सुषमा उवाच

कनक तिवारी
लोकपाल चुनने की केन्द्रीय समिति के एक विशेषज्ञ सदस्य के रूप में प्रख्यात वकील पी. पी. राव के मनोनयन का भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने खुला विरोध किया है. सुषमा का आरोप है कि राव कांग्रेस के वफादार हैं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राव के नाम पर अड़े रहे और एक के मुकाबले तीन मतों से राव चयन समिति के सदस्य चुन लिए गए.

सुषमा भूल गईं कि अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में गठित संविधान समीक्षा समिति में अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त चीफ जस्टिस एम. एन. वेंकटचलैया को सौंपी गई थी. उन्होंने सेवानिवृत्त होने के एक दिन पहले भाजपाई मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को बड़े अपराध का दोषी बताकर भी केवल एक दिन की साधारण कैद और दो हजार रुपए जुर्माने की सजा दी थी. इन्हीं वेंकटचलैया ने अटॉर्नी जनरल मिलन बनर्जी से पूछा था ‘आपके पास कौन से तथ्य हैं जिससे यह सिद्ध हो सके कि अयोध्या में स्थिति बिगड़ रही है?‘


समिति के एक सदस्य पी. ए. संगमा भी थे जिनकी सोनिया गांधी की नागरिकता को लेकर राय कांग्रेस छोड़ने के बाद भी कायम है. स्पीकर रहते हुए संगमा आर.एस.एस. के जलसों में शामिल होते रहे. सदस्य जस्टिस कोंडापल्ली पुनैया आंध्रप्रदेश विधानसभा की अध्यक्ष और तेलगूदेशम विधायक प्रतिभा भारती के पिता थे. लोकसभा के सेवानिवृत्त महासचिव सुभाष कश्यप भाजपा की कई नीतियों के समर्थक रहे हैं और सोनिया गांधी के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने के विरोधी भी.

एक अन्य सदस्य महात्मा गांधी की पोती सुमित्रा कुलकर्णी ने 1999 के चुनाव के बाद त्रिशंकु लोकसभा में वाजपेयी को सरकार बनाने का मौका देने की पुरजोर वकालत की थी. सेवानिवृत्ति के बाद वेंकटचलैया ने कहा था ‘मेरी राय में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ बहुसंख्यकों का विरोध नहीं है.‘ यह भी कहा ‘यदि भारत को विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत नई विश्व संस्कृति से जुड़ना है, तो उसे तैयारी करनी होगी और प्रतियोगिता भी.‘ उन्होंने यहां तक कहा ‘हमें यह भी ढूंढ़ना होगा कि हमारे संवैधानिक उपकरण की प्रणालियां वैश्वीकरण की प्रक्रिया से किस तरह सामंजस्य बिठा सकती हैं.‘

समिति के सदस्यों का भी चयन संसद ने नहीं किया था. तत्कालीन विधिमंत्री राम जेठमलानी ने ऐलान किया था कि समिति में अधिकांश राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि भी होंगे. ठीक यही बात राजग के चुनाव घोषणापत्र में भी कही गई थी. लेकिन बाद में केवल पी. ए. संगमा को शामिल किया गया. यदि राजनीतिक पार्टियों को अपने निजी अनुभवों के कारण किसी विद्वान से परहेज़ और दूसरे से आसक्ति हो तो उसे अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए. अन्यथा सुषमा स्वराज ने केन्द्रीय सर्तकता आयोग के पद पद कथित भ्रष्ट अधिकारी थॉमस का सही विरोध किया था. उस समय भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सुषमा स्वराज की असहमति को दरकिनार किया था. इस कारण सुप्रीम कोर्ट ने बाद में थॉमस की नियुक्ति को रद्द कर दिया था.
* उसने कहा है-9

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