पीपली लाइव, गजेंद्र और बस्तर

बस्तर | सुरेश महापात्र: कुलीन किसान गजेंद्र सिंह की आत्महत्या के बाद देश में नई विचारधारा बहती दिख रही है. किसानों को लेकर सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग हो रहा है. लग रहा है कि अब देश एक बार फिर कृषि प्रधान हो गया है. गजेंद्र की मौत पर देश के किसानों की व्यथा को प्रदर्शित करते नेताओं और मीडिया की भीड़ ने एक बड़ी बात सिखाई है. यह कि अगर आप सार्वजनिक रूप से मरते हो तो टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट और रिवोल्यूशनरी प्वाइंट दोनों एक साथ गेन करते हैं.

बड़ी बात यह है कि चाहे नेता हो या मीडिया दोनों में गजेंद्र की अहमियत ना पहले थी और ना आगे रहेगी. बस यह कुछ दिनों का खेल है जो खेला जा रहा है. चौबीस घंटे खबरों को परोसने का ठेका लिए चैनल दिन भर या कुछ दिनों तक चलने वाले ऐसे खेलों के लिए मौका की तलाश में जुटे होते हैं. ऐसे चौबीसा चलित चैनलों की जरूरत न तो ‘ईमान’ से है और ना ही किसी के ‘मान’ से. बस टीआरपी ही सबका लक्ष्य. हमने कितने अच्छे तरीके से यह दिखाया कि फलां किस तरह पेड़ पर चढ़कर नारे लगाता रहा और खेल—खेल में झूल गया. मौत हो गई. मातम पसर गया.


‘लाइव’ आत्महत्या देश के किसानों के हालात के लिए एक नजीर बन गया. सच्चाई यही है कि जंतर—मंतर में जो भीड़ खड़ी थी, उसे भी शायद ही यह पता हो कि देखने—दिखाने के चक्कर में वाकई वह ‘अज्ञात’ पेड़ पर झूल जाएगा. मौत हो जाएगी. लोग देखते रह जाएंगे. फिर पता चलेगा कि मरने वाला दौसा का गजेंद्र सिंह था और उसकी मौत के दौरान और उसके बाद भी मंच पर किसानों का रोना रोया जाता रहा. इसके बाद राजनीतिक आरोप—प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाएगा. गजेंद्र की मौत से दुखी नेता न तो अपना सार्वजनिक जीवन त्यागेंगे और ना ही उन मुद्दों पर बात करेंगे जिससे किसान व्यथित हैं.

खैर यह तो हो गया. अब चिंता, चिंतन, रोना और मातम का दौर है. राष्ट्रीय किसान गजेंद्र सिंह की मौत हो चुकी है. दौसा में आंसु बहाने नेता पहुंच रहे हैं. मीडिया का मजमा सजा हुआ है. सभी कुछ ना कुछ नई कहानी की तलाश में जुटे हैं. शायद ही किसी को इस बात से सरोकार हो कि देश के बाकी किसानों का क्या हाल है. संसद से सड़क तक तमाशबीन बन चुके गजेंद्र की मौत की पीड़ा सिर्फ उसके परिवार के हिस्से है. नेता को उनके ‘आरपी’ और मीडिया को अपनी ​’टीआरपी’ से मतलब है. गजेंद्र की मौत का मुद्दा नेताओं को रूला रहा है. माफी मंगवा रहा है. कसमें खिलवा रहा है. बावजूद इन सबके नहीं लगता कि देश में कुछ भी बदला हुआ दिखेगा.

हमारे बस्तर की हालत भी जंतर—मंतर पर खड़े पेड़ पर फांसी के फंदे में झूले गजेंद्र की तरह ही है. जब—जब मौतें होती हैं, मीडिया आती है. कैमरे के फोकस नई कहानियां ढूंढते हैं. ‘टीआरपी’ का खेल चलता है और उसके बाद फिर वही शांति. सारे मुद्दे अगले हमले तक के लिए गुम हो जाते हैं. बस्तर में जब सीआरपीएफ के 76 जवानों की शहादत हुई थी तो ऐसा लगा कि बस देखिये सब कुछ बदल जाएगा. राष्ट्रीय मीडिया की नजर में बस्तर कुछ दिनों तक छाया रहा. चैनलों से लेकर संसद तक बहस का दौर. लाइव रिपोर्टिंग से बस्तर के चप्पे—चप्पे में दहशत ढूंढते चैनलों के रिपो​र्टरों को देखकर लगने लगा था कि अब तो होकर रहेगा. पर क्या हुआ? कुछ भी नहीं. इस हमले के बाद झीरम घाट पर कांग्रेस के काफीले पर नक्सलियों के तांडव की चर्चा रही.

राष्ट्रीय मीडिया के हाई प्रोफाइल प्रतिनिधि बस्तर पहुंचे. लगा सब कुछ बदल जाएगा. हालात वही है. इस हादसे को भी अब दो बरस हो गए. सरकार बदल गई. योजनाएं बदल गईं. दहशत की परिभाषा नहीं बदली है. सड़कों का हाल नहीं बदला है. जो टापू थे वे अब भी टापू हैं. पहले भी बड़े मंत्री सड़क मार्ग से नहीं आते थे अब भी नहीं आ पाते. हादसे, हमले, दहशत की कहानी जस की तस है. एनएच 30 में पक्की सड़क पहले भी नहीं थी आज भी नहीं है. सौ किलोमीटर के फासले को तय करने में पहले भी 6 घंटे लगते थे आज भी लगते हैं. हमें लगता है कि किसी भी अनोखे मामले में बाद चाहे मीडिया हो या नेता सभी उसके नए एंगल तलाशने में जुटते हैं. ताकि मीडिया अपनी टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट बढ़ा सके और नेता अपनी रिवोल्यूशनरी प्वाइंट. बाकि मुद्दा जहां जाए, कोई मतलब नहीं!

देश में चाहे महंगाई का मुद्दा हो या बरोजगारी का. बस्तर में सुरक्षा का मुद्दा हो या विकास का. सभी विषयों पर बहस, केवल बहस तक सीमित दिखते हैं. न नेताओं में विषय को लेकर गंभीरता दिखती है और ना ही मीडिया गंभीर रह पाता है. जिसका परिणाम यही होता है कि गजेंद्र की आत्महत्या और बस्तर के हादसे एक स्टोरी बनकर रह जाते हैं. गजेंद्र की मौत से ना किसानों का भला होने वाला है और ना बस्तर में हादसों से बस्तर का भला होता दिख रहा है. देश में किसान ‘गजेंद्र’ और ‘बस्तर’ की अहमियत एक जैसी है. जिनके लिए दुखड़ा रोने वाले तो दिखते हैं. पर दिल किसी का दुखता है ऐसा कहीं भी नहीं लगता.

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