गोरखालैंड से दार्जीलिंग चाय उद्योग खतरे में

दार्जीलिंग | एजेंसी: तेलंगाना राज्य गठन के फैसले का असर प्रस्तावित तेलंगाना राज्य से बहुत दूर एक ऐसे उद्योग पर महसूस किया जा रहा है, जो आपके लिए सुबह की ताजगी लाता है.

उद्योग के जानकारों ने बताया कि पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्से को पृथक गोरखालैंड राज्य बनाने के लिए चल रहे आंदोलन के समर्थन में 29 से 31 जुलाई तक तीन दिवसीय बंद के कारण दार्जीलिंग चाय उद्योग को 10 करोड़ रुपये का झटका लगा है और कारखानों का ईंधन तथा कोयला भंडार घटकर काफी कम हो गया है.


दार्जीलिंग टी एसोसिएशन (डीटीए) के अध्यक्ष एस.एस. बागड़िया ने दार्जीलिंग से आईएएनएस को बताया, “सब कुछ थम-सा गया है और उत्पादन बागान से बाहर नहीं जा पा रहे हैं. यह काफी गंभीर समस्या है. हम चाहते हैं कि हड़ताल बीच-बीच में एक-दो दिन के लिए खत्म हो. इससे हमें कुछ काम करने का अवसर मिल जाएगा.”

गोरखालैंड जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) के आंदोलनकारियों ने तीन अगस्त से फिर से अनिश्चितकालीन बंद शुरू कर दी है. चाय उद्योग को हालांकि बंद से बाहर रखा गया है, लेकिन उद्योग से संबंधित लोग असमंजस में हैं.

दार्जीलिंग चाय बागानों के लिए यह मानसून के दौरान पत्तियों के तोड़े जाने का सत्र है. यह सत्र दार्जीलिंग के कुल सालाना उत्पादन में 15 फीसदी योगदान करता है. पत्तियों के तोड़ने के चार सत्र होते हैं- पहला सत्र, दूसरा सत्र, मानसून सत्र और हेमंत सत्र. दार्जीलिंग के चाय बागान देश के कुल चाय निर्यात में 30 से 35 फीसदी योगदान करते हैं.

दार्जीलिंग में कुल 87 चाय बागान हैं, जिनमें 50 हजार स्थायी कर्मचारी और 20 हजार अस्थायी कर्मचारी काम करते हैं.

अंबूतिया चाय बागान के अध्यक्ष संजय बंसल ने फोन पर आईएएनएस से कहा, “यह लाखों डॉलर का सवाल है कि बंद कब उठाया जाएगा. अब तो हर दिन महत्वपूर्ण है. हर गुजरने वाले दिन के साथ कारखानों में मशीनों को चलाने के लिए ईंधन और कोयले का भंडार चुकता जा रहा है.”

बंसल ने कहा कि स्थायी कर्मचारी बागानों की सीमा में रहते हैं और उनके खान-पान का भंडार भी समाप्त होता जा रहा है.

उन्होंने कहा, “पिछले वर्ष सूखे के कारण उत्पादन 20 फीसदी कम रहा. इस साल मौसम तो बेहतर है, लेकिन राजनीतिक स्थिति के कारण लगता है कि मौसमी लाभ बेअसर हो जाएगा.”

अंबूतिया चाय कंपनी के पास 11 बागान हैं और यह 13 बागानों वाली चमोंग के बाद दार्जीलिंग की दूसरी सबसे बड़ी चाय उत्पादन कंपनी है.

बंसल ने कहा कि तेलंगाना मुद्दे के बाद तो दार्जीलिंग में आंदोलन तेज होना ही था. उन्होंने कहा, “अब सवाल यह है कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार इस मुद्दे से कैसे निपटती है.”

बागड़िया ने कहा कि चाय कारोबारी पश्चिम बंगाल सरकार और स्थानीय नेताओं से मिलकर स्थिति का समाधान ढूंढ़ने तथा उद्योग में तेजी लाने की कोशिश कर रहे हैं.

बंसल ने कहा कि आंदोलनकारी गतिविधि से अंतर्राष्ट्रीय खरीदार घबरा गए हैं, क्योंकि कारोबारी चाय की आपूर्ति की कोई समय सीमा नहीं दे पा रहे हैं. उन्होंने कहा, “इसके कारण उद्योग में पूंजी का प्रवाह घटेगा.”

डीटीए के महासचिव कौशिक बसु ने कहा कि पिछले साल दार्जीलिंग चाय का कुल 90 लाख किलोग्राम उत्पादन हुआ था. इसके 70 फीसदी का निर्यात कर दिया गया था और बाकी की खपत देश में हुई थी. दार्जीलिंग चाय जर्मनी, ब्रिटेन, यूरोप, अमेरिका और जापान को निर्यात की जाती है.

बागड़िया ने यह अंदेशा जताया कि जीजेएम यदि चाय उद्योग कर्मियों को भी आंदोलन में शामिल होने के लिए कहेगा, तो उन्हें बागान छोड़कर आंदोलन में शामिल होना होगा, क्योंकि चाय उद्योग में स्थानीय लोग काम करते हैं और वे भी अलग राज्य के समर्थक हैं. इससे स्थिति और गंभीर हो जाएगी.

उल्लेखनीय है कि चाय और पर्यटन दार्जीलिंग के दो प्रमुख उद्योग हैं.

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