वाराणसी के चाय बेचने वालों पर क्रूर हमला

संदीप पांडेय
चाय बेचने का दावा करने में कभी नहीं थकने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में चाय वाले सरकार की क्रूरता का सामना कर रहे हैं. पिछली केन्द्रीय सरकार पथ विक्रेताओं की आजीविका के संरक्षण तथा उनकी सामाजिक सुरक्षा हेतु पथ विक्रेता (आजीविका का संरक्षण व पथ विक्रेताओं का विनियमन) अधिनियम 2014 लेकर आई थी. तत्कालीन आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्री ने कहा था कि पथ विक्रेता अपनी आजीविका के मुद्दे का समाधान अपने सीमित संसाधनों व पसीने के निवेश से करते हैं.

अधिनियम के अनुसार किसी भी पथ विक्रेता को तब तक नहीं हटाया जा सकता जब तक अनका सर्वेक्षण नहीं हो जाए व उन्हें लाइसेंस नहीं मिल जाए. एक नगर वेंडिंग समिति बनाई जाएगी जिसमें 40 प्रतिशत पथ विक्रेता रहेंगे, जो सर्वेक्षण करेगी तथा व्यवसाय हेतु जगह का आवंटन करेगी. उन्हें तभी हटाया जाएगा जब जमीन की तुरंत किसी आपातकालीन वजह से जरूरत हो. यदि पथ विक्रता विस्थापित होता है तो पुनर्वास के बाद विस्थापन पूर्व से उसकी आजीविका व जीने के स्तर की स्थिति बेहतर होनी चाहिए.


अधिनियम का उद्देश्य पथ विक्रताओं को पुलिस द्वारा उत्पीड़न से बचाना व किसी भी अन्य कानून के तहत प्रशासन द्वारा परेशान किए जाने से बचाना है. पथ विक्रेताओं के व्यवसाय को कहीं भी तब तक प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता जब तक पथ विक्रेताओं का सर्वेक्षण कर इनके रोजगार की योजना नहीं बन जाती. अधिनियम से ऐसा माहौल बनाने में मदद मिलनी चाहिए, जिससे पथ विक्रेता पूरे सम्मान के साथ अपना व्यवसाय कर सकें.

फिर भी 23 दिसम्बर 2017 को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, जहां नरेन्द्र मोदी का, जब भी वे वाराणसी दौरे पर आते हैं, हेलिकॉप्टर उतरता है, के बाहर करीब 45 पथ विक्रेताओं, जो विश्वविद्यालय के अंदर स्थित सर सुंदरलाल अस्पताल में भर्ती मरीजों व उनके साथ आए तीमारदारों के लिए चाय व अन्य खाने पीने की सामग्री की आपूर्ति की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का निर्वाह करते हैं, के ऊपर पुलिस ने निर्दयता से लाठी चलाते हुए जे.सी.बी. मशीनों का उपयोग कर उनकी दुकानों का तहस नहस कर दिया. पथ विक्रेता अपने ठेले काशी हिंदू विश्वविद्यालय की बाहरी दिवाल से सटे एक नाले के ऊपर पड़े सीमेण्ट स्लैब पर लगाते हैं. विश्वविद्यालय काफी पहले उनसे दुकान लगाने का कर भी वसूल करता था जिसकी रसीदें कुछ पथ विक्रेताओं ने अभी भी सम्भाल कर रखी हुई हैं. अतः यह स्पष्ट है कि जहां ये ठेले लगते थे वह जमीन न तो नगर निगम की है और न ही जिला प्रशासन की.

पथ विक्रेता अधिनियम 2014 का खुलेआम उल्लंघन करते हुए वाराणसी पुलिस व प्रशासन ने पथ विक्रेताओं की सामग्री को नुकसान पहुंचाया, उनको आर्थिक हानी पहुंचाई और अपमानित अलग से किया. उनकी भठ्ठियां व ठेले तोड़ दिए. यह पहली बार नहीं कि पुलिस ने बर्बरतापूर्ण कार्यवाही की हो. जब भी प्रधान मंत्री, जो यह बात बताने में बहुत गर्व महसूस करते हैं कि वे कभी चाय बेचा करते थे, वाराणसी आते हैं तो सभी पथ विक्रेताओं को हफ्ते भर पहले से ही हटाने की कार्यवाही शुरू हो जाती है, हालांकि उनके जाने के बाद पुनः ठेले यथावत लग जाते हैं.

