तालिबान के नाम पर हत्या के खिलाफ भी उठेंगे?

अबरार ख़ान | फेसबुक : कल अफ़ग़ानिस्तान के एक मदरसे पर अमेरिकी अगुआई वाली अफग़ान सेना ने हवाई हमला किया, जिसमें कुल एक सौ एक लोग मारे गए और दो सौ के लगभग घायल हो गए. हताहत लोगों में अधिकतर संख्या बच्चों की है जिन्होंने पढ़ाई मुकम्मल कर ली थी, उन्हीं को डिग्री देने का प्रोग्राम था यानि कि ग्रेजुएशन सेरेमनी थी. चारों तरफ़ जश्न का माहौल था नारा ए तकबीर का शोर था, क़ारी क़ुरआन की क़िरत कर रहे थे. कोई मुबारकबाद दे रहा था, कोई मुबारकबाद ले रहा था. कोई तोहफे बांट रहा था, तो कोई सदक़ा लुटा रहा था. तभी एक बम फूटा जिसमे इक्कीस तालिबानी लड़ाकों समेत दर्जनों हाफिज़ कारी और ओलमा अपनी जान से हाथ धो बैठे.

आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि जब यह शैक्षणिक संस्थान था सामाजिक समारोह था तो वहाँ तालिबानी क्या कर रहे थे ? मैं जानता हूँ तालिबान का नाम आते ही आपकी सहानुभूति आपकी इंसानियत सो गई होगी. इसलिए आपको बताता चलूं कि वह क्षेत्र जहां पर यह हमला हुआ है वह आज भी तालिबान के प्रभाव में है,उस क्षेत्र में आज भी अफगान सरकार या अमेरिका का प्रभुत्व नहीं है,उस क्षेत्र में आज भी तालिबान रूल करता है. यह लड़ाई सत्ता की लड़ाई है मगर सत्ता की लड़ाई के भी कुछ उसूल होते हैं.


उसूल यही हैं बेगुनाह ना मारे जाएं,आम नागरिक ना मारे जाएं. अगर उस क्षेत्र में तालिबान का शासन है तो इसके लिए जिम्मेदार अमेरिका और अफगानिस्तान की कमज़ोरी है न कि उस क्षेत्र की जनता है. मानवाधिकारों की रक्षा के लिए ही मानवाधिकार आयोग का गठन हुआ है. मगर जब सत्ता की लड़ाई में स्कूलों पर अस्पतालों पर बम बरसाए जाते हैं बेगुनाहों को मारा जाता है तब मानवाधिकार का खून होता है,मनुष्यता का खून होता है. मगर अब हम और आप आतंकवाद उसी को मानते हैं जब कोई सत्ता अपनी मीडिया के द्वारा आतंकवाद को परिभाषित करती हैं, दूसरी सूरत में जब कोई सत्ता बेगुनाहों को मारती है बेजुबानों को मारती है मासूमों को मारती है. तब हम उसे आतंक नहीं मानते तब हम अपनी छाती नहीं पीटते तब हमारी इंसानियत न जाने कहां मर जाती है.

यही कारण है कि अमेरिका तथा उसके सहयोगी एक के बाद एक देश को अपने निशाने पर लेकर लाखों लोगों की हत्याएं करते जा रहे हैं. यही कारण है कि उन देशों में नाबालिग बच्चे भी अपने हाथों में किताबों की जगह बंदूक थाम रहे हैं यही कारण है जो नौजवानों को बाग़ी और हिंसक बनाता है आतंकवाद को खाद और पानी देता है.

सोचिए लंदन,पेरिस, अमेरिका आदि में अगर दो लोग मरते हैं तो हम आप अपनी डीपी काली कर लेते हैं, आई स्टैंड विद फलाना का हैश टैग चलाते, हप्तों तक बहस करते हैं बड़े बड़े लेख लिखते हैं सियापा करते हैं परंतु जब यही फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका आदि देश अफ़ग़ान, लीबिया, सीरिया, ईराक़, यमन देशों में जाकर एक ही झटके में सैकड़ों ज़िंदगियाँ लील लेते हैं शहरों को खण्डहर बना देते हैं, स्कूलों स्पतालों पर बमबारी करते हैं तब हमें पता ही नहीं चलता पता चलता भी है तो कुछ ऐसे रिएक्ट करते हैं जैसे इंसान नहीं कीड़े मकोड़े मरे हों. हालांकि एक संवेदनशील व्यक्ति कीड़ों की बेवजह हत्या पर भी भावुक हो जाता है मगर आप न जाने कैसे बुद्धिजीवी हैं कि आपकी भावनाएं इतनी सिलेक्टिव हैं कि हमारी समझ के बाहर है.

सुनिए ….. मदरसे में हुए हमले में जो सैकड़ों लोग मरे हैं और आप चुप हैं अगर कल उनके परिजन बंदूक उठा लें और किसी अमेरिकी को बंधक बना कर क़त्ल कर दें तो क्या वे सच में आतंकवादी होंगे ? क्या हमें और आपको अमेरिका की गुलामी करते हुए यह नैतिक अधिकार है कि हम आतंकियों को आतंकी कहें.

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