाकारों के आदिवासी लोक संगीत की प्रस्तुतियों ने हरियाणा के सूरजकुण्ड में हजारों दर्शकों का दिल जीत लिया.

सूरजकुण्ड में चल रहे पंद्रह दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेले की सांस्कृतिक संध्या में छत्तीसगढ़ के लोक-कलाकार ने रंगमंच पर अपनी कलाओं का जादू बिखेरे. बस्तर बैंड में 40 से ज्यादा लोक वाद्य यंत्रों इस्तेमाल किया गया, जिनके सुरीले संगीत पर लोग झूम उठे.


छत्तीसगढ़ के पंथी, सुआ और कर्मा लोक नृत्यों का भी वहां दिलचस्प प्रदर्शन हुआ. छत्तीसगढ़ की इन कला-प्रतिभाओं के प्रस्तुतिकरण से देश-विदेश के पर्यटक मंत्रमुग्ध हो गए. इस मेले में छत्तीसगढ़ को थीम स्टेट के रूप में शामिल किया गया है.

शिल्प मेले के मुख्य सांस्कृतिक मंच पर छत्तीसगढ़ के लोक-कलाकारों ने रविवार देर रात तक राज्य की समृद्ध लोक संस्कृति के इंद्रधनुषी रंग बिखेरे. पद्मश्री और पद्मभूषण सम्मानित तीजन बाई छत्तीसगढ़ में महाभारत के विभिन्न प्रसंगों पर प्रचलित पंडवानी गायन की प्रसिद्ध कलाकार है. उन्होंने सूरजकुण्ड शिल्प मेले में द्रौपदी स्वयंवर के प्रसंग पर तानपुरे के साथ कार्यक्रम प्रस्तुत किया.

सूरजकुंड के इस मेले में तीजन बाई की सादगी और भारतीय परंपरा को प्रस्तुत करने की उनकी शैली का हर कोई कायल हो गया. कृष्ण-द्रौपदी संवाद को भी उन्होंने बड़े ही रोचक ढंग से सुनाया. तीजन बाई छत्तीसगढ़ की पहली महिला कलाकार हैं जिन्होंने कापालिक शैली में पंडवानी का प्रदर्शन प्रारंभ किया है. इसके पहले महिलाएं केवल बैठकर पंडवानी गा सकती थीं, जिसे वेदमती शैली कहा जाता है. पुरूष खडे़ होकर कापालिक शैली में गाते थे.

सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दूसरे सत्र में बस्तर बैंड के कलाकारों ने मेले के सांस्कृतिक मंच पर छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल के लोक संगीत का जादू बिखेरा. बस्तर बैंड का संयोजन आलोकरंजन पाण्डेय ने किया है. यह मूलतः बस्तर के आदिवासी समुदायों की संगीतमय प्रस्तुति है . इसमें वहां के परम्परागत लोक संगीत की ऐसी प्रधानता है, जिससे वेद की ध्वनि ‘चैंन्टिग‘ का आभास होता है. इस नाद में गाथा, आलाप, गान और नृत्य भी है.

इसमें बस्तर आदिवासियों के आदि देव लिंगों के 18 वाद्य सहित लगभग 40 से ज्यादा परंपरागत वाद्य शामिल है. बैंड समूह के प्रत्येक कलाकार तीन से चार वाद्य एक साथ बजाने में पारंगत है. तार से वाद्य, फूंक कर मुंह से बजाने वाले वाद्य और हाथ व लकड़ी के थाप से बनजे वाले ढोल वाद्यों और मौखिक ध्वनियों से कलाकार मिला-जुला जादुई प्रभाव पैदा करते है. प्रस्तुति में ऐसा आभास होता है कि हम हजारों वर्ष पीछे आदिम युग में आ गए हों.

बस्तर बैंड में बस्तरिया समुदाय के विलुप्त होते पारंपरिक, प्रतिनिधि लोक एवं आदिम वाद्यों की संगीतमय सामुहिक अभिव्यक्ति है. बस्तर के आदिम जनजाति घोटूल मूरिया और दंडामी माड़िया दोनों की परंपराओं में विभिन्नतायें हैं एवं उनके वाद्य यंत्र भी भिन्न है. बस्तर बैंड ने इन दोनों के आदिम जीवन के सारे रंगों को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश की है. इन जनजातियों के अतिरिक्त बस्तर के कई अन्य जनजातियों के लोगों को इसमें शामिल करके परिधान, संस्कार, अनुष्ठान, आदिवासी देवताओं की गाथा आदि की मिली-जुली संगीतमय अभिव्यक्ति दी गई है.

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