23 दिसम्बर की विध्वंसात्मक कार्यवाही का औचित्य समझ से परे है. इससे भारतीय जनता पार्टी का गरीब विरोधी चरित्र पुनः सामने आता है और इस बात पर भी सवाल खड़ा होता है कि नरेन्द्र मोदी ने कभी वास्तव में चाय बेची भी है? नहीं तो उनके शासन काल में चाय बेचने वालों के साथ पुलिस-प्रशासन ऐसा क्रूर मजाक कैसे कर सकता है? स्थानीय प्रशासन की कार्यवाही पूर्णतया गैर कानूनी है. प्रशासन के रवैये की कई बार प्रधान मंत्री कार्यालय में शिकायत की गई किंतु आज तक कोई फर्क नहीं पड़ा.

जैसे ही पथ विक्रेता पुलिस द्वारा हटाए गए तुरंत वहां ऑटोरिक्शा स्टैण्ड बना दिया गया. ये ऑटोरिक्शा लंका से सवारियों को डी.एल.डब्लू. व मंडुआडीह रेलवे स्टेशन ले जाते हैं. वाराणसी में पुलिस द्वारा ऑटोवालों से वसूली का एक बड़ा तंत्र है, जैसा दूसरे शहरों में भी है. एक अनुमान के अनुसार रु. 18 करोड़ की वसूली सिर्फ वाराणसी में प्रति माह हो रही है, जिसमें वे वाहन भी शामिल हैं, जो काशी हिंदू विश्वविद्यालय के अस्पताल में मरीजों को लाते ले जाते हैं. जबकि वाराणसी नगर पालिका की जो ऑटोरिक्शा स्टैण्ड से शुल्क वसूली की निविदा है वह तो मात्र रु. 30 लाख की है. बड़ी रकम की बंदरबांट ठेकेदार, अधिकारियों व राजनेताओं के बीच हो रही है. काशी हिंदू विश्वविद्यालय मुख्य द्वार पर ऑटो रिक्शा स्टैण्ड का शुल्क रु. 5 है किंतु वसूली रु. 15 होती है.

अपने अधिकारों के प्रति अपेक्षाकृत अधिक जागरूक पथ विक्रेताओं ने पुलिस को किसी भी किस्म की घूस देने से मना कर दिया था. जो ठेकेदार ऑटोरिक्शा स्टैण्डों का संचालन करते हैं, वे पुलिस की मिलीभगत से काम करने में ही खुश हैं. इसलिए पुलिस का रवैया पथ विक्रेताओं के खिलाफ बड़ा कू्र था और उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वे किसके पक्ष में खड़े हैं. सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त एक जवाब से पता चला कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के दोनों तरफ मात्र दस-दस ऑटोरिक्शा के खड़े होने की अनुमति है किंतु वहां सैकड़ों वाहन खड़े देखे जा सकते हैं. इससे संदेश स्पष्ट है. प्रधान मंत्री के चुनाव क्षेत्र में भी, जो इस बात का दावा बार-बार करते हैं कि भ्रष्टाचार बिल्कुल बरदाश्त नहीं करेंगे, स्थानीय प्रशासन तो उन्हीं के हितों का संरक्षण करेगा, जो घूस देंगे. भले ही इसके लिए उन्हें राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करना पड़े. बड़े-बड़़े दावों के बावजूद मोदी-योगी सरकारों में व्यवस्थागत भ्रष्टाचार पर खरोंच भी नहीं पड़ी है. बल्कि भ्रष्टाचार की दरें पहले से बढ़ गई हैं.

लंका गुमटी व्यवसायी कल्याण समिति के अध्यक्ष चिंतामणि सेठ के अनुसार, पिछली बार जब पथ विक्रेताओं की दुकानों को उजाड़ा गया था तो उस मामले को लेकर न्यायालय में गए थे और अभी भी मुकदमा चल रहा है, उन्होंने अपने जीवन में कभी इतना अपमानित नहीं महसूस किया जितना 23 दिसम्बर, 2017 को. चिंतामणि ने पुलिस का सामना हमेशा बड़ी बहादुरी से किया है और जेल भी गए हैं. वे भी चाय बेचते हैं लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा प्रधान मंत्री बनने की नहीं है. वे सिर्फ अपने संगठन के अध्यक्ष के रूप में ही सम्मान चाहते हैं. अखिलेश यादव की सरकार में उन्हें नगर वेंडिंग समिति का सदस्य बनाया गया था. योगी सरकार के आते ही वह समिति भंग कर दी गई. चिंतामणि ने समिति में अपना स्थान भी खो दिया और पुलिस-प्रशासन द्वारा दिया जाने वाला सम्मान भी.

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